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जमीनी जरूरत और चुनावी कदम

चंदन कुमार शर्मा प्रोफेसर  तेजपुर विश्वविद्यालय, असम

पूर्वोत्तर, खासतौर से असम को छोड़कर देश में कहीं भी नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है। जन-प्रतिनिधि तक इस मसले पर उदासीन दिख रहे हैं। बुधवार को राज्यसभा में इस पर बहस होनी थी, लेकिन इसे पेश तक नहीं किया गया। ऐसा लगता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में अंदरखाने यह समझ बनी थी कि सिर्फ आरक्षण विधेयक पर ऊपरी सदन में चर्चा होनी चाहिए। संभव है कि केंद्र सरकार इस पर अध्यादेश ले आए। हालांकि इसकी वैधता ज्यादा से ज्यादा छह महीने ही होगी।
नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ पूर्वोत्तर में दिख रही नाराजगी की कई वजहें हैं। औपनिवेशिक काल से अब तक यहां इतनी अधिक संख्या में अप्रवासी आ चुके हैं कि उनकी संख्या स्थानीय लोगों से ज्यादा हो गई है। 1947 में बंटवारे के समय तो यह खासतौर पर त्रिपुरा और असम में हुआ था। नतीजतन, त्रिपुरा में अब कुल आबादी में सिर्फ एक चौथाई स्थानीय रह गए हैं। इन राज्यों के स्थानीय बाशिंदे लगातार इन बाहरी नागरिकों को देश से बाहर करने की मांग करते रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्वोत्तर की चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी (तब वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे) ने भी वादा किया था कि यहां घुस आए बांग्लादेशियों को पकड़कर वापस उनके देश भेज दिया जाएगा। मगर अब तो नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिए उन्हें यहां हमेशा के लिए बसाने की कोशिश हो रही है। स्थानीय लोग इसीलिए उबल रहे हैं।
नया विधेयक 1955 के नागरिकता कानून में संशोधन करके तैयार किया गया है। अगर इसे संसद की मंजूरी मिल जाती है, तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को 11 साल की बजाय महज छह साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल जाएगी। इसमें बेस ईयर को भी बढ़ा दिया गया है और अब 31 दिसंबर, 2014 तक इन तीनों देशों के जितने अल्पसंख्यक भारत आए हैं, उन सभी को नागरिक अधिकार मिल जाएंगे। बांग्लाभाषी लोगों की बढ़ती संख्या पूर्वोत्तर खासतौर से असम के जनसांख्यिकीय स्वरूप को चिंताजनक रूप से बदल देगी। जनगणना में भी स्थानीय लोगों की आबादी तेजी से घटती दिख रही है, लेकिन इसे लेकर देश के बाकी हिस्सों में कोई चिंता जाहिर नहीं की जा रही। ऐसे में, पूर्वोत्तर के लोग अब स्वाभाविक ही पिछले सौ वर्षों में हुए जनसांख्यिकीय बदलाव की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
नए विधेयक के विरोध की एक वजह इसमें मौजूद धार्मिक विभेद भी है। 1955 के नागरिकता कानून में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है। मगर नया विधेयक कहता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक यानी गैर-मुस्लिम (हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी, ईसाई आदि) को ही नागरिकता मिलेगी। इन तीनों देशों से ज्यादातर हिंदू भारत आते हैं। इसका अर्थ है कि नया विधेयक परोक्ष रूप से इन देशों के हिंदुओं को भारत की नागरिकता देने की बात कहता है। धार्मिक पहचान को नागरिकता का आधार बनाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। संविधान का अनुच्छेद 14 जाति और धर्म के आधार पर सबको समान अधिकार देने की वकालत करता है। फिर, यह विधेयक उन समुदायों को भी नजरंदाज करता है, जो बहुसंख्यक में शामिल होने के बावजूद इन देशों में अल्पसंख्यक की हैसियत में रहते हैं। पाकिस्तान में अहमदिया ऐसा ही एक संप्रदाय है। वहां अच्छी संख्या होने के बावजूद बोहरा समुदाय के लोगों की हालत ठीक नहीं है। इनमें से कई तो भारत आकर बस चुके हैं। नया विधेयक उन्हें यहां से बेदखल कर देगा।
इस समय नागरिकता विधेयक को लाया जाना चुनावी एजेंडा ज्यादा लग रहा है। इसका असर पूर्वोत्तर (खासतौर से असम) और पश्चिम बंगाल में पड़ेगा। यह चुनावी वर्ष है और अगले चंद महीनों में देश में आम चुनाव होने वाले हैं, इसीलिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इन राज्यों में भारी संख्या में मौजूद हिंदू बंगालियों को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। संभवत: इसीलिए इस विधेयक को शीत सत्र के बिल्कुल आखिरी दिनों में लाया गया। नागरिकता संशोधन पर गठित संयुक्त संसदीय कमेटी (जेपीसी) ने पूर्वोत्तर में ठीक से ‘पब्लिक हिर्यंरग’ भी नहीं की। उसने स्थानीय लोगों की चिंता पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह हिर्यंरग बराक घाटी में की गई, जहां बांग्लादेशी हिंदू काफी अधिक संख्या में हैं, जबकि इसका विरोध ब्रह्मपुत्र घाटी में ज्यादा था। गुवाहाटी में सिर्फ एक दिन हिर्यंरग की गई और वहां उमड़ी भारी भीड़ को देखकर फिर से आने का वादा किया गया था। मगर वादे के बावजूद ब्रह्मपुत्र घाटी में संजीदगी से ‘पब्लिक हिर्यंरग’ न होना, संकेत है कि किस तरह इस मामले को निपटाने की कोशिश की जा रही है।
हमारी नीति यह होनी चाहिए थी कि देश में जितने भी बाहरी हैं, उन्हें उनके देश भेज दिया जाए या फिर कोई सर्वमान्य समाधान निकाला जाए। मगर इस विधेयक से उन्हें यहां बसाने की योजना तैयार की गई है। नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 के पारित होने के बाद तमाम अप्रवासी अधिकृत रूप से भारत के नागरिक बन जाएंगे। ऐसे में, यहां की जनसांख्यिकी में भारी बदलाव आएगा, जो किसी बड़े खतरे को न्योतने जैसा होगा। फिर यह कदम ‘अखंड भारत’ की उस संकल्पना के भी खिलाफ है, जिसकी बात अभी तक की जाती रही है, क्योंकि इन देशों में हिंदू रहेंगे ही नहीं। अगर सरकार घुसपैठियों के प्रति संजीदा है, तो वह इन तीनों पड़ोसी देशों की हुकूमत से बात करके वहां के अल्पसंख्यकों का बेहतर रहन-सहन सुनिश्चित करे। इसकी कोशिश भी हो सकती है कि इन देशों में अल्पसंख्यक सम्मान के साथ अपना जीवन बिता सकें। वहां की सरकार अपने अल्पसंख्यक समुदायों की बेहतरी के काम कर भी रही है। लिहाजा इन समुदायों को मातृभूमि से काटकर भारत में बसाने की इस योजना का औचित्य नहीं दिखता। फिर, यह तो भारतीय संविधान के भी खिलाफ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 11 january