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जरदारी की गिरफ्तारी के निहितार्थ

सुशांत सरीन सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन

पाकिस्तान की अंदरूनी घटनाएं अब चौंकाती नहीं, बल्कि वहां कुछ नाटकीय न हो, तो यह जरूर चकित करता है। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की मनी लॉन्ड्रिंग के केस में नेशनल अकाउंंटिबिलिटी ब्यूरो (नैब) द्वारा गिरफ्तारी कानूनी कवायद से ज्यादा पाकिस्तान की अंदरूनी सियासत से प्रेरित है। जरदारी को जिस मामले में हिरासत में लिया गया है, वह कोई नया मामला नहीं है। करीब तीन-चार साल पहले यह मामला सामने आया था, और पिछले साल से इस पर ज्यादा सुर्खियां बनी हैं। यह मामला बेनामी लेन-देन और फर्जी खाते का है। आरोप है कि मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के पैसे को छिपाने व सफेद करने के लिए ये खाते खोले गए थे। पर हकीकत यह है कि पाकिस्तान में जिस तरीके से कारोबार होता है, उसमें तमाम कारोबारी ऐसे खातों का इस्तेमाल करते रहे हैं। कानूनी तौर पर यह भले ठीक न हो, मगर पाकिस्तान में यह होता रहा है। उसके एक पूर्व मंत्री ने तो बाकायदा टीवी बहस में यह कबूल किया था कि मुल्क के सारे बिजनेसमैन यह तरीका अपनाते हैं। 
आसिफ जरदारी का नाम जिन एकाधिक खातों से सीधा जुड़ा है, उसके बारे में उन्होंने तफसील से बता रखा है कि किस सौदे के तहत यह रकम मिली है। और वह रकम भी कोई बहुत ज्यादा नहीं थी। इन मामलों में उन्हें अनेक बार जमानत मिल चुकी है। अब जमानत रद्द कर दी गई है, जिसके कारण वह गिरफ्तार किए गए हैं। 
इस मुकदमे का राजनीतिक पहलू ज्यादा अहम है। और वह है- जरदारी की गिरफ्तारी का वक्त। जिस दिन उन्हें हिरासत में लिया गया, ठीक उसी दिन पाकिस्तान का आर्थिक सर्वे भी आया। यह सर्वे साफ-साफ बता रहा है कि पाकिस्तान की माली हालत बिल्कुल चरमरा गई है। उसने जितने भी लक्ष्य तय किए थे, वे हासिल नहीं किए जा सके हैं, उसकी विकास दर 3.3 फीसदी पर आ गिरी है। पिछले नौ सालों में अर्थव्यवस्था का यह सबसे खराब                प्रदर्शन है। उसके सभी औद्योगिक क्षेत्रों की बुरी हालत है। अब महंगाई वहां भयानक रूप से बढ़ेगी। जाहिर है, अभी मुल्क की अर्थव्यवस्था की बेहाली की चर्चा हो रही होती, और इमरान खान व उनकी                सरकार में हुई इसकी दुर्गति पर ज्यादा सवाल उठ रहे होते, लेकिन अब आसिफ जरदारी की गिरफ्तारी ने पाकिस्तानी मीडिया का ध्यान अर्थव्यवस्था से हटाकर राजनीति की तरफ मोड़ दिया है। 
इस कदम का फायदा इमरान सरकार को एक और मोर्चे पर होगा। अब नेशनल असेंबली से अपने बजट को पारित कराने में उनकी सरकार को आसानी पेश आएगी, क्योंकि विपक्ष अब बजट के प्रावधानों की गंभीर आलोचना करने, अवाम के सामने नाकामियों को उजागर कर उनकी फजीहत करने की बजाय जरदारी की गिरफ्तारी के विरोध प्रदर्शनों में मुब्तला होगा। और ऐसा होने भी लगा है। पूरे पाकिस्तान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।
