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रचना और सक्रियता की एक मिसाल

शायद ही किसी नाटककार और रंगकर्मी की मृत्यु ऐसी हुई होगी, जैसी गिरीश कारनाड (19 मई, 1938-10 जून, 2019) की। पिछले लगभग दो साल से उनके शरीर के भीतर ऑक्सीजन बनना बंद हो गया था। वह कृत्रिम श्वास नली के साथ जीवित थे, जिससे उनके भीतर ऑक्सीजन का प्रवाह होता था। जिन लोगों ने सलमान खान वाली टाइगर जिंदा है  फिल्म देखी होगी, वे सब इस बात से भली-भांति परिचित होंगे। इस फिल्म में भारतीय खुफिया विभाग के प्रमुख की भूमिका में गिरीश कारनाड ने साफ-साफ दिखने वाली इस कृत्रिम श्वास नली के साथ अभिनय किया है। और क्या बेजोड़ अभिनय है! लगा ही नहीं कि एक बीमार और मृत्यु के करीब आदमी एक्टिंग कर रहा है। 
डॉक्टरों ने लगभग दो साल पहले उनको श्वास नली लगाते हुए कहा था- ‘अधिकतम दो साल आप जी पाएंगे’। इस तरह से वह मृत्यु की प्रतीक्षा में थे कि अब आएगी, अब आएगी। पर इस आसन्न मृत्यु का इंतजार करते हुए वह गीता  में कही गई स्थितप्रज्ञता के मुताबिक  अपने हरेक काम को लगन के साथ कर रहे थे। अभिनय भी और लेखन भी। हालांकि लेखन का काम आखिरी दिनों में ज्यादा नहीं था, लेकिन वह अपनी एक सहयोगी के माध्यम से अपनी आत्मकथा में संशोधन करा रहे थे। यह भी एक तरह का लेखन ही था।
गिरीश कारनाड के निधन के साथ ही उस अखिल भारतीय चतुष्टय का अंत हो गया, जिसने आधुनिक भारतीय नाट्य लेखन में आधुनिकता का बीजरोपण किया। ये चार नाटककार थे- हिंदी के मोहन राकेश, मराठी के विजय तेंदुलकर, बांग्ला के बादल सरकार व कन्नड़ के गिरीश कारनाड। कारनाड का नाटक तुगलक  तो हिंदी में इतनी बार हुआ और उसने इतनी लोकप्रियता हासिल कर ली कि उसके बारे में चुटकुला चल गया था कि यह मूल रूप से हिंदी में लिखा गया है और कन्नड़ में इसका अनुवाद हुआ है। यह भी गौर करने की बात है कि गिरीश ने यह नाटक सिर्फ छब्बीस साल की आयु में लिख दिया था। उनको जानने वाले कुछ  लोगों का कहना था कि वह मूल रूप से अंग्रेजी में सोचते-लिखते थे, बाद में कन्नड़ में पुनर्लेखन करते थे। वैसे यह सच है कि उनकी  मातृभाषा कन्नड़ नहीं, कोंकणी थी। कन्नड उनकी सीखी हुई भाषा थी, पर हां उनकी पहचान कन्नड़-लेखक के रूप में हुई। उनका जन्म भी कर्नाटक में नहीं, महाराष्ट्र के माथेरन में हुआ था, जो एक हिल स्टेशन है। धारवाड़ में तो वह बाद में रहने गए।
गिरीश का जन्म भी नाटकीय रहा। वह अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। जन्म के पहले उनके माता-पिता ने तय किया था कि इस होने वाली संतान से छुटकारा पा लिया जाए। वे गर्भपात के लिए अस्पताल भी गए, लेकिन उस दिन वह डॉक्टर नहीं आया, जिसकी देख-रेख में यह काम होना था। इसीलिए वह अपने जन्म के लिए हमेशा उस डॉक्टर को भी धन्यवाद देते थे, जो उस तय तिथि को अस्पताल नहीं पहुंचा। वैसे यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गिरीश के पिता और माता, दोनों शादी के पहले क्रमश: विधुर और विधवा थीं। गिरीश जाति से गौड़ सारस्वत ब्राह्मण थे। उस जमाने में इस जाति में विधवा-विधुर विवाह एक क्रांतिकारी जैसा कदम था।
