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इतने क्यों तपने लगे हमारे घर-शहर

बेतहाशा बढ़ रही गरमी की एक वजह कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित करने की हमारी विफलता भी है। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब हमारे शहर 50 डिग्री सेल्सियस तक गरम होने लगे हैं,लेकिन सच यह भी है कि शहरी..

इतने क्यों तपने लगे हमारे घर-शहर
Monika Minalकेके पांडेय, प्रोफेसर, अर्बन मैनेजमेंट, आईआईपीएTue, 18 Jun 2024 11:35 PM
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बेतहाशा बढ़ रही गरमी की एक वजह कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित करने की हमारी विफलता भी है। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब हमारे शहर 50 डिग्री सेल्सियस तक गरम होने लगे हैं, लेकिन सच यह भी है कि शहरी नियोजन और प्रबंधन में जो सामंजस्य दिखना चाहिए, वह नहीं दिख रहा। राजधानी दिल्ली में ही मास्टर प्लान 2041 तैयार है, जिसमें ‘ब्लू-ग्रीन पॉलिसी’ पर खूब जोर दिया गया है। यहां ‘ब्लू’ का अर्थ है, जल-स्रोतों और कचरे का उचित प्रबंधन। यानी, दिल्ली के भूगोल में जल-इकाइयों को बेहतर बनाना और कूड़े का वाजिब निस्तारण करना। 
विकसित देशों में पांच से दस प्रतिशत कचरा ही डंपिंग ग्राउंड में जाता है, जबकि अपने यहां इसका उल्टा हो रहा। चूंकि कचरा कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत होता है, इसलिए माना गया है कि सीवेज और कूडे़ का प्रबंधन आबोहवा को बेहतर बना सकता है। वहीं, मास्टर प्लान में ‘ग्रीन’ का अर्थ है- हरित पट्टियां या हरियाली का विस्तार। इसके तहत शहरी वानिकी को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। तापमान नियंत्रित रखने का यह एक मान्यता प्राप्त तरीका है। मगर विडंबना यह है कि इस मास्टर प्लान को अब तक अधिसूचित नहीं किया जा सका है।
पर्यावरण की अनदेखी का यह इकलौता मामला नहीं है। साल 2021 में कॉप-26 की बैठक में हमारी तरफ से यही कहा गया कि साल 2070 तक हम शून्य उत्सर्जन, यानी नेट जीरो के लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, जबकि अमेरिका व यूरोपीय संघ ने वर्ष 2050 तक और चीन ने 2060 तक इस लक्ष्य को पाने का भरोसा दिया है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत का ही स्थान आता है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं कि शहरी नियोजन में हमने पर्यावरण को लेकर आंखें मूंद रखी हैं। पिछले कुछ वर्षों से, जब से यह मुद्दा जोर-शोर से सामने आया है, इस संदर्भ में तमाम तरह की योजनाएं बनाई गई हैं। मगर जितनी तत्परता योजनाएं बनाने में की गईं, संभवत: उतनी ही सुस्ती उनके क्रियान्वयन में बरती गई। प्रबंधन और नियोजन में तालमेल की इस कमी को दूर करना बहुत आवश्यक है।
दरअसल, योजनाओं का प्रबंधन सही तरीके से न हो, तो लक्ष्य को पाना मुश्किल होता है। यही कारण है कि उन इलाकों में, जहां सुविधाएं प्रदान नहीं की गई हैं, जहां हरित-पट्टी का अभाव है, जहां पार्क नहीं हैं या जहां वानिकी विकसित नहीं की गई है, गरमी का प्रकोप अधिक रहता है। शहरों में हरित क्षेत्र लगातार सिमट रहे हैं, जिसे बढ़ाने के लिए नियोजित ढंग से प्रयास किए जाने की जरूरत है। साल 2015 में तेलंगाना ने ऐसे ही एक सफल प्रयास की शुरुआत की थी। ‘हरिता हारम’ नामक इस योजना में राज्य के हरित क्षेत्र को 24 फीसदी से बढ़ाकर 33 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था और अब तक कई दूसरे प्रयासों के अतिरिक्त यहां के शहरों में 75 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर 109 से अधिक पार्क विकसित किए जा चुके हैं। इस योजना में वृक्षारोपण के साथ-साथ उनकी देखभाल के लिए इन्सेंटिव की व्यवस्था भी की गई है। 
