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22 नवंबर, 2020|9:29|IST

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जादू की कोई छड़ी नहीं वैक्सीन

हरजिंदर हेड-थॉट, हिन्दुस्तान

उम्मीदें अभी से बांधी जाने लगी हैं, शेयर बाजार तो जैसे बल्लियों उछल रहे हैं, यह बात अलग है कि कोविड-19 के वैक्सीन को आने में अभी कम से कम दो महीने का समय लग सकता है। अभी बस इतना ही है कि इन्हें बनाने वाली कंपनियों ने अपने वैक्सीन ंके प्रभाव पर लंबे-चौड़े दावे करने शुरू कर दिए हैं। ज्यादा उम्मीद यही है कि नए साल का स्वागत करने के बाद ही वैक्सीन के स्वागत की घड़ी आएगी। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि बहुत ज्यादा उम्मीदें मत बांधें। वैक्सीन कोई जादू की छड़ी नहीं है कि इधर वह आया और उधर कोरोना वायरस अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लगा। ज्यादातर की राय यही है कि वैक्सीन कितना भी कारगर क्यों न हो, यह वायरस इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है और इस दरम्यान हमें उसके साथ जीना सीखना होगा।
वैसे कोई वैक्सीन कभी भी जादू की छड़ी नहीं रहा। अगर हम चेचक के टीके को ही लें, जो दुनिया का पहला वैक्सीन भी था, उसकी खोज एडवर्ड जेनर ने 1796 में ही कर ली थी, लेकिन दुनिया को चेचक से मुक्त होने में लगभग दो सदी का वक्त लग गया। और इस दौरान चेचक लगातार सबसे ज्यादा परेशान करने वाली महामारी बनी रही। 1967 तक न सिर्फ पूरी दुनिया में इस वैक्सीन को स्वीकार किया जाने लगा था, बल्कि इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भी होने लगा था। फिर भी, उस साल डेढ़ करोड़ लोग चेचक से संक्रमित हुए थे और उस एक साल में ही इस महामारी ने 20 लाख लोगों की जान ले ली थी। बाद में बने कई रोगों के टीके इसके मुकाबले ज्यादा कारगर साबित हुए, पर किसी ने भी महामारी को रातों-रात खत्म कर दिया हो, ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। 
इसके बावजूद सच यही है कि वैक्सीन आधुनिक चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी खोज है। यह भी माना जाता है कि जब वैक्सीन की खोज हुई, वहीं से आधुनिक चिकित्सा का इतिहास भी शुरू होता है। टीकों ने न सिर्फ दुनिया में करोड़ों लोगों की जान बचाई है, बल्कि कई महामारियों और बहुत से रोगों के खिलाफ मानव जाति को सुरक्षा का स्पष्ट आश्वासन भी दिया है। एंटीबायोटिक को भी आधुनिक चिकित्सा का एक बड़ा मोड़ माना जाता है, लेकिन इसकी खोज वैक्सीन के बहुत बाद में हुई। बहुत से विशेषज्ञ यह मानते हैं कि एंटीबायोटिक के कारगर होने की मियाद अब खत्म होती जा रही है और इनका विकल्प खोजने का वक्त आ गया है। पर वैक्सीन के साथ ऐसा नहीं है। इसके उलट, अब जो टीके आ रहे हैं, वे पहले से ज्यादा कारगर हैं। अभी कोविड-19 के जो वैक्सीन सुर्खियों में हैं, उनके 90 से 95 फीसदी तक कारगर होने के दावे किए जा रहे हैं। बाजार पर छाने की कोशिश में किए जा रहे इन दावों में अतिरंजना हो सकती है, लेकिन यह भी सच है कि इसके पहले तक फ्लू का कोई भी वैक्सीन 50 फीसदी से ज्यादा कारगर नहीं रहा। इसलिए अगर इन दावों को दस-बीस फीसदी कटौती की गुंजाइश के साथ भी देखा जाए, तब भी ये टीके बहुत सफल साबित होने वाले हैं, बावजूद इसके कि जादू की छड़ी ये फिर भी नहीं होंगे।
लेकिन दुनिया भर में कोविड-19 के जिन डेढ़-दो दर्जन टीकों पर काम चल रहा है, उनका एक महत्व उनके कारगर होने के प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। नोवेल कोरोना वायरस का पता अभी ठीक एक साल पहले ही लगा था, और उसके संक्रमण से फैलने वाली बीमारी, यानी कोविड-19 एक विश्वव्यापी महामारी में बदल जाएगी, यह तो खैर उसके काफी बाद में समझ आया। एक साल के भीतर ही न सिर्फ उसके कई वैक्सीन तैयार हो गए, बल्कि वे मेडिकल ट्रायल के विभिन्न चरणों में भी पहुंच गए, तो यह मानव सभ्यता की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। 
चेचक, हैजा और प्लेग जैसी महामारियों ने सदियों और शायद सहस्त्राब्दियों तक मानव सभ्यता को परेशान किया और उसके बाद ही कहीं उनके वैक्सीन खोजे जा सके। स्पैनिश फ्लू ने 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में करोड़ों लोगों की जान ली, लेकिन इस पूरे दौर में उसके वैक्सीन नहीं खोजे जा सके। यह महामारी दुनिया को हर्ड-इम्यूनिटी देकर ही विदा हुई। एड्स से निपटने के तरीके तो बहुत सारे खोज लिए गए, पर उसका वैक्सीन अभी तक नहीं खोजा जा सका। इस लिहाज से अगर कोरोना संक्रमण का वैक्सीन एक साल में तैयार हो गया और 15 महीने में इसका व्यापक स्तर पर इस्तेमाल होना शुरू हो जाता है, तो इसे चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी सफलता ही मानेंगे।
यहां पर एक और वैक्सीन का जिक्र जरूरी है- इबोला का वैक्सीन। हालांकि, इबोला संक्रमण के बारे में पहली बार 1976 में ही नाइजीरिया और सूडान में पता लगा लिया गया था। और, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन बताते हैं कि 1976 से 2012 के बीच 24 बार यह संक्रमण कई अफ्रीकी देशों में फैला। लेकिन इन संक्रमण का दायरा सीमित था, इसलिए इस पर एक हद से ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। पर 2018 में जब यह बीमारी कांगो में काफी बडे़ स्तर पर फैली और पहली बार लगा कि यह वैश्विक महामारी का रूप ले सकती है, तो इसके वैक्सीन की खोज शुरू हुई। यह बात अलग है कि इबोला ने वैश्विक महामारी का रूप नहीं लिया, लेकिन एक साल के अंदर ही इसका वैक्सीन भी तैयार कर लिया गया। लगभग यही अब कोविड-19 के मामले में भी हो रहा है। इबोला के विपरीत यह एक ऐसा मर्ज है, जिसका पहले से किसी को कुछ पता नहीं है। 
पिछले तकरीबन एक साल से पूरी दुनिया जिस तरह की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक परेशानियों से गुजर रही है, उसमें हमें एक साल का यह समय भी काफी लंबा लग सकता है, लेकिन सच यही है कि हम महामारी के फैलने और उसके वैक्सीन खोजने के अंतराल को काफी कम करने में कामयाब रहे हैं। तमाम दिक्कतों के बीच यही सबसे अच्छी खबर है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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  • Web Title:hinudstan opinion column 23 november 2020