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29 जनवरी, 2020|12:02|IST

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मूल अधिकार को विस्तार देता फैसला

पवन दुग्गल

सांविधानिक हैसियत बदलने के बाद जम्मू-कश्मीर में लगाई गई पाबंदियों पर शुक्रवार को आया शीर्ष अदालत का फैसला दूरगामी महत्व रखता है। इसके निहितार्थ सिर्फ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए हैं। यह पहला ऐसा फैसला है, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर इंटरनेट की भूमिका को पहचाना है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व किसी भी व्यवसाय के संचालन के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार का रूप दिया है। बेशक पूर्व में ऐसी बातें         कही जाती रही हैं और संदर्भ के तौर पर यह जिक्र भी 
किया जाता रहा है, लेकिन आज से पहले ये बातें इतनी स्पष्ट रूप में हमारे सामने नहीं आई थीं, जबकि ये सभी को पता थीं। लिहाजा भारत की स्वतंत्रता के बाद लिखे जाने वाले इतिहास में शुक्रवार का फैसला सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।
यह फैसला मान्यता देता है कि इंटरनेट का न सिर्फ मोल और महत्व है, बल्कि यह मानव जीवन का            केंद्र-बिंदु भी है। जैसे ही इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाती है, लोगों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी हमें संविधान के अनुच्छेद 19 से हासिल है, जबकि जीवन जीने का मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत। ऐसे में, आज इंटरनेट ही एकमात्र ऐसा जरिया है, जो किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी ओहदे या स्थान पर हो, तुरंत एक अंतरराष्ट्रीय लेखक, प्रसारणकर्ता (ब्रॉडकास्टर) और हस्तांतरित करने वाला (ट्रांसमीटर) बना देता है, यानी विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इंटरनेट से बेहतर कोई दूसरा माध्यम आज हमारे पास नहीं है।
अब जबकि अदालत ने इंटरनेट को नई मान्यता दी है, तो कई सारी गुत्थियां सुलझ सकेंगी। हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि इंटरनेट के इस्तेमाल को लेकर हमें अबाध आजादी हासिल हो गई है। अब भी इसके इस्तेमाल पर मुनासिब प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसा संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत किया जा सकता है। जब भारत की संप्रभुता, अखंडता या सुरक्षा पर कोई आंच आए, पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ने की आशंका हो (सीमावर्ती इलाकों के लिए), व्यवस्था कायम करना हो, और सामाजिक मर्यादा व नैतिकता की रक्षा करनी हो, तो इंटरनेट का इस्तेमाल प्रतिबंधित किया जा सकता है। हां, अब तक चूंकि कानून और व्यवस्था के बिगड़ने के अंदेशे मात्र से सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा देती थी, अब उसे इसकी वाजिब वजह बतानी होगी। 
ताजा अदालती फैसले के बाद सरकार की जवाबदेही ज्यादा बढ़ गई है। इससे पारदर्शिता का भी इजाफा होगा। इंटरनेट के इस्तेमाल पर वह अब मनमर्जी रोक नहीं लगा पाएगी। अगर वह ऐसा करती है, तो उसके फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी। अब चूंकि आला अदालत ने इंटरनेट के प्रतिबंध को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है, तो इससे जुड़े हाईकोर्ट में जो तमाम मामले लंबित थे, उन पर जल्दी ही फैसला आने की उम्मीद भी बढ़ गई है।
इंटरनेट आज कितना कारगर माध्यम है, यह हमने ‘अरब स्प्रिंग’ में देखा था। पिछले दशक के आखिरी वर्षों और नए दशक की शुरुआत में हुई इस क्रांति में हमने देखा कि किस तरह मिस्र में स्थानीय सरकार ने इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसका सीधा असर यह दिखा कि वहां की सरकार का तख्ता पलट हुआ और क्रांति आ गई। साफ है, अब अपने यहां भी सरकार कहीं न कहीं सावधान हो गई होगी। उसे अब इंटरनेट पर रोक लगाने संबंधी अपने किसी भी फैसले पर न सिर्फ काफी विचार करना पड़ेगा, बल्कि उसका कारण भी जनता से साझा करना होगा। एक सप्ताह के भीतर अपने फैसले की समीक्षा भी करनी होगी। इसका अर्थ है कि अब सरकारों को सामंजस्य बनाकर चलना होगा। 
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में भारतीयों को मिली आजादी और अधिकारों के इस्तेमाल को न्याय के तराजू में एक तरफ और सुरक्षा को दूसरी तरफ रखा है। अदालत ने माना है कि दोनों में मौलिक विरोधाभास हैं। लिहाजा यह अब सरकार की जवाबदेही है कि वह दोनों में संतुलन बनाकर चले। यानी, उसे लोगों के अधिकार और उनकी आजादी को भी बरकरार रखना होगा और राष्ट्र की संप्रभुता व सुरक्षा भी अक्षुण्ण रखनी होगी।
इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया है कि इंटरनेट के वैश्विक प्रभाव को कतई नजरंदाज नहीं किया जा सकता। किसी इलाके में गड़बड़ी या इसकी आशंका होने या बिगड़ती कानून-व्यवस्था के आधार पर सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा देती थी। आतंकी घटना की सूरत में भी यदि आतंकियों को इंटरनेट से फायदा मिलने की आशंका हो, तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। सीमावर्ती इलाकों में तो दुश्मन देशों के दुष्प्रचार को रोकने के लिए वक्त-बेवक्त यह किया ही जाता है। मगर अब बिना किसी ठोस वजह के महज एहतियातन इंटरनेट पर रोक लगाना उचित नहीं होगा। वैसे भी, यह कोई कारगर उपाय नहीं है। कुछ देर के लिए बेशक लोग इसे बर्दाश्त कर लें, लेकिन लंबे कालखंड के लिए ऐसा करना मुफीद नहीं।
साफ है, सरकार को फूंक-फूंककर यह हथियार इस्तेमाल करना होगा। उसे समझना होगा कि इसका वह जितना ज्यादा इस्तेमाल करेगी, लोगों का आक्रोश उतना ज्यादा बढ़ेगा। आज इंटरनेट का इतना विस्तार हो गया कि महज एक घंटे की रोक से लोगों के करोड़ों रुपये स्वाहा होते हैं। इंटरनेट का यह आर्थिक पक्ष संभवत: दूसरे तमाम तर्कों पर भारी साबित हुआ है। इसलिए इंटरनेट को बाधित करने की बजाय उसका संभलकर इस्तेमाल करने को लेकर सरकार लोगों को जागरूक करे। शुक्रवार का अदालती फैसला इसकी ओर भी इशारा करता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Hindustan column 11 january