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बाढ़ जिसमें आपदा प्रबंधन बह गया

एम शशिधर रेड्डी, पूर्व उपाध्यक्ष, एनडीएमए

केरल में जो हुआ, वह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं है, उसमें हम आपदा प्रबंधन की नाकामी को भी देख सकते हैं। साल 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का गठन इसलिए किया गया था, ताकि मुश्किल हालात में राहत और बचाव कार्य ही नहीं, आपदा प्रबंधन के सभी लक्ष्यों को केंद्रित करके अभियान चलाए जा सकें। मगर केरल में इस अनुशासन का अभाव दिखा है। आपदा प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है, मुश्किल हालात आने से पहले खुद को तैयार रखना। इसमें आपदा को रोकने के प्रयास तो किए ही जाते हैं, संकट का दायरा सीमित रखने की कोशिश भी होती है। इस काम में सफलता तभी संभव है, जब विभिन्न एजेंसियों में समन्वय हो। खबरें हैं कि केरल में इस तरह का समन्वय नहीं बन सका था।

केरल पश्चिमी घाट का राज्य है। वहां 44 नदियां बहती हैं, जिनका जन्म राज्य में ही होता है और अंत उसी राज्य के तटीय समुद्र में। चूंकि वहां ढलान काफी ज्यादा है, इसलिए पानी का बहाव स्वाभाविक तौर पर तेज रहता है। बारिश होने पर यह पानी कहीं ज्यादा तेजी से समुद्र में समाने के लिए भागता है। इस गति को थामने के लिए जगह-जगह पर बांध बनाए गए हैं। जरूरी था कि आने वाले संकट और पानी के बहाव को देखते हुए पानी को थोड़ा-थोड़ा करके छोड़ा जाता। बांध-दर-बांध समन्वय बनाते हुए पानी की गति नियंत्रित की जाती। मगर कहा जा रहा है कि वहां केंद्रीय जल आयोग के कई उपकरण काम नहीं कर रहे थे। बारिश और नदी के जलस्तर में वृद्धि को देखकर क्षेत्र-विशेष में पसरने वाली बाढ़ की भयावहता का आकलन भी समय-पूर्व नहीं किया जा सका।

आपदा से निपटने के लिए पूर्व-तैयारी काफी मायने रखती है। किसी घटना का हम इंतजार नहीं कर सकते। मेरे जेहन में आज भी 2011 में जापान में आए भयानक भूकंप की यादें ताजा हैं। उस भूकंप के बाद सुनामी आ गई थी, जिसकी चपेट में फुकुशिमा परमाणु ऊर्जा संयंत्र भी आ गया था। उस विनाशकारी हादसे के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एनडीएमए की एक विशेष बैठक बुलाई थी, ताकि इस हादसे के सबक को हम सीख सकें। इसके बाद अपने देश के तमाम परमाणु संयंत्रों की तैयारी को जांचने के लिए हमने ‘मॉक ड्रिल’ की थी। 

अक्तूबर 2013 में ओडिशा में आए फैलिन चक्रवाती तूफान का सफलतापूर्वक सामना भी हम ऐसी ही पूर्व-तैयारी से कर सके थे। उस तूफान में जरूर 23 लोगों की जान गई थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को आशंका थी कि इससे हजारों लोगों की मौत हो सकती है। तब जान-माल का कम नुकसान इसलिए हुआ, क्योंकि हमने आपदा प्रबंधन अधिनियम को सख्ती से लागू किया था। इस अधिनियम की एक धारा यह कहती है कि अगर लोग अपने घरों को खाली करके सुरक्षित स्थान पर नहीं जाते हैं, तो पुलिस उनकी सुरक्षा के लिए उनके साथ जबर्दस्ती कर सकती है। असल में, लोग यही समझते हैं कि चेतावनी यूं ही जारी कर दी गई है, फिर उन्हें अपने घर में रखे सामान की फिक्र भी होती है। मगर हमने यदि उन्हें अपने भरोसे छोड़ दिया, तो उनका जीवन खतरे में पड़ जाएगा। केरल में कुछ ऐसा ही हुआ है। हमने यही देखा कि लोग अपनी-अपनी जगह से हटे नहीं। वे अंत-अंत तक विरोध करते रहे। ऐसी स्थिति में स्थानीय प्रशासन को सख्ती दिखानी चाहिए थी।

गलती यह भी हुई कि केरल में नदियों का पानी सीधे छोड़ दिया गया। इडुक्की बांध के बारे में ही कहा जा रहा है कि जब पहली बार तेज बारिश हुई, तभी आनन-फानन में उसके दरवाजे खोल दिए गए थे। तब इतना पानी छोड़ दिया गया कि बांध आधा खाली हो गया था। बाद की बारिश ने रही-सही कसर पूरी कर दी। जबकि आपदा प्रबंधन का गणित कहता है कि किसी भी बांध से पानी इतना ही निकालना चाहिए, जिससे ‘ओवर फ्लो’ की स्थिति न आए। डॉक्यूमेंटेशन यानी दस्तावेजीकरण भी आपदा प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। कोई आपदा आती है, तो उसका सामना हमने कैसे किया, जान-माल का कितना नुकसान हुआ, राहत-कार्य किस तरह चलाए गए, सफलता व नाकामी कितनी मिली- इन सबको दस्तावेज का रूप देना चाहिए। इसका मकसद किसी एक पर नाकामी की जिम्मेदारी डाल देना नहीं होता। सही और गलत, सब कुछ इसमें दर्ज किया जाता है, ताकि अगली आपदा से बेहतर तरीके से निपटने में हम सफल हो सकें। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि किसी विमान हादसे में उसके ब्लैक बॉक्स सबसे पहले ढूंढ़े जाते हैं, क्योंकि उसी से पता चलता है कि आखिरी वक्त में क्या गड़बड़ी हुई थी, और फिर उस गलती को दोहराने से बचा जाता है।

दरअसल, आपदा एक अवसर की तरह भी होती है। यह हमें सीखने का मौका देती है। ‘नॉन-डिजास्टर टाइम’ (ऐसा वक्त, जब कोई आपदा न आई हो) में इन्हीं दस्तावेजों का अध्ययन किया जाता है। यह काम कोई पार्ट-टाइम व्यक्ति नहीं कर सकता। एनडीएमए अभी गृह मंत्रालय के अधीन है, मगर यहां उपाध्यक्ष का अभाव है। बेशक मंत्री योग्य लोग ही होते हैं, मगर कोई विशेषज्ञ यदि इस प्राधिकरण को संभाले, तो कहीं बेहतर नतीजे सामने आएंगे।

लोगों को जागरूक किए बिना हम किसी आपदा से नहीं निपट सकते। प्रचार-प्रसार के तमाम साधनों का इस्तेमाल करके हम जन-जागरूकता अभियान चला सकते हैं। ‘सक्सेस स्टोरी’ का भी जमकर प्रचार-प्रसार होना चाहिए। इससे लोगों की हौसला अफजाई होती है। अभी केरल में ही एक गर्भवती महिला को वायु सेना के जवानों ने एयरलिफ्ट किया और सुरक्षित जगह पर उसकी ‘डिलिवरी’ करवाई। इस तरह की कहानियां तंत्र में लोगों का भरोसा बढ़ाती हैं। आखिरकार इसी भरोसे तो लोग आपदा में अपने-अपने घरों को छोड़ते हैं और संकट के बाद पुनर्निर्माण के कामों में शासन-प्रशासन की मदद करते हैं। हमें इस भरोसे को डिगने से बचाना ही चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:NDMA Former Vice President M Shashidhar Reddy article in Hindustan on 27 august