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इनके अफसर, उनके अफसर

विभूति नारायण राय पूर्व आईपीएस अधिकारी

लगभग तीस साल पहले दफ्तर में डाक देखते समय मेरी नजर एक अंतर्देशीय खत पर पड़ी। आज ई-मेल और वाट्सएप्प के जमाने में तो शायद हम भूल ही गए हैं कि उन दिनों निजी संदेशों के लिए पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय ही सबसे अधिक उपयोग में लाए जाने वाले माध्यम हुआ करते थे। पत्र पढ़ा, तो पता चला कि किसी प्रोबेशनर आईपीएस अधिकारी ने मुझसे अनुरोध किया था कि उसके बुजुर्ग पिता आधी रात ट्रेन से इलाहाबाद स्टेशन पर पहुंच रहे हैं और मैं ऐसी व्यवस्था कर दूं कि कोई उन्हें वहां से रिसीव कर 30 किलोमीटर दूर गांव तक पहुंचा आए। पत्र लेखक और मैं एक-दूसरे से पहले कभी नहीं मिले थे, सिर्फ एक ही रिश्ता हमारे बीच था कि मुझसे 14 साल बाद वह भी इंडियन पुलिस सर्विस का सदस्य बने थे। इसी रिश्ते के बल पर उन्होंने अपरिचय का विंध्याचल लांघते हुए देश के किसी सुदूर कोने से मुझे मदद के लिए लिखा था। यह विश्वास किसी शून्य से           नहीं उपजा था। सेवा के मध्य भाईचारे और एक विस्तृत परिवार के सदस्य होने की भावना इस अधिकार भरे विश्वास की नींव थी।

कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के इर्द-गिर्द पिछले दिनों जो कुछ घटा, उसमें कुछ ऐसा था, जो इस भ्रातृत्व की भावना को नष्ट करने वाला था। मेरा मतलब उनके खिलाफ चल रही जांच से कतई नहीं है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है कि आईपीएस अधिकारियों के विरुद्ध कदाचरण के आरोप लगाए जाएंगे और बहुत से मामलों में आईपीएस ही इन आरोपों की जांच भी करेंगे। यह तो सेवा की उत्कृष्ट परंपराओं के अनुकूल ही होगा कि जांच अधिकारी निर्ममता की हद तक निष्पक्ष होकर आरोपों को जांचे-परखे और दोषी पाए जाने पर किसी के साथ इसलिए कोई मुरव्वत नहीं बरती जाए कि वह किसी खास सेवा का है। पर कोलकाता में तो कुछ दूसरा ही हुआ। सीबीआई की हास्यास्पद हद तो एक यह रही कि बड़ी टुकड़ी पुलिस कमिश्नर के निवास पर पहुंची। सही है कि वरिष्ठ स्तरों पर घर से भी दफ्तर का बहुत सा काम होता है। इसके बावजूद घर में परिवार के दूसरे सदस्य भी रहते हैं, जिनके मनोविज्ञान पर इस तरह की छापेमारी का बहुत प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ऐसी कार्रवाई तो तभी की जानी चाहिए, जब किसी की गिरफ्तारी की जानी हो या इस बात की आशंका हो कि महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट किए जा सकते हैं। बाद में सीबीआई ने खुद सफाई दी कि उसका गिरफ्तारी का कोई इरादा नहीं था। कई साल से जांच चल रही है, इसलिए उस दिन साक्ष्य नष्ट करने की बात भी गले के नीचे नहीं उतरती। 

