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यूक्रेन में दो साल से युद्ध देखती दुनिया

यूक्रेन-रूस युद्ध को दो साल पूरे हो रहे हैं। 24 फरवरी, 2022 को रूस की सेना यूक्रेन में दाखिल हुई थी और राजधानी कीव की ओर उसने कूच करना शुरू किया था। मॉस्को को उम्मीद थी कि उसकी सेना यूक्रेन के...

यूक्रेन में दो साल से युद्ध देखती दुनिया
Monika Minalविवेक काटजू, पूर्व राजदूतThu, 22 Feb 2024 11:00 PM
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यूक्रेन-रूस युद्ध को दो साल पूरे हो रहे हैं। 24 फरवरी, 2022 को रूस की सेना यूक्रेन में दाखिल हुई थी और राजधानी कीव की ओर उसने कूच करना शुरू किया था। मॉस्को को उम्मीद थी कि उसकी सेना यूक्रेन के अधिकाधिक हिस्से पर तेजी से कब्जा जमा लेगी, और अगर कीव तक वह न भी पहुंच सकी, तो यूक्रेन पर जरूर दबाव बना देगी। उसका यह भी मानना था कि रूसी सेना को देखकर कीव की जनता घबरा जाएगी, जिसके कारण जेलेंस्की सरकार का तख्ता-पलट होगा और रूस-समर्थक सत्ता यूक्रेन पर आसीन हो जाएगी। मगर रूस अपने मकसद में सफल नहीं हो सका, जिसके कई कारण रहे।
मॉस्को की उम्मीद के विपरीत यूक्रेन की जनता रूसी हमले के खिलाफ उठ खड़ी हुई, और यूक्रेन की सेना ने भी हिम्मत व जोश के साथ रूसी फौज का मुकाबला किया। इसके साथ-साथ अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देश रूसी हमले के खिलाफ मुखर हो गए। यूरोप के मुख्य देशों ने खुलेआम कहा कि रूस की कार्रवाई से यूरोप की सामरिक स्थिति बदल गई है, इसलिए उन्होंने यूक्रेन को राजनीतिक मदद के साथ-साथ आर्थिक व सैन्य सहायता देनी शुरू कर दी।
कुछ यूरोपीय इतिहासकारों और विश्लेषकों का मानना है कि रूस का आक्रमण शीत-युद्ध का आखिरी अध्याय है। उल्लेखनीय है, शीत-युद्ध के अंतिम वर्षों में तत्कालीन सोवियत संघ को पश्चिम, विशेषकर कुछ अमेरिकी नेताओं ने आश्वस्त किया था कि जर्मनी के एकीकरण की वजह से सोवियत संघ कभी सामरिक दबाव में नहीं आएगा। सोवियत नेतृत्व ने इस आश्वासन का यह अर्थ निकाला कि नाटो का विस्तार नहीं किया जाएगा और मध्य यूरोप के देश, जो सोवियत संघ के जमाने में वारसा संधि (नाटो के जवाब में सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी यूरोप के देशों के गठबंधन द्वारा की गई संधि) के सदस्य थे, नाटो में शामिल नहीं किए जाएंगे। मगर ऐसा नहीं हुआ। 1991 में सोवियत संघ का पतन हुआ और आखिरी तीन दशकों में रूस इसका उत्तराधिकारी देश बना। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिम पर इल्जाम लगाया कि रूस द्वारा बार-बार दी गई चेतावनियों के बावजूद नाटो का पांच बार विस्तार हुआ और जो आश्वासन सोवियत नेतृत्व को दिए गए थे, उसको बार-बार नजरंदाज किया गया, जिससे रूस की सामरिक स्थिति पर दबाव पड़ा है। मॉस्को की नाराजगी उस वक्त विशेष तौर पर दिखी, जब यूक्रेन से रूस समर्थक सरकार की विदाई हुई और एक ‘स्वतंत्र सरकार’ का गठन हुआ। इसके बाद ही व्लादिमीर पुतिन ने एक लाल रेखा खींची और स्पष्ट कहा कि रूस कभी भी यूके्रन को न नाटो और न यूरोपीय संघ में शामिल होते देख सकता है। फिर भी, यूके्रन के नेतृत्व और पश्चिम के बड़े देशों से ये आवाजें उठने लगीं कि यूके्रन एक संप्रभुता संपन्न देश है और अपनी सामरिक सुरक्षा के लिए वह हर कदम स्वेच्छापूर्वक उठा सकता है।
