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ट्रंप पर महाभियोग की तलवार

हर्ष वी पंत प्रोफेसर किंग्स कॉलेज, लंदन

बीते शनिवार को एरिजोना स्थित अपने घर में अंतिम सांस लेने वाले सीनेटर जॉन मैक्कन ने पिछले साल के अंत में ‘उदारवादी विश्व व्यवस्था’ का बचाव करते हुए द इकोनॉमिस्ट  में एक लेख लिखा था। रिपब्लिकन पार्टी के नेता मैक्कन अंतरराष्ट्रीयतावाद के पुरजोर हिमायती और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था व नियमों के प्रति दृढ़ समर्पित थे। मैक्कन की नजर में ये तमाम मानदंड अमेरिकी नेतृत्व और वैश्विक समृद्धि के लिए जरूरी थे, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्तासीन होने के साथ यूरोप में दक्षिणपंथी जमातों की बढ़ती ताकत और कई देशों में अनुदारवादी ताकतों के उभार से मैक्कन चिंतित हो उठे थे।

अटलांटिक के दोनों तरफ ट्रंप-शैली के नेताओं के उभार का जिक्र करते हुए जॉन मैक्कन ने लिखा, ‘एकीकरण की बजाय उन्होंने आंतरिक आर्थिकी और संरक्षणवाद को वरीयता दी है। तानाशाही व्यवस्था का पोषण किया है और दादागीरी की राजनीति को अपनाया है। सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह कि उन्होंने उदारतावाद के विचार को ही धकिया दिया है, जबकि यह विचार किसी भी विश्व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी है।’ 

मैक्कन और राष्ट्रपति ट्रंप निजी तौर पर एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे, और यह मतभेद मैक्कन की मौत के बाद भी जारी रहा। यहां तक कि मैक्कन ने अपनी मौत से पहले ही यह इच्छा जाहिर कर दी थी कि ट्रंप को उनके अंतिम संस्कार में न बुलाया जाए। वहीं वाशिंगटन पोस्ट के जोश डॉवसे ने रविवार को लिखा है कि मैक्कन की प्रशंसा ‘हीरो’ के रूप में करने वाला बयान जारी करने की जगह ट्रंप ने शनिवार रात अपने ट्वीट में महज सामान्य शोक व्यक्त करना उचित समझा। 

डॉवसे के मुताबिक, ‘ह्वाइट हाउस एक आधिकारिक बयान जारी करने के पक्ष में था, जिसमें सीनेट और सैन्य सेवाओं के लिए वियतनाम युद्ध के इस बंदी की प्रशंसा की जाती और उन्हें ‘हीरो’ बताया जाता’। मगर ट्रंप इससे असहमत थे। उनका कहना था कि वह ऐसा कोई स्टेटमेंट जारी करने की बजाय बस एक ट्वीट करना चाहेंगे। और ट्विटर पर उन्होंने जो कुछ लिखा, उसमें युद्ध के दौरान मैक्कन की वीरता या उनके सियासी करियर के बारे में एक शब्द भी नहीं था। 

जाहिर है, मैक्कन की मौत अमेरिका की सोच पर जोर देती है, जो अमेरिकी सर्वोच्चता और उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के बचाव की वकालत करती है। मगर दुर्भाग्य है कि आम अमेरिकियों में भी इन उद्देश्यों के प्रति रुझान कम हुआ है। वैश्विक उदार व्यवस्था की कमर तोड़ने की लगातार कोशिशों के बाद भी ट्रंप की लोकप्रियता कायम है। हालांकि, अब अटकलें हैं कि डोनाल्ड ट्रंप को महाभियोग का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि उन पर राष्ट्रपति चुनाव से पहले उन महिलाओं को मुंह बंद रखने के लिए ढेर सारे पैसे देने का नया आरोप लगा है, जिनके साथ उनके कथित अंतरंग रिश्ते थे। ये आरोप उनके पूर्व वकील माइकल कोहेन के कुबूलनामे से सामने आए हैं। उसी दिन ट्रंप के पूर्व कैंपेन मैनेजर पॉल मैनफोर्ट को भी बैंक और टैक्स धोखाधड़ी के मामले में दोषी पाया गया था। डोनाल्ड ट्रंप के ऊपर राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रूसी दखल के मामले में जांच की तलवार भी लटक ही रही है। अब चूंकि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन पर मुकदमा चलाया नहीं जा सकता, इसीलिए उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाने का एकमात्र तरीका  महाभियोग ही हो सकता है। 