इसके बाद कोलकाता पुलिस ने सीबीआई के दफ्तर पर जो किया, वह भी उतना ही परेशान करने वाला था। कोलकाता पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों के आवास और दफ्तरों को घेर लिया। यहां भी परिवारी-जन थे और उनके मनोविज्ञान पर उतना ही बुरा असर पड़ने जा रहा था। उनमें से कुछ के घबराए चेहरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिखे भी। बड़ा साफ संदेश जा रहा था कि मामला पेशेवर से अधिक व्यक्तिगत है। दोनों पक्ष अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने का प्रयास कर रहे थे। किसी के गले नहीं उतरेगा कि जब कुछ ही घंटे बाद सीबीआई के नए निदेशक संस्था का नेतृत्व संभालने वाले थे, तब कार्यवाहक निदेशक का इतना बड़ा नीतिगत फैसला उचित था। इसी तरह, कोलकाता पुलिस का सीबीआई अधिकारियों के परिवारों को सताना या उनके दफ्तरों का घेरना पूरी तरह से अनैतिक था।

आईपीएस भी मनुष्यों से निर्मित किसी अन्य संस्था की ही तरह एक ऐसा संगठन है, जिसमें अच्छे-बुरे हर तरह के लोग होंगे। उनमें आपस में भाईचारे के साथ साथ ईष्र्या-द्वेष भी होगा, सबसे बढ़कर तरक्की का पिरामिड संकरा होने के कारण कई बार गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा भी होगी। यह सब कुछ मानवीय है। इन सबके बावजूद सेवा अपने भीतर का भ्रातृत्व बचाए रख सकती है। दिक्कत तब खड़ी होती है, जब अंग्रेजी की एक कहावत के अनुसार हम राजा से बढ़कर उसके खैरख्वाह होने की कोशिश करते हैं। इसमें एक बड़ी भूमिका राजनीतिज्ञ भी निभाते हैं। इस प्रकरण में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पुलिस कमिश्नर के निवास पर आना और धरने पर बैठ जाना सांविधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के साथ-साथ खुद को संदिग्ध बनाने जैसा था। उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह था कि बहुत से आईपीएस अधिकारी धरने पर बैठीं ममता के इर्द-गिर्द दिख रहे थे। उनके इस तर्क पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है कि वे मुख्यमंत्री की सुरक्षा या शांति-व्यवस्था कायम करने के लिए वहां थे। इस मुद्दे पर भी केंद्र और राज्य सरकारों ने राजनीति करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। केंद्र प्रदर्शन स्थल पर मौजूद आईपीएस के मेडल छीनना चाहता है, जबकि राज्य इसके एवज में उन्हें राज्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देना चाहता है। दोनों को एहसास नहीं है कि लंबी और उत्कृष्ट सेवाओं के लिए अर्जित किए जाने वाले दोनों मेडल किसी आईपीएस अधिकारी के लिए क्या अर्थ रखते हैं?

मेरा आईपीएस, तेरा आईपीएस का खेल दोनों के लिए खतरनाक है। यह आईपीएस बिरादरी का आपसी भाईचारा तो खत्म करेगा ही, उन सारी संस्थाओं को भी नष्ट कर देगा, जिनका नेतृत्व पिछले कई दशकों से आईपीएस कर रहा है। इनमें आईबी, बीएसएफ या सीआरपीएफ जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण संगठन हैं। सीबीआई की जो छीछालेदर हाल के दिनों में हुई है, उसके लिए काफी हद तक सरकारें ही जिम्मेदार हैं। हर दल ने उसका अपने हित में इस्तेमाल किया है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को उसे तोता कहना पड़ गया। यह तोता तब तक तो अच्छा लगता है, जब तक वह आपके मन की बात करता रहे, पर जैसे ही आप विपक्ष में पहुंचे, आपको यही तोता खलने लगता है। प्रतिशोध में यह हिंसक भी हो सकता है, जो सीबीआई के अंदर की हालिया उठा-पटक से स्पष्ट हो गया है।

मुझे हमेशा आश्चर्य होता रहा है कि हमारे देश में कभी भी पुलिस सुधारों के लिए कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं हुआ? अब जबकि पानी सिर से ऊपर बह रहा है, तो यह सबसे उपयुक्त समय है कि पुलिस में बुनियादी परिवर्तन के लिए जनता मांग करे। संस्थाओं को और अधिक बिगड़ने देने से बेहतर यही होगा कि उन्हें बचाने की कोशिश की जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 12 february