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चुनावी हवा के रुख का सच

बद्री नारायण निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

चुनावी चर्चाओं में अक्सर नतीजों की अटकलें हवा, बयार, लहर और अंडर-करंट जैसी शब्दावली से लगाई जाती हैं। आजकल इनमें एक नया शब्द सुनामी भी जुड़ गया है। ये अटकलें और यह शब्दावली मीडिया में भी सुनाई पड़ती है, नेताओं के भाषणों में भी, गली-नुक्कड़-चौराहे की चर्चा में भी और राजनीतिक पंडितों के विश्लेषण में भी। यह भी माना जाता है कि जनमानस के स्तर पर ध्रुवीकृत होने वाली धारणाएं और उनसे बनने वाले मताग्रह इसे पैदा करते हैं। कई बार चुनाव के दौरान बहने वाली यह हवा नहीं दिखती, परंतु चुनाव परिणाम के आने पर विजयी दल की जीत के कारणों में इस हवा की भूमिका मीडिया विमर्शों में गिनाया जाने लगता है। अक्सर हम किसी भी दल की जीत का श्रेय इस हवा को तब देते हैं, जब उसकी जीत के सामाजिक और राजनीतिक कारणों को हम नहीं समझ पाते। शायद इसलिए भी कि किसी भी दल की जीत में उसकी नीतियों, योजनाओं, घोषणापत्र के वादों, राजनीतिक प्रचार के तरीकों, जातिगत व सामाजिक समीकरणों को साधने की उसकी कोशिशों का जो जटिल समीकरण जनमानस पर असर दिखाता है, हम उसकी पूरी व्याख्या नहीं कर पाते, तो ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल करने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं होता। लोकतंत्र में अक्सर चुनावी राजनीति के सामाजिक आधार की व्याख्या के पैमाने हमारे पास नहीं होते या हमारे पैमाने जब फेल करने लगते हैं, तो चुनावी परिणाम को हम हवा नामक तत्व के सुपुर्द कर देते हैं। 
इस हवा को आंकने के अनेक खतरे होते हैं। चाय और पान की दुकान या फिर गली-चौराहों पर होने वाली बातचीत अक्सर मतदाताओं की आंतरिक चाहत को अभिव्यक्त नहीं करती। वहां जो धारणाएं बनती-उपजती दिखती हैं, वे चुनावी विमर्शों के दबाव में पैदा होती हैं। यह भी देखने में आता है कि एक ही आदमी कई बार दो-तीन पोजीशन ले रहा होता है, यानी तारीफ किसी की करता है, वोट किसी और को देने की बात करता है। फिर यह भी देखा गया है कि ऐसी जगहों पर बोलने या मत अभिव्यक्त करने की शक्ति प्रभावी सामाजिक समूहों से जुड़े व्यक्तियों की ही होती है। छोटे, वंचित, निरीह, गरीब, सामाजिक समूह के लोग ऐसे स्थानों पर या तो बोलते नहीं हैं और बोलते भी हैं, तो वर्चस्ववादी सामाजिक समूहों के दबाव में बोलते हैं। ऐसी जगहों से इकट्ठा किया गया विमर्श यूं भी समाज के हरेक तबके के राजनीतिक भावों को अभिव्यक्त 
नहीं करता।
कई बार चुनावी व्याख्याकार एक पूर्व धारणा को लेकर चलते हैं कि फलां दल के पक्ष में हवा चल रही है। जब वे पूर्वी उत्तर प्रदेश की चौराहा-चर्चा सुनते हैं, तो उन्हें अलग-अलग तरह से लोगों की राय सुनाई देती है, जिन्हें कई बार हवा में बदलने की कोशिश की जाती है। जहां से राजनीतिक व्याख्याकार और मीडिया विमर्शकार हवा पैदा करते हैं, वहां मतदाता जो कह रहा होता है, कई बार वह वास्तव में नहीं कह रहा होता है। उसकी जुबान पर कुछ होता है, और दिल में कुछ और। कैमरे के सामने और ऑडियो रिकॉर्डर के सामने वह जो कह रहा होता है, वह उसका निजी विचार नहीं होता, बल्कि उसका वह विचार होता है, जिसे वह सार्वजनिक करना चाहता है। मतदाताओं के मन में प्रवेश करना एक बड़ी चुनौती की तरह है, और इसका एक ही रास्ता है- उसके साथ ज्यादा समय गुजारना। जो चुनावी भाग-दौड़ में संभव नहीं होता।
एक चुनावी पंडित पटना से चले और इनोवा पर सवार होकर सासाराम, भभुआ होते हुए भदोही तक पहुंचे। उन्हें हर जगह ढाबों और चाय की दुकानों पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस चुनाव में जोर दिए जा रहे राष्ट्रीय सुरक्षा के वृत्तांत की अनुगूंज सुनाई पड़ी। वह तब तक मान चुके थे कि इस चुनाव का उत्तर भारत का सबसे प्रभावी वृत्तांत यही है। पर जब वह इलाहाबाद के आस-पास के गांवों में जा विभिन्न जातियों के लोगों से बात करने लगे, तो उन्हें अलग-अलग तरह के अंतर्विरोधी वृत्तांत सुनने को मिले। यहां तक कि भाजपा को वोट देने वाले सामाजिक समूहों के लोग भी यह कहते पाए गए कि हमारे लिए तो रोजी-रोटी बड़ी समस्या है। जाहिर है, एक ही दल के लिए वोट डालने वालों के पास भी अपनी सुविधा और जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग वृत्तांत हैं।
दरअसल, लोगों की पूरी तरह धु्रवीकृत राय चुनावों में कम ही होती है, अक्सर यह बनाई जाती है। कई बार जिस ध्रुवीकरण की बात हमें सुनाई पड़ती है, यह उन लोगों की सक्रियता का नतीजा होती है, जो समाज की भीतरी तहों में जाकर लोगों के मन को नहीं पढ़ते। लोगों की राय के निर्माण की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। लोगों के निजी हित, सामुदायिक हित और पसंद-नापसंद तो इसमें भूमिका निभाते ही हैं, तमाम तरह के निहित स्वार्थ, मीडिया विमर्श और विज्ञापन व पीआर कंपनियों द्वारा किए जाने वाले प्रचार भी इसमें भूमिका निभाते हैं। जितनी जटिल इसकी निर्माण प्रक्रिया होती है, उतना ही कठिन इसे समझना और इसका आकलन करना होता है।
आम धारणा के विपरीत लोकतंत्र में वोट देने का विकल्प हर बार स्वत:स्फूर्त विवेक और वोटर की अपनी तार्किकता से संभव नहीं होता। लोगों की राय कई बार निर्मित की जाती है, कम से कम वह राय तो की ही जाती है, जो हमें जगह-जगह और बहुत ज्यादा सुनाई देती है। और कई बार यह जमीनी सच्चाई को अभिव्यक्त नहीं करती। ये समाज के प्रभावी और मुखर सामाजिक समूहों की राय को अभिव्यक्त करती है। चुनाव के दौरान जिस हवा की बात होती है, उसका सच यही है। यही हर बार होता रहा है और इस बार भी यही हो रहा है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 13 may