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शोर-शराबे के बीच शांति की पिपहरी

Vibhuti Narain Rai


युद्ध के ढोल-नगाड़े बज रहे हों, तो बहुत स्वाभाविक है कि शोर-शराबे के बीच शांति की पिपहरी की धीमी मद्धम आवाज आपके कानों से अनसुनी रह जाए। भारत-पाकिस्तान के बीच तनावों के हालिया दौर में पाकिस्तानी चैनलों और सोशल मीडिया की सर्फिंग के दौरान मेरी नजर ऐसे ही कुछ दुर्लभ विजुअल्स पर पड़ी, जिन्हें युद्धोन्माद के उन मुश्किल दिनों में बहुत स्वाभाविक था कि हाशिये पर ही जगह मिल रही थी।


एक अभियान कुछ लड़कियों द्वारा चलाया जा रहा था। ट्विटर पर ‘औरत आजादी मार्च’ के हैशटैग के साथ एक दर्जन से अधिक औरतें उर्दू और अंग्रेजी में बैनरों पर युद्ध के विरुद्ध नारे लिखकर खड़ी थीं और अपनी भारतीय बहनों से अपील कर रही थीं कि वे भी शांति के पक्ष में आगे आएं और उनके साथ खड़ी हों। बैनरों पर जो कुछ लिखा था, वह दुनिया की किसी भी जगह और किसी भी भाषा में हो सकता था, पर जिस शिद्दत और आजिजी से वे अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रही थीं, वह काबिले गौर थी। एक बार नजर पड़ी, तो मैं उनका फैन हो गया। उन्हें फॉलो करते-करते मैं बहुत से युद्ध विरोधी संगठनों और उनसे जुड़ी महिलाओं को जान सका। इनमें से कुछ समूह में थीं, तो कुछ अकेले। वे अपनी पहचान को लेकर कतई शर्मिंदा नहीं थीं और शांति की ख्वाहिशमंद थीं। एक ट्वीट पर नजर पड़ी, जिसमें मध्य वय की औरत घोषित कर रही थी कि हां, वह एक औरत है और पाकिस्तानी है, वह युद्ध नहीं चाहती। कई सौ लोगों ने उसे फॉलो किया था। सोशल मीडिया की भाषा में वह खूब ट्रोल की गई थी। एक मर्दवादी समाज में इस पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि बहुत से लोगों ने उसकी जेंडर पहचान को निशाना बनाया। एक औरत होते हुए उसकी जुर्रत कैसे हुई कि युद्ध जैसे गंभीर मुद्दे पर अपनी मुखालिफ राय रख सके! कुछ ने तो उसके पाकिस्तानी होने पर शक और मातम का इजहार किया, पर बहुत से उसके प्रशंसक भी थे और शांति के पक्ष में थे। 


इसके बाद बढ़ी उत्सुकता के साथ मैंने ऐसे अनगिनत अकाउंट तलाशे, जो ट्विटर या फेसबुक पर शांति की तलाश करती महिलाओं के थे। थोडे़ प्रयास से आप उन पाकिस्तानी मर्दों को भी तलाश सकते हैं, जो इन औरतों की ही तरह शांति के पक्ष में सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। कुछ प्रयास यूरोप और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के छात्रों के भी दिखे, जिनमें भारतीय और पाकिस्तानी छात्र मिलकर युद्ध के विरोध में खड़े दिखे। 


