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विपक्ष के हाथों से फिसलता वक्त

लोकसभा चुनाव की घोषणा अब बमुश्किल एक पखवाड़ा दूर है, मगर खुद को मजबूत करके भाजपा को कड़ी टक्कर देने का काफी मौका विपक्ष ने गंवा दिया लगता है। पांच साल के कार्यकाल वाली संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में...

विपक्ष के हाथों से फिसलता वक्त
Monika Minalराज कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकारWed, 21 Feb 2024 10:36 PM
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पांच साल के कार्यकाल वाली संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में दस साल की अवधि कम नहीं होती। दस साल, यानी सत्ता में दो लगातार कार्यकाल। ऐसे में, सत्ता-विरोधी भावना मुखर होने लगती है, विपक्ष हाथ लगे मुद्दों को लेकर आक्रामक नजर आने लगता है और अक्सर सरकार रक्षात्मक मुद्रा में दिखने लगती है। साल 2014 में ऐसा ही दिखा था, पर 2024 में राजनीतिक परिदृश्य चौंकाने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और भाजपा, दोनों लगातार आक्रामक हैं, जबकि ज्यादातर मौकों पर विपक्ष रक्षात्मक, घबराया हुआ या बिखरा हुआ दिखता है। ऐसा क्यों है?
बेशक एनडीए सरकार ने एक सुनियोजित रणनीति के तहत जन-कल्याणकारी योजनाओं के जरिये विशाल लाभार्थी वर्ग तैयार किया है, पर यह भी एक सार्वभौम सच है कि सभी वर्गों की सभी आकांक्षाएं कभी पूरी नहीं हो पातीं। ऐसे में, अधूरे चुनावी वायदों की याद दिलाकर सत्ता-विरोधी भावनाओं के सहारे चुनावी वैतरणी पार कर लेना विपक्ष के लिए आसान हो जाता है। लगातार दो लोकसभा चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद 26 विपक्षी दलों ने पिछले साल ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलायंस (इंडिया) बनाया, जिसका कुनबा बढ़कर 28 तक पहुंचा, तो लगा कि विपक्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरी तैयारी के साथ उतरना चाहता है।
ध्यान रहे, साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह भाजपा और राजग की सीटें बढ़कर क्रमश: 303 और 352 हो गईं, उसके लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनावी रणनीति व प्रबंधन शैली की प्रशंसा की जा सकती है, पर तब भी ज्यादा मत विपक्षी खेमे में ही पडे़ थे। जी हां, 2019 में भाजपा और राजग की सीटें बढ़ जाने के बावजूद सच यही है कि उन्हें क्रमश: 37.4 और 45 प्रतिशत मत ही मिले, यानी उनसे ज्यादा मत विरोधी दलों को मिले थे। दस साल में उपजने वाली स्वाभाविक सत्ता-विरोधी भावना के अलावा यह वोट-गणित भी शायद विपक्षी एकता में मुख्य प्रेरक रहा होगा।
विपक्षी गठबंधन के संक्षिप्त नामकरण की आलोचना के अलावा भी सत्ता पक्ष अचानक जिस तरह आक्रामक हुआ, उससे यही लगा कि 28 विपक्षी दलों के स्वत:स्फूर्त भाव से एक बैनर तले आ जाने से बेचैनी तो है। शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल के अलगाव के बाद से ठंडे बस्ते में पडे़ एनडीए को अचानक सक्रिय करते हुए जिस तरह उसका कुनबा बढ़ाकर 38 किया गया, उसे भी सत्ता पक्ष की बेचैनी का संकेत माना गया। राजनीतिक प्रेक्षक भी मानने लगे कि 2024 का लोकसभा चुनाव पिछले दो चुनावों से पूरी तरह अलग और कडे़ मुकाबले वाला होगा। बेलगाम महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे तो सबके सामने थे ही। इस आकलन के मूल में ‘इंडिया’ के गठन के वक्त घटक दलों द्वारा व्यक्त व्यापक राष्ट्रहित में निजी महत्वाकांक्षाओं के ही नहीं, बल्कि दलीय हितों के त्याग का भी संकल्प रहा ही होगा, मगर महज सात महीने में विपक्षी गठबंधन ताश के घर की तरह बिखरता नजर आने लगा। इससे विपक्ष के प्रति लोगों का विश्वास कम हो गया। विपक्ष की ओर से बातें तो निजी महत्वाकांक्षाओं और दलीय हितों के त्याग की कही गई थीं, मगर बिखराव का कारण उनके प्रति अति-आग्रह ही बन रहा है। इस अति आग्रह से बचकर ही विपक्ष लाभ में रहेगा। चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में क्या हुआ? आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की एकजुटता ने ही भाजपा के पक्ष में हो रही मनमानी को रोक दिया। एकता की ताकत को अरविंद केजरीवाल ने भी माना, पर क्या वह पंजाब में कांग्रेस के लिए लोकसभा सीटें छोड़ने के लिए तैयार होंगे? 