महाभियोग की स्थिति में इसकी प्रक्रिया हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स (संसद का निचला सदन) द्वारा शुरू की जाएगी, जहां इसे पारित कराने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत होगी। इसके बाद यह प्रस्ताव सीनेट में पेश होगा, जहां दो-तिहाई वोटों की जरूरत होगी। दो-तिहाई वोट जुटाना अमेरिकी इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। इतिहास गवाह है कि महाभियोग के कई प्रयास आए जरूर, मगर अब तक महज दो राष्ट्रपति ही इस प्रक्रिया से हटाए जा सके हैं। महाभियोग का आखिरी मामला 42वें राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से जुड़ा है, जिन्हें ग्रैंड ज्यूरी के सामने झूठी गवाही देने और न्याय में बाधा डालने के कारण इसका सामना करना पड़ा था। उन पर मोनिका लेविंस्की से प्रेम संबंधों के मामले में झूठ बोलने और मोनिका से भी झूठ बुलवाने का आरोप लगा था।

सवाल है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप पर भी महाभियोग चल सकेगा? फिलहाल डेमोक्रेट्स इसे ज्यादा तूल देते नहीं दिख रहे। हालांकि वे यह वादा जरूर कर रहे हैं कि मध्यावधि चुनावों में पार्टी को सदन में बहुमत मिला, तो इस मामले की पूरी जांच जरूर होगी। इसीलिए फिलहाल उनका पूरा ध्यान नवंबर के चुनावों में अधिक से अधिक सीटें जीतने पर है। सदन में बहुमत पाने के लिए उन्हें 23 अतिरिक्त सीटों की जरूरत होगी।

रिपब्लिकन भी इस मध्यावधि चुनाव का महत्व बखूबी समझ रहे हैं। वे महाभियोग के इस खतरे को अपने हक में भुना सकते हैं, ताकि अपने मतदाताओं को सरकार के पक्ष में लामबंद कर सकें। ट्रंप के वकील और करीबी सहयोगी रूडी गूलियानी ने साफ कर ही दिया है कि ‘यह चुनाव महाभियोग के मसले पर लड़ा जाएगा।’ राष्ट्रपति ट्रंप के पूर्व मुख्य रणनीतिकार स्टीव बैनन ने भी चेताया है कि निचले सदन पर ट्रंप की पकड़ कमजोर पड़ती है, तो फिर जनवरी में उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू हो जाएगी।  

साफ है, अमेरिकी राष्ट्रपति का पद विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है, और इसका कारण खुद ट्रंप हैं, जो इसे लगातार कमजोर करते गए हैं। अपने अंतिम संदेश में दिवंगत सीनेटर मैक्कन ने भी कहा था कि ‘जब हम दीवारों को तोड़ने की बजाय उसके पीछे छिप जाएंगे, जब हम अपने आदर्शों पर विश्वास करने की बजाय शक करने लगेंगे’, तो हम अपनी महानता को ही कमजोर करेंगे। इस बयान का निशाना कौन है, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। 

चुनौतियां और भी हैं। ट्रंप लगातार उस बुनियाद को ही चुनौती दे रहे हैं, जो अमेरिकी विदेश नीति का आधार है। आर्थिक वैश्वीकरण से पीछे हटकर और स्पष्ट रूप से यह जाहिर करके कि अमेरिका अपनी पुरानी ‘दोस्त देश’ वाली छवि में नहीं रहना चाहता, डोनाल्ड ट्रंप न सिर्फ वैश्विक व्यवस्था को उलट-पलट रहे हैं, बल्कि अमेरिका की घरेलू नीति को भी अपनी शैली में हांक रहे हैं। ऐसे में, अभी यह नहीं कहा जा सकता कि ट्रंप के सत्ता से बेदखल होने के बाद क्या अमेरिका अपने उस पुराने गौरव को फिर से पा सकेगा? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Kings College London Professor Harsh V Pant article in Hindustan on 30 august