DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बलिदान को याद करने का दिन

नरेंद्र कोहली, वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार

यह एक पौराणिक मान्यता है कि संसार में अवतार अघोषित नहीं आते। उनके आने की घोषणा किसी न किसी रूप में बहुत पहले से हो जाती है। यही कारण है कि देवकी और वसुदेव के विवाह के समय ही यह आकाशवाणी हो गई थी कि कंस का वध देवकी की आठवीं संतान के हाथों होगा। 

ऐसी आकाशवाणी सुनकर कंस की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही थी कि देवकी को ही मार डाला जाए, ताकि उसकी कोई संतान ही न हो। न मां रहेगी, और न उसकी संतान होगी। ऐसे अवसर पर हमें विचार करना चाहिए कि उस समय वसुदेव और देवकी की प्रतिक्रिया क्या रही होगी? उनके मन पर क्या-क्या गुजरी होगी? वसुदेव के मन में उस समय एकमात्र विचार अपनी नव-विवाहिता के जीवन को बचाने का था और इसीलिए उन्होंने कंस को यह वचन दिया कि यदि वह देवकी को जीवनदान दे देगा, तो वह अपनी हर एक संतान को जन्म लेते ही कंस को सौंप देंगे। 

पर क्या देवकी-वसुदेव के इस निर्णय से सहमत हो पाई होंगी? मैं नहीं समझता कि कोई भी माता-पिता स्वेच्छा से इस प्रकार का निर्णय कर सकते हैं। तात्कालिक रूप से लिया हुआ यह निर्णय बाद में खुद वसुदेव को भी उचित लगा होगा क्या? वह अपनी पत्नी की रक्षा करना चाहते थे, किंतु वह किसी भी तरह से अपनी होने वाली संतान के शत्रु तो नहीं थे। और अपनी संतान को किसी हत्यारे को सौंप देना इतना सरल भी नहीं है।

मेरा विचार है कि देवकी इस वचन के पक्ष में तो नहीं ही रही होंगी, इस प्रकार का वचन देने वाले अपने पति से प्रसन्न भी नहीं रही होंगी। विवाह की सारी प्रक्रिया के कर्मकांड से मुक्त होने के पश्चात जब वे दोनों एकांत में मिले होंगे, तो क्या देवकी ने उन्हें यह नहीं कहा होगा कि वह अपनी संतान की रक्षा के स्थान पर उन्हें कंस को सौंपने का क्रूर कर्म भला कैसे कर सकते हैं? क्या देवकी ने अपनी आशंकाएं प्रकट नहीं की होंगी? अपने पति के इस फैसले पर अपना विरोध नहीं जताया होगा? 

मेरी कल्पना कहती है कि जिन परिस्थितियों में वे थे, उसमें दो विकल्प हो सकते थे- पहला यह कि वसुदेव कंस को दिया गया अपना वचन निभाएं और दूसरा कि वे संतान उत्पन्न न करने का संकल्प करें। यदि संतान जन्म नहीं लेगी, तो स्वाभाविक ही उनकी हत्या भी नहीं होगी। फिर भी उन्होंने संतान उत्पन्न करने का ही मार्ग अपनाया और एक के बाद दूसरी अपनी छह संतानों की हत्या होते देखी। उसको सहन किया, किंतु संतान उत्पन्न न करने का निश्चय नहीं किया। सातवीं संतान को रोहिणी के गर्भ में स्थापित करवाया और आठवीं को यशोदा को बताए बिना नंद के घर पलने के लिए छोड़ दिया।

मैं जब इसका कारण खोजने लगता हूं, तो देवकी मुझे भारतमाता के समान कष्ट सहने वाली, बलिदान देने वाली और अधर्म तथा अत्याचार से स्वतंत्रता प्रदान करने वाली मां के समान दिखाई देती हैं। उन्होंने जब इन सब बातों पर विचार किया होगा, तो यह भी सोचा होगा कि यदि वह अपनी संतान की बलि नहीं देंगी, तो एक प्रकार से कंस की रक्षा ही करेंगी, उसको जीवनदान देंगी और उसका अर्थ होगा, अधर्म का राज्य। राक्षसों का वर्चस्व। जरासंध और उसके क्षत्रपों को अत्याचार का अधिकार।

बहुत बाद में हमारे यहां नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था- तुम मुझे रक्त दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। देवकी और वसुदेव इस सत्य को तब ही से पहचानते थे। वे जानते थे कि जो रक्त देने से पीछे हटता है, वह न तो स्वतंत्र रह सकता है, न धर्म की स्थापना कर सकता है, और न ही अधर्म का नाश कर सकता है। इसलिए उन्होंने अपनी संतान की बलि को भी स्वीकार किया। इसी तरह, हम देखते हैं कि गुरु गोविंद सिंह ने भी धर्म की रक्षा के लिए, न्याय की स्थापना के लिए, देश की स्वतंत्रता के लिए अपने चार पुत्रों की बलि दी थी। 

श्रीकृष्ण ने इसी लक्ष्य से पांडवों को युद्ध के लिए तैयार किया था। अमत्र्य सेन ने कहीं कहा है कि कृष्ण चाहते, तो महाभारत का युद्ध रुक सकता था। सहस्रों लोगों के प्राण बच सकते थे। लेकिन अगर कृष्ण युद्ध न होने देते, तो फिर एक तरह से वह अधर्म और राक्षसों की रक्षा ही करते। वस्तुत: जब तक अधर्म के विरुद्ध धर्म शस्त्र नहीं उठाता, तब तक राक्षस ही विजयी होते रहते हैं। इस महाभारत का आरंभ कृष्ण ने नहीं, देवकी और वसुदेव ने अपनी छह संतानों के बलिदान से किया था। 

जन्माष्टमी के दिन कृष्ण के पृथ्वी पर अवतरित होने की प्रसन्नता के साथ ही हमें वसुदेव और देवकी के त्याग और बलिदान को भी स्मरण कर लेना चाहिए। एक कृष्ण को जन्म देने के लिए वसुदेव और देवकी को अपनी छह संतानों को कटते हुए देखना पड़ता है। हमें गोकुल के इस महान उत्सव के साथ महाभारत के युद्ध को भी स्मरण कर लेना चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Narendra Kohli article in Hindustan on 03 September