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पाकिस्तान से बातचीत का सही समय

विभूति नारायण राय पूर्व आईपीएस अधिकारी

प्रौढ़ समाजों में राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नीतियां लंबे विमर्शों के बाद और दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। चुनावी लोकतंत्र में यह तो स्वाभाविक है कि सत्ता पर काबिज दल की विदेश नीति से मुख्य विपक्षी दल सहमत न हों, पर असहमति की लक्ष्मण रेखा दोनों को पता होनी चाहिए। विदेश नीति राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण अवयव है। ऐसे में, देश के प्रमुख राजनीतिक दल आपस में विचार-विमर्श करते रहें और आम सहमति के बिंदु तलाशते रहें, यह राष्ट्रहित में जरूरी है।

इधर भारत की विदेश नीति में कुछ ऐसे सूक्ष्म परिवर्तन दिखे, जो यदि सोची-समझी रणनीति और दीर्घकालीन प्रयासों को ध्यान में रखकर हो रहे हैं, तो निश्चित ही देश के सुरक्षा परिदृश्य पर इसके व्यापक असर दिखेंगे। तिब्बत को लेकर पहली बार भारतीय नीति में गुणात्मक परिवर्तन दिखा, जब भारत ने उसकी निर्वासित सरकार को अपनी स्थापना के 60 साल होने पर दिल्ली में भारतीय जनता और सरकार को समर्थन देने वाला ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम रोक दिया। भारत-चीन संबंध सुधारने की दिशा में 1962 के बाद का यह सबसे बड़ा प्रयास सिद्ध हो सकता है, बशर्ते फैसला सोच-विचारकर लंबी रणनीति के तहत लिया गया हो। छिपा नहीं है कि भारत-चीन के आपसी संबंधों में खटास की शुरुआत सीमा विवाद से पहले साठ के दशक में तिब्बत से भागकर आए दलाई लामा को शरण देने से हुई थी। हमने न सिर्फ तिब्बत से आए लोगों को अपने यहां बसने की इजाजत दी, बल्कि हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में उन्हें अपनी निर्वासित सरकार बनाने की इजाजत भी दे दी।

यह अलग बात है कि भारत समेत किसी भी देश ने इस सरकार को मान्यता नहीं दी। भारत को केंद्र बनाकर तिब्बत की निर्वासित सरकार दुनिया भर में चीन विरोधी गतिविधियां चलाती रही है। किसी चीनी राजनेता के दिल्ली आने पर तिब्बती नागरिकों का प्रदर्शन आम बात है। दलाई लामा और उनके साथियों को भारत में शरण और सीमित अर्थों में ही सही, उनकी निर्वासित सरकार को काम करने की सुविधा पचास-साठ के दशक की इस भारतीय सदिच्छा का प्रतीक तो हो सकती है कि विश्व नव-स्वतंत्र देश को शांति, विश्व बंधुत्व और लोकतंत्र का पुरोधा माने, पर आज पीछे मुड़कर देखने पर हम नहीं कह सकते कि यह भारतीय हितों को आगे बढ़ाने वाली विदेश नीति थी। हमने इस तथ्य को नजरंदाज कर दिया कि हमसे उलट चीन ने पूर्वोत्तर भारत के किसी भी विद्रोही संगठन को अपनी धरती पर खुलेआम सक्रिय नहीं होने दिया। 

