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गठबंधन सरकार से भी उम्मीदें बेशुमार

मोदी सरकार को सुधार के मोर्चे पर आगे बढ़ना होगा। जिन चीजों पर असहमति की गुंजाइश है, उनको किनारे रखकर आर्थिक तरक्की व रोजगार के मोर्चे पर बड़े कदम उठाने होंगे। रत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी अधिकतर...

गठबंधन सरकार से भी उम्मीदें बेशुमार
Monika Minalआलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकारSun, 09 Jun 2024 08:28 PM
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भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी अधिकतर आबादी गांवों में बसती है। दसियों साल से स्कूल के निबंधों में कैद यह पंक्ति अब शायद वापस राजनीति के केंद्र में लौट रही है और इसके साथ ही अर्थनीति पर भी इसकी छाप स्वाभाविक है। दूसरी ओर, बढ़ती आबादी पर लगाम कसने की नाकाम कोशिश के बाद उसी आबादी को डेमोग्राफिक डिविडेंड, यानी जनसांख्यिकीय लाभांश बताने का हैंगओवर भी सामने आ चुका है। इसका अर्थ है, सरकार की प्राथमिकताओं में रोजगार का इंतजाम सबसे बड़ी प्राथमिकता बन सकता है।
मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की अधिकृत शुरुआत से पहले ही सौ दिनों के एजेंडे पर काम चालू हो चुका था, मगर सरकार के अहम सहयोगी इन एजेंडों को कितना पटरी पर रहने देंगे, यह सवाल बड़ा हो चुका है। यहां हिसाब लगाना जरूरी है कि जीडीपी में बढ़त की रफ्तार आठ फीसदी से ऊपर जाने की खुशखबरी आने के ठीक बाद कहीं उस पर ब्रेक लगने का डर तो नहीं पैदा होगा? खासकर, यह देखते हुए कि पिछले कार्यकाल के मुकाबले इस बार सहयोगी दलों की गिनती कम होने के बावजूद उनकी अहमियत बढ़ चुकी है।
जनता दल (यूनाइटेड) के मुखिया नीतीश कुमार और तेलुगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू की तरफ से अपने-अपने राज्यों के लिए विशेष दर्जे की मांग तो स्वाभाविक है, पर क्या मोदी सरकार के महत्वपूर्ण आर्थिक एजेंडों या आर्थिक सुधारों की रफ्तार पर ब्रेक लगाने की कोई मांग इनकी तरफ से आ सकती है? अलग-अलग विचारों के बावजूद चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार, दोनों ही आर्थिक और प्रशासनिक मोर्चे पर सुधार व विकास की राजनीति के लिए ही जाने जाते हैं। यानी, इनकी तरफ से आर्थिक मोर्चे पर किसी बड़ी अड़चन की आशंका नहीं होनी चाहिए।
ध्यान रहे, भारत में बहुत बड़े आर्थिक सुधार ऐसी सरकारों के दौर में हुए हैं, जब या तो मिली-जुली सरकारें थीं या फिर बाहरी समर्थन पर टिकी सरकार देश चला रही थी। साल 1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत या अर्थव्यवस्था को खोलने का काम ही पीवी नरसिंहराव सरकार ने किया था, जिसे संख्या-बल के कारण एक कमजोर सरकार माना जाता था। इसी तरह, एच डी देवेगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकारों ने आयकर की स्लैब घटाकर तीन करने का काम और दूरसंचार नियामक ट्राई (टीआरएआई) की स्थापना जैसे बड़े फैसले किए। दूरसंचार, पेंशन, सरकारी घाटे पर लगाम कसने की व्यवस्था, बिजली और बीमा क्षेत्र के अनेक बड़े सुधार अटल बिहारी वाजपेयी की उस सरकार ने किए, जिसे अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था। मनमोहन सिंह ने भी यूपीए के दौर में मनरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि अधिग्रहण कानून और पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के हवाले करने जैसे बड़े फैसले किए। वैसे, मोदी सरकार के भी पहले कार्यकाल में जीएसटी लागू करने जैसा बड़ा काम हुआ, जिसमें सारी राज्य सरकारों को राजी करना जरूरी था। हालांकि, कई बार पूर्ण बहुमत वाली सरकारें भी वह नहीं कर पाईं, जो वह करना चाहती थीं, जैसे- मोदी सरकार में कृषि कानूनों की वापसी।
