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अगर-मगर का खेल नहीं है क्रिकेट

विश्व कप में भारतीय टीम की यात्रा बेशक थम गई, लेकिन यह सच है कि टीम फाइनल में खेलने की योग्यता रखती थी। लीग मुकाबलों में हमारे खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन शायद बुधवार हमारा दिन नहीं था। क्रिकेट में लक्ष्य का पीछा करना हमेशा मुश्किल होता है, और यदि शुरुआत में ही तीन-चार विकेट गिर जाएं, तो छोटा लक्ष्य भी काफी बड़ा मालूम पड़ता है। न्यूजीलैंड के साथ सेमीफाइनल मुकाबले में ऐसा ही हुआ, जिस कारण बाकी के बल्लेबाजों पर खासा दबाव आ गया।
इस साल इंग्लैंड में जितने भी मुकाबले हुए हैं, उनमें एक खास प्रवृत्ति देखी गई है। जो टीम पहली पारी में उतरी और ठीक-ठाक स्कोर बना लिया, तो जीत उसी की हुई है। दरअसल, दूसरी पारी में पिच में धीमापन महसूस किया गया है और बल्ले पर भी गेंद धीमी गति से आती दिखी है। इस कारण दूसरी पारी में उतरने वाले बल्लेबाजों को खासी परेशानी हुई है। हालांकि महज इस वजह से टीम इंडिया के बुधवार के प्रदर्शन को सही नहीं ठहराया जा सकता है। अगर शुरुआती ओवरों में एक और अच्छी साझेदारी बन जाती, तो मुमकिन है कि भारतीय खिलाड़ी लॉड्र्स में खेलने का टिकट पा लेते। लेकिन क्रिकेट अगर-मगर का खेल नहीं होता। मैदान में जो बढ़िया प्रदर्शन करता है और अंत-अंत तक बाजी मारने का जज्बा दिखाता है, जीत उसी के खाते में जाती है। 
हार के कारणों पर गौर करें, तो गेंदबाजी की बजाय बल्लेबाजी को मैं कहीं अधिक कठघरे में खड़ा करना चाहूंगा। बेशक ऋषभ पंत और हार्दिक पांड्या का विश्व कप में संतोषजनक प्रदर्शन रहा, लेकिन सेमीफाइनल में उन्हें जरा ठहरकर खेलना चाहिए था। किसी खिलाड़ी के जीवन में इस तरह के अवसर बहुत कम आते हैं, जब वह एक नायक के तौर पर उभरता है। इन दोनों के पास यह सुनहरा मौका था। अगर दोनों धैर्य के साथ 10-15 ओवर टिककर खेल लेते, तो मैच का रुख बदल सकता था। कहा जा रहा है कि अनुभवहीन होना इनके विकेट गंवाने का कारण बना, लेकिन मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। विश्व कप टीम में शामिल होने वाले हर खिलाड़ी के पास टेस्ट, वनडे या आईपीएल जैसे तमाम मुकाबलों में खेलने का अनुभव होता है। उन्हें मालूम होता है कि किस परिस्थिति में कैसी बल्लेबाजी करना टीम के हित में है। हार्दिक पांड्या ने महेंद्र सिंह धौनी के साथ मिलकर स्कोर कुछ आगे जरूर बढ़ाया, लेकिन लंबे शॉट मारने की जल्दबाजी में उन्होंने अपना विकेट गंवा दिया। जबकि वह वक्त पिच पर रुककर स्ट्राइक बदलने और एक-दो रनों पर भरोसा करने का था। अगर कोई वरिष्ठ खिलाड़ी सामने हो, तो नए खिलाड़ी को उनसे बात 
करके भी अपने खेल को निखारना चाहिए। कुछ देर पिच पर जमने के बाद बड़े शॉट लगाए जा सकते थे। लेकिन हार्दिक ऐसा करने से चूक गए और शुरुआती विकेट 