इस युद्धोन्मादी समय में पाकिस्तानी चैनलों को देखना या अखबार पढ़ना भी कम दिलचस्प नहीं था। कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि मीडिया अंध देशभक्ति के ज्वार में बह रही थी। भारतीय ऐंकर्स की ही तरह पाकिस्तानी ऐंकर भी युद्ध के लिए अपनी जनता को ललकार रहे थे और उनकी रिपोर्टिंग भी सीधे वार रूम से आ रही विज्ञप्तियों की तरह थीं। पर इन्हीं अंधड़ों के बीच शीतल बयार के झोंके भी आपके चेहरे से टकराते थे। रऊफ कलसरा, आमिर मतीन, कासिफ अब्बासी, हसन निसार, अयाज अमीर, परवेज हूदभाय या नजम सेठी जैसे बहुत से नाम हैं, जिन्हें देख-सुनकर आप आश्वस्त हो सकते हैं। इनकी आवाजें शांति के पक्ष में थीं, यह अलग बात है कि ये अल्पमत में थीं। इसके लिए हम इन्हें दोषी नहीं ठहरा सकते, क्योंकि स्थानीय उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के अलावा मुख्यधारा के पाकिस्तानी मीडिया को भारतीय मीडिया का भी मुकाबला करना था। हमें याद रखना होगा कि हमारा मीडिया भी लगभग उन जैसा ही था। हमारे यहां भी शांति की आवाजें काफी कमजोर थीं, हमारे स्टूडियो भी वॉर रूम जैसे लगते थे। कई बहसों में तो पाक फौज के रिटायर्ड जनरलों को युद्धोन्माद फैलाने से रोकते हुए नागरिक विश्लेषक अपनी बहादुरी और साफगोई से आपको चकित करते हैं। अगर ऐसी बहसों की अपने चैनलों पर हममें से कुछ कामना करें, तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।


एक मजेदार बहस कई पाकिस्तानी चैनलों पर देखने को मिली। वे भारतीय मीडिया से तुलना कर रहे थे कि तनाव के इस दौर में अपेक्षाकृत कौन ज्यादा वस्तुपरक, संतुलित और कम भड़काऊ  रहा है? स्वाभाविक था कि उनकी निगाह में ही विजेता थे। इस पर बहस हो सकती है, पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि उनकी निगाह में ये सब उल्लेखनीय गुण बन चुके हैं। यह कहा जा सकता है कि आज वैश्विक स्थिति ऐसी नहीं है कि कोई राष्ट्र खुलकर युद्ध के पक्ष में बोले, पर पाकिस्तानी सोशल मीडिया या मुख्यधारा के मीडिया का शांति के पक्ष में खुलकर लिखना पाकिस्तान को लेकर हमारी समझ में बदलाव की जरूरत को रेखांकित तो करता ही है।


युद्ध के दिनों में युद्ध पर लिखा पढ़ने का अर्थ क्या है? इन्हीं दिनों मैंने हेमिंग्वे का कालजयी उपन्यास फेयरवेल टु आम्र्स एक बार फिर पढ़ा। मनुष्य की दो महत्वपूर्ण गतिविधियों- प्रेम और युद्ध के बीच खुद को साधती यह रचना एक बड़ा युद्ध विरोधी दस्तावेज गढ़ती है। युद्ध और प्रेम में यही सबसे बड़ी समानता नहीं है कि इनमें सब कुछ जायज होता है, बल्कि और भी बहुत कुछ है, जो उन्हें एक जैसा बनाता है। दोनों मानवीय उपक्रम की चरम अवस्था हैं, पर जहां प्रेम आग का दरिया है और उसमें डूबकर ही निस्तार मिलता है, वहीं युद्ध की आग से घृणा ही मनुष्य की मुक्ति है। 


फेयरवेल टु आम्र्स का लेफ्टिनेंट फ्रेडेरिक हेनरी अपनी प्रेमिका नर्स कैथरीन बर्कले को कई बार खोने और हासिल करने के बाद अंत में युद्ध के चलते अंतिम रूप से खो देता है। लड़ते-लड़ते अपनी जान बचाने के चक्कर में दूसरों की जान लेते हुए उसे युद्ध की व्यर्थता का एहसास होता है। इस तरह युद्ध के बीच से एक युद्ध विरोधी रचना का उदय होता है। कैसा होगा यदि भारत-पाकिस्तान के पाठकों का एक समूह साथ बैठकर फेयरवेल टु आम्र्स  का पाठ करे और तब देखें कि एक ही रचना दो ‘शत्रुओं’ पर कैसा असर डालती है? क्या यह पाठ युद्ध का वही सौंदर्य शास्त्र नहीं निर्मित करेगा, जैसी हेमिंग्वे की मंशा थी? युद्ध का कोई भी सौंदर्य बोध शांति से ही निर्मित होता है। यह अनायास नहीं है कि प्रेम का गुणगान करने वाली रचना बड़ी होती है। दुनिया की किसी भाषा में युद्ध को महिमा मंडित करने वाली कृति कालजयी नहीं बन पाती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 13 March