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चीन में भी जारी है गरीबी से जंग

अनिल आजाद पांडेय, चाइना रेडियो (हिन्दी सेवा)

गरीबी से पूरी तरह छुटकारा पाना एवरेस्ट फतह करने से कम नहीं होता। चीन विश्व के उन चुनिंदा देशों में है, जहां कुछ ही दशक में एक बड़ा मध्य वर्ग तैयार हो चुका है, जिसकी उपभोग क्षमता बहुत अधिक है। विश्व में सबसे अधिक खर्च करने वाले पर्यटक चीन के हैं। आर्थिक विकास के चलते लोगों की प्रति व्यक्ति आय में इजाफा देखने को मिला है, लेकिन इसके साथ ही, वहां गरीबी से जंग भी जारी है। चीन में इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि अमीरी और गरीबी की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। एक तरफ अरबपतियों की तादाद तेजी से बढ़ी है, तो वहीं बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो बमुश्किल जीवन बिता रहे हैं। शहरों और गांवों के बीच का फासला भी कम नहीं है। जिस समय भारत गरीबों की मदद के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसे फॉर्मूलों पर विचार कर रहा है, चीन में गरीबी उन्मूलन पर कवायद जारी है।

चीन में जिस गरीबी की बात की जाती है, वह मुख्य तौर पर ग्रामीण इलाकों की गरीबी है। 1979 के बाद ओपन डोर पॉलिसी, यानी खुले दरवाजे की नीति लागू किए जाने से विकास ने ऐसी गति पकड़ी कि शहरी गरीबी अब लगभग खत्म हो चुकी है। वहां दो समय के भोजन के लिए परेशान रहने वाले लोग कुछ ही साल में मध्य वर्ग में शामिल हो गए हैं। भले ही वहां लोगों का जीवन स्तर अस्सी के दशक में तेजी से ऊपर उठा हो, लेकिन चीन ने गरीबी मिटाने की दिशा में पिछले एक दशक से तेजी दिखानी शुरू की। सरकारी आंकड़ों की मानें, तो छह साल पहले चीन में नौ करोड़, 89 लाख, 90 हजार गरीब थे। मगर पिछले वर्ष गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या महज एक करोड़, 66 लाख रह गई। इस दौरान गरीब आबादी में आठ करोड़ की भारी गिरावट दर्ज की गई। सरकार का दावा है कि पूर्वी चीन के नौ प्रांतों और शहरों में राष्ट्रीय मानकों के तहत कोई भी गरीब नहीं है। अब गरीब क्षेत्रों की 300 काउंटियों और एक करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकालने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। लक्ष्य यह रखा गया है कि 2020 तक चीन में कोई गरीब न बचे। 

चीनी सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, जिस व्यक्ति की वार्षिक आय 3,000 युआन (लगभग 30,000 रुपये) से कम होती है, वह गरीब की श्रेणी में आता है। भारत की तुलना में चीन में ग्रामीण गरीबों की गणना करना आसान है, क्योंकि शहरों में रेजिडेंस परमिट व्यवस्था लागू है, जिसे ‘हूखोउ’ कहा जाता है। इसे हासिल करना किसी गांववासी या अन्य शहर के नागरिक के लिए मुश्किल होता है। दिल्ली में रहने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को दिल्लीवासी कह सकता है, लेकिन चीन में ऐसा संभव नहीं है। हां, अगर किसी व्यक्ति के पास हूखोउ है, तो उसके बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलता है। यहां तक कि बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता भी। बीजिंग में यह राशि 750 युआन है। हालांकि गांवों में अब तक यह व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी है। इस दिशा में चीन सरकार प्रयास भी कर रही है। चीनी प्रधानमंत्री द्वारा योजना आयोग के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट में गरीबी खत्म करने पर विशेष जोर दिया गया है। साथ ही, इस साल 126.095 अरब युआन की बड़ी राशि गरीबी उन्मूलन के लिए जारी की जाएगी, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 18.9 फीसदी अधिक होगी। इसका ज्यादातर इस्तेमाल देश के सबसे अधिक गरीब क्षेत्रों में किया जाएगा। दावा किया गया है कि गरीबी की राह में बाधक शिक्षा, निवास, पानी और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं का हल करते हुए चीन अपना लक्ष्य साकार करने में सक्षम है। चीन ने गरीबी मिटाने के लिए कितना काम किया है, यह विश्व बैंक की एक रिपोर्ट से भी जाहिर होता है। रिपोर्ट कहती है, जहां 1981 में चीन में गरीबी दर 88 प्रतिशत थी। वहीं साल 2018 के अंत में यह दर महज 1.7 फीसदी रह गई है। 

आमतौर पर चीनी लोगों के पास खाने-पीने या कपड़े आदि की समस्या नहीं दिखती, लेकिन गांवों में बुनियादी चिकित्सा, आवास गारंटी व नौ वर्षीय अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए काम किया जाना बाकी है। मुझे चीन के कुछ दूर-दराज के गांवों में जाने का मौका मिला है। वहां लोगों के पास रहने को घर था, खाने को भरपेट भोजन भी। हां, उनकी शिक्षा व रहन-सहन का स्तर शहरों के मुकाबले कमजोर जरूर कहा जा सकता है। भले ही चीन लोगों का जीवन-स्तर ऊपर उठाने की कोशिश में लगा है, लेकिन देश की इतनी बड़ी आबादी को सुख-सुविधाएं सुलभ कराना आसान नहीं है। समाज के कमजोर वर्ग को सीधे मध्य वर्ग की कतार में खड़ा नहीं किया जा सकता। इस तरह के चमत्कार की उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए, लेकिन चीन के अनुभव से यह सबक लेने की जरूरत है कि उसने किस तरह इतनी बड़ी आबादी की रोजी-रोटी की मुकम्मल व्यवस्था करने में कामयाबी पाई है।

उधर चीनी राज्य परिषद के गरीबी उन्मूलन कार्यालय के प्रमुख ल्यू योंग फू कहते हैं कि चीन में चल रहे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम से पूर्ण गरीबी के मुद्दे का समाधान हो रहा है, जो हजारों वर्षों से हल नहीं हो सकी है। हालांकि वह मानते हैं कि सापेक्ष गरीबी लंबे समय तक बनी रहेगी। गौरतलब है कि नए चीन की स्थापना के बाद ही लोगों का जीवन बेहतर बनाने की कोशिशें होने लगी थीं, लेकिन अस्सी के दशक की शुरुआत से लोगों के जीवन में समृद्धि और खुशहाली तेजी से आई। चीन के सबसे बडे़ अमीरों में शुमार मा युन (जैक मा) भी एक आम नागरिक थे। पिछले तीन दशकों में चीन ने न जाने कितने जैक मा पैदा किए हैं। बावजूद इसके दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश चीन के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। हाल के समय में चीनी अर्थव्यवस्था भी दबाव का सामना कर रही है। ऐसे में, गरीबी से छुटकारा दिलाना आसान नहीं होने वाला। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Opinion Column Hindustan on Chinese Economy 14th March