गंवाने के दबाव से उबर रही टीम इंडिया फिर से दबाव में आ गई। नंबर चार पर किस खिलाड़ी को भेजा जाए, भारतीय टीम में यह मसला भी अंत-अंत तक बना रहा। बल्लेबाजी क्रम में लगातार बदलाव किया जाता रहा, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। इससे खिलाड़ियों को अपने खेल और नई भूमिका से सामंजस्य बिठाने में दिक्कतें आती हैं। 
रवींद्र जडेजा की खासतौर से तारीफ होनी चाहिए। धौनी के साथ मिलकर उन्होंने बेहतर खेल दिखाया। धौनी ने जहां अपने अनुभव का लाभ उठाया, वहीं जडेजा ने अपनी तेजी का। अगर यह जोड़ी आखिरी ओवर तक टिक जाती, तो नतीजा निश्चित तौर पर भारत के हक में होता। धौनी की यह कहते हुए आलोचना की जाती है कि उनका खेल अब धीमा हो गया है। लेकिन आलोचक शायद यह भूल जाते हैं कि जब आधी टीम पैवेलियन लौट चुकी हो, तो मैच को आखिरी ओवरों तक ले जाना ही चुनौतीपूर्ण होता है। धौनी और जडेजा चूंकि बड़े शॉट लगाने में माहिर हैं, इसलिए उन्होंने उचित ही मुकाबले को आखिरी तक ले जाने की बात सोची होगी। जब हाथ में विकेट नहीं होते, तो तेज खेलने के अपने जोखिम होते हैं। धौनी की संयमपूर्ण बल्लेबाजी इस मुकाबले में ही नहीं, बल्कि पिछले मैचों में भी कारगर साबित हुई है। लिहाजा, धौनी ने मैच बिगाड़ा नहीं, बल्कि उसे बनाया और टीम इंडिया को वह जीत की दहलीज तक ले गए।
क्रिकेट इतिहास में यह पहला मौका था, जब दुनिया भर में भारतीय टीम की चर्चा हो रही थी। हमें खिताब का मजबूत दावेदार माना जा रहा था। ऐसे में, सिर्फ एक मुकाबले से टीम के पूरे प्रदर्शन को नहीं आंका जा सकता। हमें अपने खिलाड़ियों पर गर्व करना चाहिए। क्या रोहित शर्मा और जसप्रीत बुमराह जैसे खिलाड़ी इस विश्व कप की उपलब्धि नहीं माने जाएंगे? फिर, भारतीय टीम अमूमन अपनी बल्लेबाजी के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध रही है, लेकिन इस विश्व कप में हमारे गेंदबाजों ने जैसा प्रदर्शन किया, वह निश्चय ही तारीफ के लायक है। कई मौकों पर गेंदबाजों ने अपनी मारक क्षमता और अनुशासन की वजह से मैच बचाया। हां, मोहम्मद शमी को सेमीफाइनल में मौका देना चाहिए था। पता नहीं क्यों, उन पर भरोसा नहीं किया गया, जबकि वह विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं। संभव है कि उनके होने का टीम को लाभ मिलता और लक्ष्य 200-220 रनों का ही होता।
बहरहाल, वक्त भविष्य देखने का है। हमारी टीम विश्वस्तर की है। बेशक इस बार हमारे हिस्से में विश्व कप नहीं आ सका, लेकिन हमारे पास प्रतिभा की कमी नहीं है। आने वाले दिनों में खिलाड़ी अधिक परिपक्वता दिखाएंगे, और इस हार से सबक लेकर खुद पर गंभीरता से काम करेंगे। यह अच्छी बात है कि दूसरी टीमें अब हमसे डरने लगी हैं। कभी-कभी दबाव भी टीम के प्रदर्शन पर भारी पड़ता है, और पसंदीदा टीम होने के कारण सेमीफाइनल जीतने का भारी दबाव भारतीय खिलाड़ियों पर था। इस तरह के दबाव में नैसर्गिक खेल प्रभावित होता ही है। फिर भी, एक अच्छे मुकाबले के हम गवाह बने, और जीत अंतत: क्रिकेट की हुई।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 12 july