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बिगड़ते रिश्तों में युद्धविराम उल्लंघन

टीसीए रंगाचारी पूर्व राजनयिक

चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स  ने बताया है कि बीजिंग ने तिब्बत में होवित्जर तोपों की तैनाती की है। अखबार की मानें, तो ऐसा चीन के सैनिकों की युद्ध क्षमता को निखारने के लिए किया गया है। इस खबर ने कई भारतीयों को परेशान कर दिया है। वे इस चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं कि चीन कहीं भारत से एक और जंग की तैयारी तो नहीं कर रहा? अपने पक्ष में वे तमाम तरह के तर्क परोस रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस बयान का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने अपने देश की सेना को अपनी जंगी क्षमता सुधारने और युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहने का आदेश दिया था। पर क्या वाकई चीन भारत से जंग चाहता है? 
दरअसल, यह चीन के हक में नहीं है कि वह अगले कुछ वर्षों में भारत से कोई युद्ध लड़े। खासतौर से एक ऐसे दौर में, जब अमेरिका के साथ उसके रिश्ते लगातार बिगड़ रहे हैं। यही वजह थी कि पिछले साल डोका ला में सैनिकों के आमने-सामने आने के बाद भी दोनों देशों की सेनाएं अपनी-अपनी छावनियों में ही रहीं। चीन के राष्ट्रपति का हालिया बयान सिर्फ अपने सैनिकों में जोश भरना था, और इस तरह के बयानात कमोबेश हर देश की सेना के सर्वोच्च कमांडर उस वक्त देते हैं, जब वे अपने सैनिकों से मुखातिब होते हैं।
रही बात तिब्बत में उसकी हालिया गतिविधियों की, तो चीन अपनी सीमा में कुछ भी करने को स्वतंत्र है। यह उसकी संप्रभुता से जुड़ा मसला है। इसमें भारत किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। वैसे भी, भारत और चीन में सीमा से जुड़े अब तक के तमाम समझौते हमें नाउम्मीद नहीं करते हैं। साल 1993 और 1996 का समझौता तो खासा उल्लेखनीय है, जिनमें दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि सीमा से कितनी दूरी पर वे सैनिकों को तैनात करेंगे और कितनी दूरी पर युद्धाभ्यास करेंगे? इन तमाम समझौतों की सफलता को देखते हुए ही सीमा प्रबंधन से जुड़ा एक और समझौता दोनों देश के बीच होने जा रहा है।
मुझे 1999 की कारगिल जंग अब भी याद है। तब मैं संयुक्त सचिव के पद पर तैनात था और चीन से जुड़े असाइनमेंट पर काम कर रहा था। कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री ने चीन का दौरा किया था। उस वक्त लोग मुझसे सवाल पूछा करते थे कि चीन जब पाकिस्तान का मददगार है, तब यह दौरा कैसे संभव हुआ? तब मेरा एक ही जवाब होता कि चीन के भी अपने हित हैं, और वह इससे कोई समझौता नहीं कर सकता। तब बीजिंग ने जरूर छोटी-मोटी हरकतें की थीं, लेकिन उसने हमें ज्यादा परेशान नहीं किया था।
भारत की सीमा से जुड़ी एक अन्य खबर पाकिस्तान से आई है, जिसमें कहा गया है कि संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं पिछले 15 वर्षों में सबसे ज्यादा पिछले साल हुईं। इन घटनाओं में 60 से अधिक लोगों की जान गई है। यह दुखद है कि एक तरफ तो पाकिस्तान के नए वजीर-ए-आजम इमरान खान यह कहने से नहीं चूकते कि भारत शांति-प्रस्तावों का जवाब तक नहीं देता, और दूसरी तरफ उनकी फौज हमारे लोगों को निशाना बनाती है। बेशक इमरान खान करतारपुर गलियारा खोलने जैसी पहल को अपनी उपलब्धि बता सकते हैं, मगर उन्हें यह समझना चाहिए कि ऐसे कदमों की भी अपनी सीमा होती है। उन्हें यदि भारत के साथ सच्चे अर्थों में रिश्ता सुधारना है, तो कुछ ईमानदार पहल करें।
ऐसा एक कदम है, भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ यानी तरजीही मुल्क का दर्जा देना। भारत ने करीब 20 साल पहले ही पाकिस्तान को यह दर्जा दे दिया था, लेकिन पाकिस्तान अब तक इसे लेकर उलझन में है। साल 2014 में स्थिति इस मुकाम तक जरूर पहुंच गई थी कि लगा, अब सिर्फ दस्तख्त होने हैं। मगर तब यह कहते हुए पाकिस्तान ने कदम वापस खींच लिए कि भारत लोकसभा चुनावों में उलझा है। वह दिन दोबारा कभी नहीं आया। जबकि इस पहल का फायदा पाकिस्तान को भी खूब होगा। यदि वह हमें यह दर्जा देता है, तो अफगानिस्तान से होने वाला भारत का कारोबार भी पाकिस्तान के रास्ते होगा, जो इस्लामाबाद के खजाने को भरने का काम करेगा। 
अगर पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री बड़े कदम नहीं उठा सकते, तो वह छोटी-छोटी पहल करके माहौल बना सकते हैं। मसलन, वह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की उस मांग पर गौर कर सकते हैं, जिसमें कमेटी ने पाकिस्तान के गुरुद्वारों के प्रबंधन की इच्छा जाहिर की थी। पाकिस्तान चाहे, तो ऐसी कोई संस्था बना सकता है, जो इस कमेटी से संबद्ध हो। इस तरह का प्रयास कितना भरोसा पैदा करता है, यह भारत से सीखा जा सकता है। हमारे यहां कैथोलिक चर्च वेटिकन से संबद्ध हैं। रही बात जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील मसले की, तो पाकिस्तानी हुक्मरां यह बखूबी जानते हैं कि इस मामले में उनकी जमीन कितनी हल्की है। 1988-89 में, जब कश्मीर मसला अपने चरम पर था, तब भी पाकिस्तानी नेता और फौज के लोग इस हकीकत से वाकिफ थे कि कश्मीर उनके हिस्से में नहीं आएगा। अब तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे से अपनी आंखें भी फेर चुका है।
पाकिस्तान की फौज जब तक अपने भीतर हिन्दुस्तान से रिश्ते सुधारने की इच्छाशक्ति नहीं पैदा करेगी, तब तक दोनों देशों की सीमा पर तनाव बना रहेगा। चूंकि इमरान खान को फौज की पसंद का नेता माना जाता है, इसलिए उम्मीद यही है कि वह पिछले तमाम प्रधानमंत्रियों से बेहतर साबित होंगे। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि विदेश नीति के मोर्चे पर फौज उन्हें कितना ढील देना पसंद करेगी? पाकिस्तान को अपनी कथनी और करनी के फर्क को मिटाना होगा। सबसे पहले तो उसे अपने यहां पल रही आतंकी जमातों को खत्म करना होगा, क्योंकि इसी की वजह से माहौल बिगड़ता है। यदि वह ऐसा करता है, तो यह उसका ‘सकारात्मक रवैया’ दिखाएगा। वैसे भी, कोई बातचीत तभी फलदायक होती है, जब सकारात्मक सोच के साथ वार्ता की मेज पर बैठा जाए। आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 10 january