इमरान खान और जिन लोगों ने उन्हें सत्ता सौंपी है, वे नहीं चाहते कि नवाज शरीफ और आसिफ अली जरदारी जैसे पुराने किस्म के नेता राजनीति में रहें। पाकिस्तान में पचास के दशक से ही राजनेताओं को बार-बार हटाने की कोशिशें होती रहीं, मगर पहले उन्हें प्रशासनिक तरीके से अपदस्थ किया जाता था, अब उनको न्यायिक तरीके से ‘नाअहल’ यानी अयोग्य करार देकर सियासत से बेदखल किया जाने लगा है। नवाज शरीफ बाहर हो चुके हैं, अब जरदारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया है। इमरान खान नहीं चाहते कि विपक्ष उनके विरुद्ध सड़कों पर प्रदर्शन की कोई मजबूत राजनीति खड़ी करे और माना जा रहा है कि ताजा कदम से विपक्ष अब संगठित नहीं हो सकेगा और प्रदर्शन वाली राजनीति को धक्का लगेगा।
इमरान सियासी तौर पर निष्कंटक शासन चाहते हैं, लेकिन उनकी दिक्कत यह है कि उनके पास कोई शासकीय अनुभव नहीं है। वह अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और कानून-व्यवस्था की पेचिदगियों से भी नावाकिफ हैं और उनमें कोई बहुत राजनीतिक प्रतिभा भी नहीं है। वह फौज के जरिए अपना वर्चस्व बनाकर रखना चाहते हैं। जाहिर है, नवाज शरीफ के बाद यदि जरदारी छह महीने, साल भर तक सलाखों के पीछे रख दिए गए, तो बिलावल भुट्टो पीपीपी को क्या संभाल पाएंगे, यही सवाल अपने आप में बड़ा हो जाएगा। इस तरह से इमरान विपक्ष पर यह दबाव बना रहे हैं कि न तो वह कोई देशव्यापी प्रदर्शन की राजनीति शुरू कर पाए और न उनके ऊपर हावी होने की कोशिश कर सके।
लेकिन मसला यह है कि यदि अर्थव्यवस्था की दिक्कतें और ज्यादा गहराईं, तो उस स्थिति में सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाना विपक्ष के लिए लाजिमी होगा। उस वक्त, बड़े नेताओं को भले ही जेलों में बंद रखा जाए, मौके का फायदा कोई और ताकत उठाने के लिए आगे आ ही जाएगी। पाकिस्तान के समझदार लोग इमरान को आगाह करते रहे हैं कि विपक्ष से फिजूल का झगड़ा मत मोल लीजिए, आईन को अपना काम अपनी रफ्तार में करने दीजिए और आप अर्थव्यवस्था व सुरक्षा-नीतियों पर फोकस कीजिए। लेकिन इमरान की नजर में जो भी नेता भ्रष्ट है, उसे वह सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने नेशनल अकाउंटिबिलिटी ब्यूरो पर लंबे समय से दबाव बना रखा है। 
होना तो यह चाहिए था कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता के लिए इमरान विपक्ष को भरोसे में लेते और जमीनी स्तर पर अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने की कोशिश करते, लेकिन अपने विद्वेषी कदमों से उन्होंने मुल्क को राजनीतिक अस्थिरता की तरफ धकेल दिया है। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में आर्थिक स्थिरता मुमकिन नहीं है। ऐसे हालात में इमरान कुछ वक्त तो सुकून से काट सकते हैं, मगर यह बहुत लंबा नहीं चलने वाला। हालात को बदलने के लिए कोई न कोई ताकत हस्तक्षेप करेगी और जाहिर है, पाकिस्तान में एक ही ताकत हस्तक्षेप करती है- वह है फौज। अभी फौज का पूरा समर्थन इमरान के साथ है, मगर यदि उनसे अर्थव्यवस्था नहीं संभलती और वह ऐसी कार्रवाइयों से राजनीति में अस्थिरता पैदा करते हैं, तो फिर फौज में उनकी स्वीकार्यता सवालों के घेरे में आ जाएगी। कुल मिलाकर, पाकिस्तान एक बड़ी राजनीतिक-आर्थिक अस्थिरता की ओर बढ़ चला है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 12 june