सबसे पहले और बड़े नगा विद्रोही धड़े के नेता फिजो को लंदन में शरण मिली और उनकी निर्वासित सरकार पहले वहां से, फिर बैंकाक से संचालित होती रही। चीन ने हमारी तरह उन्हें अपनी धरती से गतिविधियां चलाने की इजाजत नहीं दी। देखना यह है कि भारत की यह पहल कितनी दूर तक जाती है और मुख्य विरोधी पार्टी कांग्रेस इस पर क्या कहती है? जवाहरलाल नेहरू की तिब्बत नीति को उनके तत्कालीन विरोधी, जिनमें डॉक्टर लोहिया के अनुयायी और भारतीय जनसंघ प्रमुख थे, अपर्याप्त मानते थे और भारत सरकार से ज्यादा खुलकर चीन विरोधी रुख अपनाने की अपेक्षा करते थे। यदि विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों को बढ़ाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने वाला सबसे महत्वपूर्ण औजार माना जाए, तो अब छह दशकों बाद निस्संदेह कहा जा सकता है कि हमारी तिब्बत नीति बहुत उपयोगी सिद्ध नहीं हुई। इसलिए जरूरी है कि हालिया लचीला रुख जारी रखने के साथ सभी ‘स्टेक होल्डर्स’ भरोसे में लिए जाएं। जमीनी यथार्थ समझने वाला कोई भी राजनीतिक विश्लेषक थल सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत के इस दावे को लफ्फाजी ही मानेगा कि भारतीय सेना एक साथ चीन और पाकिस्तान से लड़ने में समर्थ है। उम्मीद करनी चाहिए कि ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम पर हमारा रुख एक सुचिंतित और योजनाबद्ध बदलाव का नतीजा है। संभव है, यह लचीलापन आगे चलकर भारत-चीन सीमा विवाद का कोई स्थायी समाधान निकालने में कारगर साबित हो। 

गौर करें, तो भारत सरकार की पाकिस्तान नीति में भी हल्का सा बदलाव दिखेगा। अभी तक मोदी सरकार कहती रही है कि आतंकवाद और बातचीत साथ नहीं चल सकती। उसने पाकिस्तान से किसी भी स्तर पर संपर्क से गुरेज करना शुरू कर दिया था, लेकिन आधिकारिक रूप से पुष्टि न होने के बावजूद खबरें बाहर आ ही गईं कि दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैंकाक में मिल रहे हैं और इन्हीं मुलाकातों का नतीजा है कि दोनों देश अपनी जेलों में बंद कैदियों को छोड़ भी रहे हैं। इस बदलाव को भी धैर्य से आगे बढ़ाने की जरूरत है और अच्छा होगा कि छिपकर विदेशी धरती पर मिलने की जगह हम परस्पर सीधा संपर्क बनाएं। अब जब मुस्लिम लीग (नून) की सरकार अपनी अंतिम तिमाही में प्रवेश कर रही है, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से डगमगा गई है और आतंकवाद के मसले पर वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय में लगभग अलग-थलग पड़ गया है, तब यह और भी आवश्यक है कि हम पाकिस्तान से बातचीत शुरू करें। वहां अगले महीने वर्तमान सरकार इस्तीफा दे देगी और चुनाव तक के लिए कार्यवाहक सरकार काम-काज संभाल लेगी। ऐसे में, पहले से ही कमजोर नागरिक ढांचा और कमजोर हो जाएगा। हर विफलता का ठीकरा फौज चुनी हुई सरकार पर फोड़ेगी। इसी महीने पेरिस में एफएटीएफ द्वारा पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डालने के लिए मतदान में तुर्की को छोड़ चीन और सऊदी अरब समेत सभी मुल्कों ने पाकिस्तान के विरोध में मतदान किया। फौजियों ने इस विफलता के लिए नागरिक प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया, जबकि सब जानते हैं कि जिन हाफिज सईद और मसूद अजहर की वजह से यह स्थिति आई है, वे उन्हीं की निर्मिति हैं और पाक सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई कर ही नहीं सकती।

विरोधी दल के नेता के रूप में तो ठीक था, पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी नहीं अड़े रह सकते कि वह पाकिस्तान से बात नहीं करेंगे। बात न करके हम भारत से दुश्मनी पर फलने-फूलने वाली पाक सेना और उसके समर्थक जेहादियों की ही मदद आने वाले चुनावों में कर रहे होंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि पाकिस्तान के साथ यह लचीला रुख आगे भी कायम रहेगा और सरकार विरोधी दलों को भी इस पर विश्वास में रख रही होगी। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 13 march