यह जरूर है कि गठबंधन में सरकारें ऐसे काम नहीं कर पातीं, जिनसे किसी के नाराज होने का डर हो, पर ऐसे काम तेज हो सकते हैं, जिनका फायदा साफ दिखता हो, या जो गठबंधन में शामिल सभी या अधिकतर पार्टियों के एजेंडे से मेल खाते हों। आज का हाल देखें। बुनियादी ढांचे में सुधार, सड़क, रेल, बिजली, पानी जैसी सुविधाएं बढ़ाना और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना- इसमें भला कौन सी बाधा आ सकती है? श्रम कानूनों में सुधार या बदलाव पर विवाद हो सकता है, लेकिन उसके बिना भी भारत तेज विकास कर रहा है।
वास्तव में, इस वक्त हालात जितने अनुकूल दिखते हैं, वैसे शायद पहले कभी नहीं रहे। अर्थव्यवस्था में बढ़त की रफ्तार 8.2 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है। रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को उम्मीद से दोगुना लाभांश दिया है। जीएसटी वसूली नए रिकॉर्ड बनाती जा रही है। आयकर व कॉरपोरेट टैक्स के मोर्चे पर कमाई बढ़ती जा रही है। सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने का लक्ष्य भले पूरा न हो, पर अब वे बोझ नहीं, कमाऊ पूत लग रही हैं। मतलब यह कि सरकार के हाथ बंधे हुए नहीं हैं और जरूरी चीजों पर खर्च की गुंजाइश बनी हुई है।
अब बजट में सरकार को जहां ध्यान देना है, वह यह कि कैसे भारत की तरक्की की रफ्तार बनी रहे या और तेज की जा सके? कैसे नए रोजगार पैदा हों? कैसे गांव, गरीब और किसान तक ज्यादा से ज्यादा फायदा पहुंच सके और ग्रामीण इलाकों में भी विकास का सपना साकार किया जा सके? पिछले दस साल में यह एक बड़ी समस्या रही है कि सरकार ने सीमित संसाधनों के बावजूद काफी खर्च किया, मगर जवाब में निजी क्षेत्र की तरफ से जो खर्च होना था, उतना नहीं हुआ। हां, मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंत तक पहुंचते-पहुंचते वित्त मंत्री जरूर यह मानने लगी थीं कि निजी क्षेत्र नए कारखानों और मशीनों में पैसे लगाने लगे हैं। यह होना जरूरी है, क्योंकि सिर्फ सरकार के भरोसे विकास नहीं हो सकता। रोजगार बढ़ाने का काम भी तभी होता है, जब सरकार और कारोबारी कंधे से कंधा मिलाकर चलें। तिमाही दर तिमाही कंपनियों के सुधरते नतीजे, शेयर बाजार में तेजी की लहर और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशकों की तरफ से जबर्दस्त निवेश मिलकर यह संदेश दे रहे हैं कि अब कंपनियों के पास कोई बहाना नहीं है।
ऐसे  में, सरकार के सामने जो प्राथमिकताएं साफ दिख रही हैं, उनमें अब जनता को खुश करने वाली और उन्हें न सिर्फ वर्तमान, बल्कि भविष्य के प्रति भी आश्वस्त करने वाली योजनाओं पर खर्च और जोर बढ़ाना सबसे ऊपर होगा। सुधारों के मोर्चे पर आगे बढ़ना होगा। जिन चीजों पर असहमति की गुंजाइश है, उनको किनारे रखकर आर्थिक तरक्की और रोजगार के मोर्चे पर बड़े कदम उठाने होंगे। जाहिर है, मुफ्त गैस और मुफ्त अनाज से खुश होने के बाद अब लोग इससे आगे कुछ चाहते हैं। उनकी सबसे बड़ी जरूरत रोजगार की है, पर इसके इंतजाम में अभी वक्त लगेगा। ऐसे में, लोगों को तत्काल खुश करने वाले कुछ एलान बजट में सुनाई दें, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। लंबे समय के बाद वह वक्त लौट आया है, जब बजट में वित्त मंत्री को ‘गुड पॉलिटिक्स’ और ‘गुड इकोनॉमिक्स’ के बीच संतुलन बैठाना पड़ेगा? इसलिए, बजट बनाना और अर्थनीति संभालना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)