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सीबीआई को सबक


सीबीआई के लिए वह बेहद शर्मनाक पल था। तमाम विवादों में फंसी सीबीआई को एक और धक्का लगा। सुप्रीम कोर्ट ने उसके अंतरिम निदेशक रहे नागेश्वर राव और कानूनी सलाहकार को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया। उन पर एक लाख रुपये का जुर्माना ही नहीं किया गया, बल्कि दिन भर कोर्ट में बैठे रहने की सजा भी सुनाई गई। असल में, अंतरिम निदेशक के पद पर रहते हुए नागेश्वर राव ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह की जांच से जुडे़ अहम अधिकारी अरुण कुमार शर्मा का तबादला कर दिया था। पिछले अक्तूबर में कोर्ट ने आदेश दिया था कि जब तक जांच चल रही है, उससे जुडे़ किसी अधिकारी का तबादला न किया जाए। कोर्ट का कहना था कि उनके आदेश के बावजूद नागेश्वर राव ने तबादला करने में जल्दबाजी दिखाई। मुजफ्फरपुर मामला बेहद नाजुक मोड़ पर है। कोर्ट का मानना था कि जान-बूझकर उसके आदेश की अवहेलना की गई। 
 

एक अधिकारी के तौर पर नागेश्वर राव की छवि कोई बहुत बेहतर नहीं रही है। उनका करियर विवादों से घिरा रहा है। उन्हें जब केंद्र सरकार ने अंतरिम निदेशक बनाया था, तब भी कई कोनों से फुसफुसाहट हो रही थी। सीबीआई की ही तरह उनके कामकाज पर ढेरों सवाल उछलते रहे हैं। वैसे भी सीबीआई लगातार विवादों में बनी रही है। उसे लेकर तमाम सवाल जब-तब उठते ही रहे हैं। वह एक तटस्थ जांच एजेंसी है। यह भरोसा तो उस पर कभी नहीं जमा। एक आरोप उस पर लगातार लगता रहा कि वह सरकार के तोते की तरह है। सरकार जैसा चाहती है, उसे इस्तेमाल कर लेती है। इन सबके बावजूद सीबीआई की अपनी अहमियत है। देश में कहीं भी किसी के साथ कुछ अन्याय जैसा होता है, तो सबसे पहले सीबीआई जांच की मांग उठती है। यानी तमाम विवादों के बावजूद राज्य की जांच एजेंसियों से बेहतर उसे माना जाता है। इससे समझ में आता है कि राज्यों की जांच एजेंसियां किस हाल में हैं? 
 

यह एक सबक है। तमाम सरकारी अधिकारियों को इससे सीख लेनी चाहिए। चाहे राजनीति हो या कुछ और, किसी भी दबाव के तहत कोई काम नहीं होना चाहिए। कानून के हिसाब से ही काम करना जरूरी होता है। उसके मुताबिक काम होता रहे, तभी उसकी साख बनी रहेगी। एक बेहतर लोकतंत्र में इस तरह की एक तटस्थ जांच एजेंसी का होना बेहद जरूरी है। देश की लोकतांत्रिक संस्थाएं एक अलग तरह का खतरा महसूस कर रही हैं। ये संस्थाएं लोकतंत्र के खंभे की तरह होती हैं। उनका कमजोर होना देश को ही नुकसान पहुंचाता है। इन संस्थाओं को एक खास मकसद से खड़ा किया गया था। उनके कुछ जरूरी मूल्य थे। उन्हीं पर अब खतरा नजर आ रहा है। सीबीआई पर राजनीतिक दबाव तो हमेशा से थे। लेकिन इधर तो अंदरूनी लड़ाई ने उसकी साख पर जबर्दस्त चोट की है। काश! सीबीआई भी हमारे निर्वाचन आयोग की तरह हो जाए। एक स्वायत्त, तटस्थ और तमाम दबावों से परे एक जांच संस्था। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए यह जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के एक आला अधिकारी को ही सबक नहीं सिखाया है, यह पूरी सीबीआई को ही एक संदेश देने में जुटी है। सीबीआई की साख धीरे-धीरे गिरी है। इधर कुछ ज्यादा तेजी से गिर गई है। फिलहाल, उसकी साख की वापसी के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 13 February