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आपराधिक लापरवाही और बेबस लोग

Retired UP Fire Officer PK Rao

दुर्घटना का कोई तयशुदा वक्त नहीं होता। यह किसी के साथ कभी घट सकती है। लेकिन कुछ हादसे ऐसे भी होते हैं, जो हमारी असावधानी और लापरवाही के कारण होते हैं। राजधानी दिल्ली के करोल बाग इलाके के अर्पित पैलेस होटल में मंगलवार तड़के लगी आग ऐसी ही एक दुर्घटना है। हालांकि अपने देश में आग लगने की ज्यादातर घटनाएं लापरवाही की वजह से ही होती हैं। इसमें कभी आम लोग कुसूरवार नजर आते हैं, तो कभी हमारा तंत्र। मंगलवार तड़के दिल्ली का जो होटल आग की चपेट में आया, उसे भी महज चार मंजिल बनाने की मंजूरी मिली थी, पर उसने अनुचित रूप से इससे ऊपर निर्माण कराया। स्थानीय प्रशासन ने भी समय रहते संजीदगी नहीं दिखाई और वह कोई बंदिश लगाने में विफल रहा। 
 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल 22,000 से 24,000 लोगों की मौत आग या इससे जुड़ी घटनाओं की वजह से होती है। ब्यूरो के मुताबिक, यह अपने देश में अकाल मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। आग इसलिए भी इतने लोगों के जीवन लील रही है, क्योंकि हमने बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं तो खड़ी कर लीं, मगर एयर कंडिशनिंग की वजह से खिड़कियों को बेमानी कर दिया। आमतौर पर हम इसे बंद रखना पसंद करते हैं। जबकि जहरीला धुआं जब इंसान के फेफड़ों में भरता है, तो वह अचेत हो जाता है और हादसे वाली जगह से भाग नहीं पाता। यही वजह है कि आग से होने वाली कुल मौतों में लगभग 80 फीसदी मौत दम घुटने से होती है। होटलों के साथ मुश्किल यह भी है कि वहां के स्टाफ मेहमानों को शायद ही यह बताते हैं कि आपात स्थिति में उन्हें किधर से बच निकलना है?
 

हमारा नेशनल बिल्डिंग कोड यानी राष्ट्रीय भवन निर्माण संहिता भी इस तरह की घटनाओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। यह संहिता चार मंजिल भवन में अग्नि सुरक्षा की किसी विशेष व्यवस्था की बात नहीं कहती। इसका पूरा ध्यान ‘हाई-राइज बिल्डिंग’ पर है। मगर अकेली दिल्ली में आग लगने की 99 फीसदी घटनाएं ‘लो राइज बिल्डिंग’ में हो रही हैं। चूंकि इन छोटे-छोटे कमरों के फ्लैट में लोगों की बेतरतीब बसावट होती है, इसलिए आग से जान-माल की क्षति भी ज्यादा होती है। लिहाजा हमें ‘इंजीनियरिंग ओरिएंटेड कोड’ की जरूरत है, जो स्थानीय परिस्थिति को ध्यान में रखकर तैयार की गई हो। एक दिक्कत यह भी है कि अग्नि सुरक्षा के हमारे अधिकतर मानक विदेशों की नकल करके बनाए गए हैं। इसीलिए इसमें उस समस्या से पार पाने का कोई रास्ता नहीं है, जो हम भारतीयों की ‘संस्कृति’ का हिस्सा बन गई है। जैसे, एनसीआरबी बेशक अपने यहां सबसे ज्यादा मौत की वजह सड़क दुर्घटना को माने, लेकिन यहां की सड़कों पर हेलमेट हाथ में पकड़े बाइक चलाते लापरवाह लोग आसानी से देखे जा सकते हैं।
 

परेशानी की बात यह भी है कि हमारे सत्ता-प्रतिष्ठानों ने अग्निशमन सेवा को उतना महत्व नहीं दिया, जितनी की यह हकदार है। इससे जुड़े अधिकतर संस्थानों की जिम्मेदारी गैर-जानकार और अनुभवहीन अधिकारियों के हाथों में है। कुछ संगठनों में योग्य लोग जरूर हैं, पर उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक हैं। इसीलिए अग्निशमन सेवा का चरित्र आग लगने पर उसे बुझाना मात्र रह गया है। यहां कर्मियों की भी इतनी कमी है कि समय-पूर्व निगरानी की माकूल व्यवस्था नहीं हो पाती, जबकि समय-समय पर जांच-पड़ताल से इन घटनाओं से काफी हद तक बचा जा सकता है। बेशक देश में इतने कर्मियों की नियुक्ति संभव नहीं कि हर घर की बराबर निगरानी हो सके, लेकिन किसी बाहरी एजेंसी से यह काम साझा जरूर किया जा सकता है। 
 

वक्त का तकाजा यही है कि शीर्ष स्तर पर अग्निशमन सेवा के महत्व पर पर्याप्त चर्चा की जाए। हमारे नीति-नियंता अमेरिका, जापान और कोरिया का उदाहरण तो खूब गिनाते हैं, लेकिन बात जब अग्निशमन सेवा की आती है, तो वहां की तकनीक वे अपने देश में नहीं उतार पाते। जैसे, अमेरिका में पानी के कम दबाव में भी काम कर सकने वाली ‘स्प्रिंगकलर’ (फव्वारे) इस्तेमाल की जाती है, जो छोटे-छोटे घरों के लिए फायदेमंद है। मगर अपने यहां ऐसा कोई प्रयोग नहीं हो सका है। फिर, इस सेवा में मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया या कौंसिल ऑफ आर्किटेक्चर जैसी किसी नियामक संस्था का भी अभाव है। अभी थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला भी खुद को ‘फायर सर्विस कंसल्टेंट’ बताने लगता है। हालांकि पहले यही तर्क दिए जाते थे कि इस विधा में खास पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं। मगर अब तो देश में दस से भी अधिक फायर इंजीनियरिंग कॉलेज अस्तित्व में हैं, जहां स्नातक से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई हो रही है। इसीलिए इन संस्थानों से निकलने वाले योग्यताधारियों को भी उसी तरह मान्यता मिलनी चाहिए, जिस तरह हम डॉक्टरों या वास्तुविदों को देते हैं। 
 

दरअसल, भारत में बड़े व्यवस्थागत बदलाव की दरकार है। सबसे पहले तो ऐसी कोई नियामक संस्था बने, जिसमें योग्यता और अनुभव को बराबर महत्व दिया जाए, और किसी संबंधित अधिकारी की अनुमति मिलने के बाद ही निजी व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट जारी हो। फिर, उन मुश्किलों का भी निवारण जरूरी है, जो इंस्पेक्टर राज में लाइसेंस हासिल करने में लोगों को होती हैं। इसी कारण लोग गैर-मुनासिब राह अपनाते हैं। अभी कई टेबल से गुजरकर फाइल वहां तक पहुंच पाती है, जहां किसी प्रतिष्ठान को आग से होने वाली दुर्घटनाओं से जुड़ा ‘एनओसी’ (अनापत्ति प्रमाण-पत्र) मिलता है।  
 

हर घटना में कोई न कोई ऐसा संदेश छिपा होता है, जिस पर विचार करके हम भविष्य के लिए चेत सकते हैं। दिल्ली की इस दुखद दुर्घटना में भी कई सबक छिपे हैं। सवाल यह है कि क्या हम उन पर गौर करेंगे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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  • Web Title:Opinion Hindustan Column 13th February