इसी तरह, तापमान को नियंत्रित रखने के लिए वर्षा-जल के संरक्षण और दूषित जल के दोबारा इस्तेमाल की व्यवस्था भी आवश्यक है। मगर यहां तो जलापूर्ति में भी खासा कुप्रबंधन दिखता है। जल-संकट तो अपनी जगह है, लेकिप इसे नल के जरिये घरों तक पहुंचाने में ही करीब 30-40 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है। इस लीकेज को यदि हम रोक सकें, तो स्वाभाविक ही पानी की उपलब्धता बढ़ जाएगी। मगर इसके लिए पानी की पाइपों की नियमित देखभाल अनिवार्य है, जिसमें हमारा तंत्र चूक जाता है।
यह सिर्फ एक धारणा है कि बड़े शहरों में बहुमंजिली इमारतें ताप को न्योता देती हैं। अलबत्ता, चीन, कोरिया, हांगकांग ने तो ऐसे ही कार्यों से विकास का रास्ता नापा है। वास्तव में, कमी बहुमंजिली इमारतों के निर्माण में नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचों की कमी में है। अपने देश में शहरी निर्माण-कार्यों के तहत इमारतें तो बना दी जाती हैं, लेकिन जरूरी हरित पट्टी का विकास नहीं किया जाता। विकास-कार्यों के नाम पर पौधों की बलि ले ली जाती है, लेकिन शहरी वानिकी बढ़ाने पर अमूमन गौर नहीं किया जाता। अब तो कई देशों में ‘ग्रीन बिल्डिंग’ भी बनने लगी हैं, जिसके तहत बनाई गई इमारतों में गरमी सहने की क्षमता अधिक होती है, लेकिन अपने यहां दिल्ली से सटे गुरुग्राम में संभवत: एक इमारत ही इस नई तकनीक पर बनाई जा सकी, शेष बिल्डरों ने मानो उदासीनता बरत रखी है।
जल-इकाइयों को लेकर भी हमारा व्यवहार रूखा रहता है। गुरुग्राम या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी जल-इकाइयां बढ़ाना तो दूर, पानी के प्राकृतिक बहाव को भी हमने बाधित कर दिया है। ऐसे कई उदाहरण देश भर में पसरे हुए हैं कि कैसे नदी-पेटी में अथवा डूब क्षेत्र को भी निर्माण-योजना का हिस्सा बना दिया गया, झीलें खत्म कर दी गईं, तालाब पाट दिए गए और हरित क्षेत्रों को निर्माण-कार्यों की भेंट चढ़ा दिया गया। जब तक इन विसंगितयों को दूर करने के प्रयास नहीं होंगे, हमारे शहर यूं ही तपने को विवश होते रहेंगे।
कूड़ा निस्तारण, जल-स्रोतों का विस्तार, हरियाली का विकास, ग्रीन बिल्डिंग पर जोर, सुगम यातायात व्यवस्था, जल प्रबंधन आदि ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर काम करने की जरूरत है। बदलते परिवेश में नियोजन और प्रबंधन में तेज रफ्तार आवश्यक है। रास्ता यहीं से निकलेगा। शहरों का जो विस्तार अब हो रहा है, उनमें तो कुछ हद तक इन मापदंडों का ख्याल रखा जाता है, लेकिन जिन इलाकों में पहले से ही बेतरतीब इमारतें बन चुकी हैं, वहां के लिए खास नीतियां बनानी होंगी। स्मार्ट सिटी के तहत शहरों की बेहतरी की कुछ योजनाएं बनाई गई हैं। अब यह चिह्नित करने की जरूरत है कि स्मार्ट शहरों में क्या-क्या काम हुए हैं। हमें उन कामों को आगे बढ़ाना ही होगा, जो ‘नए विकास’ को पर्यावरण के अनुकूल बनाए। अब चूंकि वैश्वीकरण का दौर है, तो कोई भी नई संकल्पना किसी एक परिधि तक नहीं सिमटी रह सकती। हम अन्य देशों से भी सबक लेकर अपने यहां पर्यावरण के अनुकूल शहरों का विकास कर सकते हैं। इससे हमारे लिए शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य पाना कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)