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कश्मीर में नई पहल और चुनौतियां

साल 2015 की गरमियों में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव के साथ मिलकर कश्मीरी पंडितों के नेताओं (मुख्य तौर पर संघ परिवार से जुडे़) के साथ एक बैठक आयोजित करने का जिम्मा मुझे सौंपा था। मैं तब मुफ्ती मोहम्मद सईद का सलाहकार हुआ करता था। उनका यह काम आपसी विश्वास पैदा करने की दिशा में पहला कदम था, जो अंतत: कश्मीरी पंडितों की गरिमापूर्ण वापसी में सहायक होता। मुख्यमंत्री ने दूरदर्शिता दिखाते हुए कश्मीरी पंडितों के नेतृत्व के साथ अपनी नीति साझा की और कहा- ‘आपको हमारी जरूरत नहीं है, बल्कि हमें आपकी जरूरत है। आप आबाद हैं, जहां भी हैं। घाटी की विविधता में आपका योगदान था, और इसके बिना हकीकत में निर्वासित हम हैं।’ मुफ्ती ने ये विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल के साथ नाश्ते पर दोहराए भी। मगर वह मुलाकात और वे सपने मुफ्ती के निधन के साथ फीके पड़ते गए। 
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की श्रीनगर यात्रा और संसद के दोनों सदनों में जम्मू-कश्मीर पर उनके द्वारा की गई चर्चा ने उन उम्मीदों को फिर से जिंदा कर दिया है। शाह ने बिना लाग लपेट के बताया कि एक समग्र नीति के तहत केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों के दिल और दिमाग को जीतने के लिए हर मुमकिन कोशिश करने को प्रतिबद्ध है। बकौल शाह, यह काम सूबे की स्थिरता, समृद्धि और भविष्य में उन्हें वास्तविक हिस्सेदारी देकर; ईमानदार शासन और अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा प्रदान करके; नौजवानों को सशक्त बनाकर; और उन पारंपरिक मूल्यों को वापस लाकर किया जा सकता है, जिसे कश्मीरियत (सूफी मत के साथ शैववाद का अनूठा मिश्रण) कहा गया है। हालांकि शाह और बेहतर कर सकते थे, यदि वह 14वीं सदी के रहस्यवादी कवि लालदेद की उस पंक्ति को उद्धृ़त करते, जिसमें कहा गया है- शिव सूर्य के समान हैं; उसकी किरणें हिंदुओं और मुसलमानों में किसी तरह का कोई फर्क नहीं करतीं। 
यह स्पष्ट है कि अमित शाह के एजेंडे में जम्मू-कश्मीर सबसे ऊपर है, पर वह अपने मिशन में तभी सफल होंगे, जब उनका प्रयास नौकरशाही के भ्रम से दूर रहेगा। इसी नौकरशाही के प्रपंच ने कश्मीर के मसले को ज्यादा उलझाया है। मेरा मानना है कि नए गृह मंत्री किसी की परवाह किए बिना यह तय करेंगे कि नौकरशाहों की शाही मानसिकता (एक खास वर्ग के अधिकारियों की मानसिकता ही सही) इस मसले पर हावी न होने पाए।
दरअसल, शाह को जल्द ही यह एहसास हो गया कि जम्मू-कश्मीर मसले का समाधान राजनीति में ही छिपा है। दुर्भाग्य से राज्य में बुरी राजनीति को लगातार अच्छी राजनीति पर हावी होने दिया गया। इस बुरे व्यवहार को वैचारिक उलझन से घिरी नई दिल्ली ने ऐतिहासिक रूप से उकसाया और उसने इसका विस्तार कुशासन के रूप में अन्य क्षेत्रों में किया। लिहाजा, इस मसले का हल महज ऊपरी तौर पर नहीं निकाला जा सकता, बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम की बुनियाद पर चोट करनी होगी, जिसमें सत्ता और आर्थिक लाभ महज कुछ परिवारों तक सिमटा है। यह स्थिति कश्मीर में ही नहीं, बल्कि जम्मू में भी है।
गृह मंत्री शाह की ‘डॉक्ट्रिन’ के छह तत्व हैं। पहला, आतंकवाद और उग्रवाद से किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हिंसा का प्रचार करने वाले किसी को बख्शा नहीं जाएगा, फिर चाहे वह किसी भी दल का क्यों न हो। दूसरा तत्व, अधिकार की राजनीति का अंत किया जाएगा; चाहे वे राष्ट्रीय हित की निरर्थक उम्मीद में पाले जाने वाले राजनेता हों, अखबार हों या फिर नौकरशाह। तीसरा, हर स्तर पर स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करके और जमीनी स्तर पर सत्ता का विकेंद्रीकरण करते हुएलोकतंत्र को मजबूत किया जाएगा। चौथा, शैक्षणिक व एक्स्ट्रा करिक्युलर महत्व (पाठ्येतर गतिविधियों) के  संस्थानों का जल्द से जल्द निर्माण किया जाएगा और इस तरह से कुशल रोजगार का निर्माण होगा, ताकि हर नौजवान को काम मिल सके और वे कट्टरपंथी विचारों से धीरे-धीरे दूर हो जाएं। 
पांचवां, क्षेत्रीय संतुलन को बेहतर बनाया जाएगा, ताकि जम्मू और लद्दाख में कायम भेदभाव की भावना खत्म हो जाए। इसके साथ ही, घाटी में कश्मीरी पंडितों की गरिमापूर्ण और सम्मान के साथ वापसी के हालात बनाए जाएंगे। और आखिरी तत्व, राज्य में हिंसा को रोकने और स्थाई शांति स्थापित करने के लिए सार्थक भरोसा बहाली में यकीन रखने वाले तत्वों के साथ बातचीत की जाएगी। दीगर है कि गृह मंत्री की कश्मीर यात्रा के दौरान अलगाववादियों ने किसी तरह के बंद की घोषणा नहीं की थी और हर विचारधारा के नेतागण अब बातचीत के लिए स्वेच्छा से आगे आ रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान की तरफ से भी घुसपैठ की निम्नतम कोशिशें हुईं और संघर्ष विराम की भी छिटपुट घटनाएं सामने आईं।
हालांकि यह सब करना आसान नहीं होगा और यह अमित शाह के कौशल, राजनीतिक इच्छाशक्ति और केंद्र की प्रतिबद्धता की भी परीक्षा लेगा। कश्मीर प्रतिष्ठा का कब्रिस्तान माना जाता है, और शाह की ‘डॉक्ट्रिन’ की असली परीक्षा तो आगामी विधानसभा चुनाव में होगी, जब कश्मीरियों की इसमें सक्रिय भागीदारी का आकलन होगा। शाह को इस चुनौती से भी पार पाना होगा कि जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का हल सिर्फ सांविधानिक उपायों के भरोसे नहीं निकाला जा सकता, बल्कि राज्य की बहुसंख्यक आबादी को यह एहसास दिलाना होगा कि भारत के साथ उनका जुड़ाव उनके लिए ज्यादा अवसर पैदा करेगा, उन्हें ज्यादा आजादी और विस्तार मुहैया कराएगा, और उनके अधिकारों को उनकी अपनी ‘आजादी’ के मनहूस सपने से कहीं अधिक मजबूत बनाएगा। और यही चुनौती गृह मंत्री के लिए सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण साबित होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 10 july