यह भूलना मुश्किल है कि कांग्रेस ने पिछले साल हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में घटक दलों को भाव नहीं दिया था, जिसके चलते आप, सपा व जद-यू ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे और फिर करारी मात खाने के बाद भी लोकसभा चुनावों के लिए गठबंधन को गति देने के बजाय वह राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में जुट गई। फिर घटक दलों से चर्चा करके इस यात्रा को विपक्ष का संयुक्त चुनावी अभियान बनाने के बजाय कांग्रेस ने उनसे यह अपेक्षा की कि वे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में इस यात्रा की शोभा बढ़ाएं। एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस को अपने कार्यक्रम बनाने और चलाने का पूरा अधिकार है, मगर लोकसभा चुनाव के जिस साझा लक्ष्य के लिए 28 दलों का गठबंधन बनाया गया, उससे ऐन पहले उसी को ताक पर रखकर तो हरगिज नहीं। 
आश्चर्य नहीं कि उसके बाद से ही विपक्षी गठबंधन बिखरने लगा। अधीर रंजन चौधरी अपनी ही शैली में कटाक्ष करते हुए दो सीट जीतने वाली कांग्रेस के लिए पांच सीटें मांगते रहे और आलाकमान ने सीधे संवाद की जरूरत नहीं समझी, तो तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फिर से पाला बदलने में उन्हें ‘इंडिया’ का संयोजक न बनाए जाने से उपजी नाराजगी भी बड़ा कारण रही। उत्तर प्रदेश में आरएलडी अलग होकर भाजपा के साथ जा चुकी है, पर किसी तरह से सपा और कांग्रेस के बीच अंतिम समय में सीटों का समझौता हुआ है। उत्तर भारत के एक बड़े क्षत्रप अखिलेश यादव ही साथ हैं, पर दो बड़े क्षत्रप - ममता और नीतीश ने ‘इंडिया’ को अलविदा कह दिया है। 
गठबंधन के हित में कांग्रेस को तेज फैसलों के लिए तैयार रहना चाहिए। इसे चुनाव बाद भी याद किया जाएगा कि राहुल गांधी की यात्रा जब उत्तर प्रदेश पहुंच गई थी और आधी फरवरी बीत गई थी, तब भी सीटों का बंटवारा और गठबंधन, दोनों का भविष्य पहेली बना हुआ था। महाराष्ट्र एक और बड़ा राज्य है, जहां से 48 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं, पर शिवसेना और एनसीपी में विभाजन के झटके के बावजूद ‘इंडिया’ का वहां भी वही हाल है। घटक दल अभी तक दावेदारी में उलझे हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं।
लोकसभा चुनाव की घोषणा अब बमुश्किल एक पखवाड़ा दूर है, मगर खुद को मजबूत करके भाजपा को कड़ी टक्कर देने का काफी मौका विपक्ष ने गंवा दिया लगता है। महंगाई और बेरोजगारी समेत कई मुद्दे हैं, पर उनका पूरा लाभ उठाकर चुनौती बनने की संभावना विपक्ष के पास कितनी बची है, यह स्वयं विपक्ष को सोचना चाहिए। क्या विपक्षी दल समय रहते अपना घोषणापत्र पेश कर सकते हैं?  
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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