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सीमा पर विराम का संघर्ष

ओपिनियन

बीते मंगलवार को भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) के बीच हॉटलाइन पर हुई बातचीत के बाद सीमा रेखा के दोनों तरफ की बंदूकें शांत हो गई हैं। दोनों सैन्य अधिकारियों में 2003 के संघर्ष-विराम (सीजफायर) को फिर से लागू करने पर सहमति बनी है। वह कोई लिखित समझौता तो नहीं था, पर काफी असरदार रहा था। सवाल है कि क्या 15 वर्ष पुराना यह संघर्ष-विराम समझौता इस बार भी अपना वैसा ही असर डालेगा? यह सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि मौजूदा संघर्ष-विराम कितना टिक पाता है। हमने इस तरह की बातचीत और संघर्ष-विराम पहले भी देखे हैं, जो कुछ दिन या महीने ही कायम रह सके, क्योंकि हर बार पाकिस्तान की तरफ से इसका उल्लंघन किया गया। 

अगर मौजूदा सीजफायर अस्थाई है, तो फिर इसका ज्यादा मतलब निकालने की वजह नहीं है। मगर कुछ ऐसे संकेत मिल रहे हैं, जो बताते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे से फिर से संवाद कायम करने को लेकर कुछ बड़ी योजना बना रहे हैं। ऐसा सोचने की वजह यह है कि दोनों फौजों की तरफ से जो बयान जारी किए गए हैं, वे लगभग एक जैसे हैं। जबकि होता यही है कि इतनी जल्दी बातचीत में अगर कोई वक्तव्य जारी किया जाता है, तो वह शायद ही समान होता है। कूटनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाले लोग भी यह देख रहे होंगे कि अगर इस बार इतनी जल्दी यह सब कुछ हुआ है, तो परदे के पीछे जरूर कुछ तय पाया गया है या कोई ऐसी साझा राय बनी है, जिसके तहत संघर्ष-विराम की घोषणा की गई।
साल 2003 में भी जब संघर्ष-विराम पर सहमति बनी थी, तो उसकी घोषणा से पहले भी परदे के पीछे शीर्ष अधिकारियों में गहन बातचीत हुई थी। अगले साल सार्क बैठक में भाग लेने के लिए जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस्लामाबाद पहुंचे थे और वहां के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से उनकी सार्थक बातचीत हुई थी, तो उससे पहले भी ‘बैक डोर डिप्लोमेसी’ हो चुकी थी। जबकि परदे के आगे के तमाम बयानात विपरीत थे। इस बार भी करीब-करीब वही दृश्य उभरते दिखाई दे रहे हैं।

दोनों देश आखिर किस योजना पर आगे बढ़ना चाहते हैं? पाकिस्तान में आज से ‘केयरटेकर गवर्नमेंट’ ने काम करना शुरू कर दिया है, जिसका काम मुख्यत: आम चुनाव कराना है। करीब दो महीने के लिए बनी इस सरकार के पास बड़े नीतिगत फैसले लेने का कोई अधिकार नहीं है। अभी यह भी तय नहीं है कि दो महीने के बाद वहां किस पार्टी की सरकार बनेगी और उसकी नीतियां क्या होंगी? हमारी सरकार भी इन सब बातों से वाकिफ होगी। ऐसे में, मौजूदा माहौल में बातचीत शुरू करने का मतलब स्पष्ट है कि भारत अब वहां की हुकूमत से नहीं, बल्कि उस प्रतिष्ठान से बात करने को इच्छुक है, जो उसकी नीतियां बनाता है। यह प्रतिष्ठान कोई और नहीं, पाकिस्तान की फौज और ‘डीप स्टेट’ है। फौज का ढांचा तो जगजाहिर है, पर ‘डीप स्टेट’ फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई के शीर्ष अधिकारियों का एक ऐसा असांविधानिक व गोपनीय ढांचा है, जो वहां की सियासत व रियासत में पर्याप्त दखल रखता है। लगता है कि हमारी सरकार ने अब सीधे इसी से बात करने की ठान ली है। अगर ऐसा है तो यह हमारी नीति में बड़ा बदलाव दिखा रहा है। अब तक हम तमाम मसलों को लेकर बातचीत सिर्फ पाकिस्तान की सरकार (चाहे वह जम्हूरी हो या सैन्य) से ही करते रहे हैं। मगर अब शायद हमारे लिए वहां की सरकार मायने नहीं रखेगी।

इसमें एक विरोधाभास भी है। हम फौज और ‘डीप स्टेट’ से बात करने को इच्छुक तो दिख रहे हैं, पर यह कहना मुश्किल है कि यह वाकई फायदे का सौदा होगा। आज भी पाकिस्तानी फौज के रवैये में शायद ही कोई तब्दीली आई है। तो क्या इसे वक्ती जरूरत को देखकर मेल-मिलाप के लिए पाकिस्तान का हाथ बढ़ाना माना जाए? यह हो सकता है, क्योंकि इस वक्त पाकिस्तान पर आर्थिक, कूटनीतिक, सामरिक और राजनीतिक, सभी तरह के दबाव हावी हैं। इस वक्त भारत-पाकिस्तान की सीमा पर शांति का माहौल उसके लिए काफी राहत वाला होगा। इसका वह अपने हित में पूरा फायदा उठा सकता है। देखा जाए, तो इस वक्त पाकिस्तान का झुकना उसकी मजबूरी ज्यादा लग रही है।  

इसके बावजूद भारत सरकार बातचीत का दौर फिर से शुरू करने के लिए गंभीर है। हो सकता है कि उसे यह आश्वासन मिला हो कि पाकिस्तान की फौज कुछ भी करने को तैयार है। देश के कुछ विश्लेषक इसमें और भी कईं तरह के अर्थ देख रहे हैं। हमारे लिए 2019 चुनावी वर्ष होगा। माना जा रहा है कि सत्तारूढ़ दल पाकिस्तान को लेकर किसी ऐसी ‘उपलब्धि’ की तलाश में है, जिसके साथ वह आम चुनाव में उतर सके। कुछ ऐसी ही ‘रणनीति’ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी बनाई थी, जब वह बस लेकर लाहौर गए थे। हां, यह अलग बात है कि जवाब में उन्हें कारगिल मिला। इस बार भी तस्वीर शायद ही बदले। अभी बेशक कुछ लोग पाकिस्तानी फौज से दोस्ती का ख्वाब देख रहे हों, पर हकीकत में वे ख्याली पुलाव पका रहे हैं। वहां से छनकर आ रही खबरों की मानें, तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर जितनी नफरत पाकिस्तान की फौज, रियासत और राजनेताओं में है, उतनी शायद किसी और के प्रति नहीं है। इतनी नफरत लेकर वे हमारी सरकार के साथ किसी बड़े समझौते के लिए शायद ही तैयार होंगे। खतरा यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी की छवि खराब करने के लिए वे चुनाव से ऐन पहले अपने कदम खींच लें। मगर जैसे 1999 में कारगिल युद्ध के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने पासा पलट दिया था, शायद नरेंद्र मोदी ने भी ‘प्लान बी’ तैयार कर लिया होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column on 1 june