हिंदी रंगमंच पर पहली बार गिरीश कारनाड को लेकर आए ओम शिवपुरी। शिवपुरी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकलने के बाद राम गोपाल बजाज (चर्चित रंगकर्मी हैं और गिरीश कारनाड के कई नाटकों के हिंदी अनुवादक भी) सहित कुछ रंगकर्मी मित्रों के साथ मिलकर ‘दिशांतर’ रंगमंडली बनाई थी। इसी मंडली ने शिवपुरी के निर्देशन में पहली बार तुगलक  को मंच पर प्रस्तुत किया। बाद में प्रसन्ना, अल्काजी सहित कई बडे़ निर्देशकों ने तुगलक का हिंदी में मंचन किया। लेकिन उसका सबसे शानदार और भव्य मंचन वरिष्ठ रंगकर्मी तथा निर्देशक भानु भारती ने कुछ साल पहले किया। फिरोजशाह कोटला में भानु के निर्देशन में जब तुगलक  नाटक खेला गया, तो उस समय वह प्रस्तुति दिल्ली के सांस्कृतिक जगत की बड़ी घटना बन गई थी। तुगलक  के अलावा गिरीश के ययाति, बलि, हयवदन, अंजू मल्लिगे, अग्नि और बरखा, नागमण्डल, रक्त कल्याण  जैसे अन्य नाटक हैं, जो              हिंदी में सफलता के साथ मंचित हुए। उनका आखिरी नाटक विजय नगर साम्राज्य के आखिरी दिनों के युद्ध पर केंद्रित है। 
वैसे तो गिरीश एक सांस्कृतिक प्रशासक भी रहे, पर खासकर संगीत नाटक अकादेमी के अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल चर्चित रहा। उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला और पद्मश्री व पद्मभूषण भी। लेकिन गिरीश के दो बड़े सांस्कृतिक अवदान हैं, जिनके लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे। उन्होंने उत्तर और दक्षिण की भाषाओं में सेतु का काम किया। हिंदी और कन्नड़ को अपने नाटकों के जरिए वह एक-दूसरे के करीब लेकर आए। कन्नड़ होते हुए भी हिंदी समाज में वह परिचित थे। बतौर अभिनेता कई भाषाओं की फिल्मों में काम किया। उनकी पहली फिल्म संस्कार थी। कन्नड़ में। यू आर अनंतमूर्ति के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित। निर्देशक थे पट्टाभिरामा रेड्डी। बाद में अन्य भाषाओं के साथ-साथ हिंदी की कई फिल्मों में गिरीश ने काम किया, जिनमें उत्सव  जैसी कला फिल्म के साथ एक था टाइगर और टाइगर जिंदा है जैसी फिल्में शामिल हैं। आर के नारायण की रचनाओं पर आधारित मालगुडी डेज  जैसे टेलीविजन धारावाहिक में उनके अभिनय ने उनको उत्तर भारत में भी घर-घर पहुंचा दिया। उन्होंने कुछ फिल्में भी निर्देशित कीं।
गिरीश कारनाड एक नागरिक बुद्धिजीवी की भूमिका निभाने से कभी पीछे नहीं हटे और कई विवादास्पद मुद्दों पर लगातार अपनी राय देते रहे। चाहे बेंगलुरु हवाई अड्डे के नामकरण का विवाद हो या फिर वी एस नायपाल की भारतीय मुस्लिम संबंधी धारणाएं, गिरीश ने निर्भीकता से अपनी राय रखी। हां, ऐसे भी वाकये हुए, जब उनके विचार सांस्कृतिक क्षेत्र में विरोध के विषय बने। खासकर रवींद्रनाथ ठाकुर के नाटकों को आज के जमाने में अप्रांसगिक बताने पर उनकी स्थापनाओं का कटु विरोध हुआ। लेकिन इन सारे मसलों से यह तो प्रमाणित होता ही है कि वह अपने विचारों पर दृढ़ रहे और निर्भीकता के साथ उनको व्यक्त करते रहे। उनका निधन पूरे भारतीय समाज की एक बौद्धिक क्षति है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column on 11 june