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एक आवाज जो नहीं सुनी गई

संजय पारिख वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

अपने देश की अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए जो संघर्ष करेगा, क्या उसकी सुध हमारा सत्ता-प्रतिष्ठान नहीं लेगा? यह सवाल इसलिए, क्योंकि प्रोफेसर गुरु दास अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद को बिसरा दिया गया था। यहां तक कि देश के बड़े नेता जब देहरादून आते, तो वे भी प्रोफेसर अग्रवाल से दूरी बनाए रखते। अगर हमारे सत्तानायकों ने इस पर्यावरणविद की बातें सुनी होतीं, तो 22 जून से यह इंसान अब तक अनशन पर नहीं होता, और आज हमारे बीच सशरीर मौजूद रहता।
दो दिन पहले की बात है, जब मुझे फोन करके यह बताया गया कि प्रोफेसर जीडी अग्रवाल अब जल का भी त्याग करने वाले हैं। वह 100 दिनों से भी अधिक समय से अन्न लेना छोड़ चुके थे, इसलिए उनका जल त्यागना किसी अनहोनी की आशंका थी। हम सबकी यही चिंता थी कि किस तरह प्रोफेसर अग्रवाल का अनशन तुड़वाया जाए? साथ-साथ हम सुप्रीम कोर्ट में एक खास तरह की याचिका दायर करने की भी सोच रहे थे, जो शीर्ष अदालत में जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर द्वारा की गई टिप्पणी पर आधारित होती। जस्टिस कृष्णा अय्यर ने एक मुकदमे के दौरान कहा था कि गांधीजी का सत्याग्रह हमारे संविधान में बुनियादी रूप से शामिल है। मगर हमारी ऐसी किसी भी कोशिश से पहले ही प्रोफेसर अग्रवाल हमें छोड़कर चले गए।
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल सही मायने में ‘गंगा-पुत्र’ थे। वह गंगा की अविरल धारा के आग्रही थे। उनकी मुख्य मांग भी यही थी कि गंगा पर जितने बांध बन रहे हैं, उनका निर्माण रोका जाए। उनका मानना था कि ये बांध पतित पाविनी गंगा की अविरल धारा को खत्म कर देंगे। सच भी यही है कि बेहिसाब बांधों के बनने से आस-पास की पारिस्थितिकी खत्म हो जाती है। नजदीकी वन तबाह हो जाते हैं और तमाम लोग विस्थापित होते हैं। विस्थापित हुए लोगों का पुनर्वास कितना दुरूह और दुष्कर होता है, यह हम टिहरी बांध के विस्थापितों को देखकर समझ सकते हैं। इस बांध ने हजारों लोगों से उनकाआशियाना छीन लिया। कई को तो अब तक कोई ठौर-ठिकाना नहीं मिल सका है। प्रोफेसर अग्रवाल हिमालय में ऐसे किसी निर्माण-कार्य के खिलाफ थे। उनका साफ मानना था कि नए पहाड़ों में गिने जाने वाले हिमालय में अगर अनियोजित विकास-कार्य किए जाएंगे, तो पूरे हिमालय क्षेत्र पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा, और यह अंतत: गंगा के मैदानी इलाकों को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।
दुख की बात है कि प्रोफेसर अग्रवाल की बातों को नहीं सुना गया। केंद्र व राज्य सरकारें पहाड़ों के अनियोजित विकास में लगातार जुटी हुई हैं। आलम यह है कि पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, और जहां-तहां पनबिजली परियोजनाओं के तहत निर्माण-कार्य किए जा रहे हैं। ये सब हमारे लिए परेशानी पैदा करेंगे। प्रोफेसर अग्रवाल कहा करते थे कि नदियों को बांधने से वे और ज्यादा उग्र हो जाएंगी। इसी तरह, पहाड़ को काटने से वे कहीं ज्यादा कमजोर हो जाएंगे। पिछले दिनों जिस तरह राष्ट्रीय मीडिया में पहाड़ों पर भू-स्खलन की तस्वीरें तैरती रहीं, क्या वे प्रोफेसर अग्रवाल के तर्कों को पुष्ट नहीं करतीं? 
प्रोफेसर अग्रवाल गंगा की अविरल धारा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए खास तरह के कानून की मांग कर रहे थे। हालांकि इससे पहले भी वह अपनी इन तमाम मांगों को लेकर अनशन पर बैठ चुके थे। तब उन्हें भरोसा दिया गया था। उनसे कहा गया था कि उनकी बातों पर गौर किया जाएगा। मगर लगता है कि तमाम वादे यूं ही कर लिए गए थे। संभवत: इसीलिए इस बार वह संकल्पबद्ध थे कि या तो गंगा की रक्षा होगी या फिर वह अपना प्राण त्याग देंगे। उनका यूं जाना निश्चित तौर पर उन तमाम लोगों को शर्मसार करता है, जो दिन-रात गंगा की साफ-सफाई को लेकर बातें तो खूब करते हैं, पर हकीकत की जमीन पर कहीं खड़े नहीं होना चाहते।
कई बार उनके इस अभियान के सिलसिले में मैं उनसे मिलता रहा। गंगा को लेकर जब कभी कोई मीटिंग होती, मैंने उन्हें वहां मौजूद पाया। मेरी नजर में वह ऐसे इंसान थे, जो बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात कहते थे। वह तर्कों पर बातें किया करते। मीटिंग में भले ही लोग भावना में बहकर ऊंचे-ऊंचे दावे कर जाते थे, लेकिन प्रोफेसर अग्रवाल को कभी अतिशयोक्ति में बातें कहते नहीं सुना हमने। वह सीधी बात करते और उतनी ही करते, जितनी जरूरत होती। साफगोई से अपनी बात रखने में वह कभी नहीं घबराए। हालांकि उनके इस व्यक्तित्व की वजह उनके पठन-पाठन में भी छिपी है। आईआईटी, कानपुर में सिविल और एनवायरन्मेंटल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख होने के नाते उन्होंने काफी काम किया था। फिर वह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले ‘मेंबर-सेक्रटरी’ भी बने। इसलिए उन्हें तमाम तकनीकी पहलू की जानकारी थी। वह ऐसे इंसान नहीं थे, जो सिर्फ गंगा और स्वच्छ पर्यावरण का राग अलाप रहे थे। उन्होंने तकनीकी पहलू का अध्ययन किया था और उसी के आधार पर वह गंगा की अविरल धारा की वकालत किया करते थे। 
गंगा को बचाने के लिए हमें उसकी धारा को निर्मल बनाना ही होगा। गंगा बचेगी, तभी हिमालय भी बचेगा और हिन्दुस्तान भी। लेकिन जिस तरह गंगा या फिर दूसरी तमाम नदियों पर निर्माण-कार्य चल रहे हैं, उससे आशंका पैदा होती है। इसीलिए प्रोफेसर अग्रवाल जैसे शख्स की जरूरत हमें कहीं ज्यादा थी। मेरा मानना है कि जिंदगी में सच्चाई के लिए विरले लोग ही काम करते हैं। ज्यादातर लोगों का निहित स्वार्थ होता है। मंशा पूरी होते ही लोग अभियान से किनारा कर लेते हैं। लेकिन प्रोफेसर अग्रवाल ऐसे नहीं थे। वह अपनी आत्मा से इस अभियान से जुड़े थे। ऐसे व्यक्ति का यूं जाना बहुत बड़ी क्षति है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 12 october