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चुनावी पिच पर इमरान की गुगली 

सुशांत सरीन सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के एक बयान से इन दिनों भारत का सियासी पारा गरम है। पिछले दिनों विदेशी पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में हो रहे आम चुनाव में यदि भाजपा जीतती है, तो कश्मीर मुद्दे पर कोई समझौता हो सकता है। ऊपरी तौर पर उनका यह बयान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करता नजर आता है, मगर असलियत में यह ऐसी ‘गुगली’ है, जिसके जरिए वह यहां के चुनावों पर असर डालने की कोशिश में हैं।
इमरान खान के इस बयान के दो पहलू हैं। पहला, राजनीतिक और दूसरा, कूटनीतिक। पाकिस्तान में मोदी को लेकर किस हद तक नफरत की भावना रही है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। फौज या सरकारी हलकों में ही नहीं, आम जनमानस में भी भारतीय प्रधानमंत्री को खलनायक बताया जाता है। खुद इमरान खान के पहले के ट्वीट या बयानात इस नफरत को दर्शाते हैं। पिछले साल सितंबर में भी प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसते हुए उन्होंने एक ट्वीट किया था कि ‘मैं अपनी पूरी जिंदगी ऐसे छोटे लोगों से मिला हूं, जो बडे़ दफ्तरों में ऊंचे ओहदे पर बैठे हैं, मगर उनके पास दूरदर्शी सोच नहीं है’। इमरान खान के जिस इंटरव्यू पर इन दिनों भारत में हाय-तौबा मची है, उसमें भी उन्होंने इजरायल के हालिया निर्वाचित प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के समकक्ष मोदी को खड़ा किया है और यह कहा है कि नेतन्याहू की तरह भारतीय प्रधानमंत्री भय और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं। 
पाकिस्तान में मोदी को लेकर एक घबराहट भी है। उसकी चिंता यह है कि यदि मोदी लुटियंस दिल्ली में बने रहे, तो फिर वह इस्लामाबाद  के खिलाफ न जाने कौन-सा नया कदम उठा लें? पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान मानता है कि भारत में किसी दूसरी पार्टी की सरकार बनने पर उसके साथ बात आगे बढ़ाना आसान हो सकता है, क्योंकि उसकी नीति किसी राष्ट्रवादी सरकार की तरह सख्त नहीं होगी। लिहाजा इमरान खान ने उन भारतीय मतदाताओं में सेंध लगाने की कोशिश की है, जो नरेंद्र मोदी पर भरोसा करते हैं। यानी, यह एक तरह का ‘साइकोलॉजिकल ऑपरेशन’ है। भारतीय जनमानस में भी फिलहाल यही भावना गहरी है कि पाकिस्तान को लेकर नरम रुख अपनाने वाला नेता राष्ट्रद्रोही है। इसलिए ऐसे बयान आम लोग को तो भ्रमित करते ही हैं, विपक्ष को भी हमलावर होने का मौका देते हैं और ऐसा हुआ भी है। विपक्ष इस बयान के बहाने नरेंद्र मोदी को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा।
रही बात कूटनीति की, तो सिद्धांत यही कहता है कि जब दो देशों के रिश्ते भारत और पाकिस्तान जैसे कटु हों, तो कोई कट्टरपंथी सरकार ही समाधान का रास्ता खोज सकती है। इसीलिए यह कहा जाता है कि भारत में कोई दक्षिणपंथी सरकार और पाकिस्तान में फौजी या फौज के समर्थन में बनने वाली सरकार को किसी समझौते पर पहुंचने में उतनी मेहनत नहीं करनी होगी, जितनी किसी उदारवादी सरकार को करनी पड़ेगी। ऐसी सरकारों को लेकर जनता में यह विश्वास होता है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा या राष्ट्र हित से कोई समझौता नहीं कर सकतीं। अमेरिका और चीन के रिश्तों में ऐसा हमने देखा भी है, जब व्हाइट हाउस के मुखिया रिचर्ड निक्सन थे। रोनाल्ड रीगन के समय अमेरिका और रूस के बीच हुआ हथियारों का समझौता भी कुछ इसी श्रेणी का है। अपने यहां भी पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की सार्थक पहल अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने की थी, जबकि उस समय दोनों देश परमाणु परीक्षण कर चुके थे। मोदी सरकार ने भी सत्ता संभालने के बाद 2016 के मध्य तक कम से कम छह बार द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने के प्रयास किए। यही वजह है कि पाकिस्तान में एक धड़ा अब भी यही उम्मीद लगाए बैठा है कि नरेंद्र मोदी के फिर से सत्ता में आने से कुछ सार्थक बातचीत शुरू हो सकती है।
हालांकि यह उम्मीद फिलहाल नरेंद्र मोदी ही नहीं, लोकसभा में बहुमत हासिल करने वाली किसी सरकार से नहीं लगाई जा सकती। दोनों देश अगर बातचीत शुरू करने को राजी भी होते हैं, तो उसकी नियति पाकिस्तान की नीति पर निर्भर करेगी। अब भी पाकिस्तान की रीति-नीति में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है। उसके यहां जेहाद की फैक्टरियां फिर से शुरू हो गई हैं। ऐसे में, आतंकवाद के मसले को दरकिनार करते हुए किसी सरकार के लिए पाकिस्तान के साथ संबंध आगे बढ़ाना देश में उस पार्टी की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा सकता है। पूर्व के अनुभव तो यह भी बताते हैं कि जब-जब भारत ने अपने तईं प्रयास किया, तब-तब उसकी पीठ में छुरा घोंपा गया। इसीलिए भारतीय हुक्मरान पाकिस्तान की कथनी पर नहीं, बल्कि करनी पर विश्वास करेंगे। इस्लामाबाद को यह साबित करना ही होगा कि वह वाकई शांति की दिशा में बढ़ने को लेकर संजीदा है।
साफ है, इमरान खान के बयान का अर्थ वह नहीं, जो वह दिखा रहे हैं। इसके निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं। उनके हाथ बंधे हुए हैं। उन्हें ‘फौज की कठपुतली’ कहा जाता है, इसलिए वह अपनी तरफ से ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकते, जिस पर पाकिस्तान के फौजी-प्रतिष्ठान की सहमति न हो। खुद उनकी सरकार में कुछ मंत्रियों की राय भारतीय वजीर-ए-आजम के बारे में अलहदा है। ऐसे मंत्री मानते हैं कि जब तक मोदी भारत के सत्ता-सदन में बने रहेंगे, दोनों देशों में कोई समझौता शायद ही हो। तो क्या इमरान खान इन सबको नकारकर आगे बढ़ना चाहते हैं? फिलहाल तो ऐसा नहीं लग रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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