इस परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि रूस को युद्ध के लिए उकसाया गया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में वीटो का अधिकार रखने वाले किसी स्थायी सदस्य द्वारा युद्ध की शुरुआत करना किसी भी सूरत में वाजिब नहीं था। विश्व में शांति व सुरक्षा कायम रखना ही सुरक्षा परिषद् का पहला कर्तव्य है, जबकि रूस ने खुद दुनिया की शांति में सेंध लगा दी।
बहरहाल, पिछले दो वर्षों की इस जंग में रूस का यूक्रेन पर दबाव बनाने का मकसद पूरा नहीं हो सका है। हां, रूस से सटे यूक्रेन के पूर्वी हिस्से और दक्षिण के कुछ इलाकों में उसने खुद को मजबूत जरूर बना लिया है। पिछले साल यूक्रेन ने बहुत जोर-शोर से पलटवार करना शुरू किया था, लेकिन उसे कोई खास सफलता नहीं मिल सकी है। अब तो यूक्रेनी फौज का मनोबल भी कुछ ढीला पड़ता दिखने लगा है। यह माना जाने लगा है कि दोनों देशों के बीच में जो नई सीमा बन गई है, उसमें अब शायद ही कोई बदलाव हो सकता है, जब तक कि कुछ अप्रत्याशित घटना नहीं हो जाती। नाटो और यूरोपीय संघ के सदस्य देश बेशक रूस को वापस लौट जाने की सार्वजनिक मांग कर रहे हैं और मॉस्को से भिड़ने के लिए कीव को आर्थिक व सैन्य मदद दे रहे हैं, लेकिन खुद अमेरिका की स्थिति बिगड़ती दिख रही है। वहां मौजूदा बाइडन सरकार का रुख यूक्रेन के प्रति जरूर नरम है, लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की इच्छाशक्ति वहां की संसद में जाहिर होने लगी है। इस साल वहां चुनाव भी होने वाले हैं, और लगता यही है कि जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप ही आमने-सामने होंगे। यदि कानूनी रूप से ट्रंप चुनाव प्रक्रिया से बाहर नहीं हुए, तो मुमकिन है कि वह फिर से अमेरिकी राष्ट्रपति बनेंगे और उनकी यूक्रेन के प्रति उदासीनता जगजाहिर है।
इस युद्ध के शुरू होने से पूरी दुनिया में ऊर्जा और खाद्यान्न की स्थिति पर बुरा असर पड़ा, लेकिन पिछले साल के अंतिम महीनों में ऐसी व्यवस्था कर ली गई, जिससे वैश्विक स्थिति संभल गई। इसका एक और बड़ा असर यह हुआ कि रूस पर अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के कारण मॉस्को व बीजिंग में नजदीकी बढ़ गई। हालांकि, इस दोस्ती का चीन ने फायदा तो उठाया, लेकिन रूस की सहायता करते हुए भी उसने पश्चिम द्वारा खींची गई लाल रेखा का उल्लंघन नहीं किया। 
यह जंग हमारे लिए भी एक बड़ी चुनौती बनकर आई थी। हालांकि, मोदी सरकार ने सबसे पहले यूक्रेन से अपने नागरिकों, खासकर वहां पढ़ रहे छात्रों को बाहर निकालकर अपनी जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद, अमेरिकी चेतावनियों के बावजूद उसने रूस से न सिर्फ अपने ऊर्जा संबंध बनाए रखे, बल्कि इसे आगे भी बढ़ाया। इतना ही नहीं, रूस के साथ अपने सामरिक व रक्षा संबंध को भी हमारी सरकार ने कमजोर नहीं होने दिया। इसका हमें लाभ मिला है। इस दूरदर्शिता के कारण भारत सरकार ने रक्षा-आपूर्ति के अन्य स्रोतों को ढूंढ़ने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है, जिसके प्रयास काफी पहले से किए जा रहे थे।
अभी तो इस जंग का कोई छोर नहीं दिख रहा है। रूस कब्जा जमाए यूक्रेन के कुछ हिस्सों को वापस लौटाने के लिए तैयार नहीं है। इस तरह यहां ‘फ्रोजन क्फ्लिलक्ट’ जैसी परिस्थिति बन गई है, यानी आने वाले दिनों में बेशक यहां गोलियां चलनी बंद हो जाएं, लेकिन तनातनी बदस्तूर कायम रहेगी। इन सबसे यूरोप और पूरी दुनिया की सामरिक व आर्थिक परिस्थितियों पर स्वाभाविक ही प्रभाव पड़ रहा है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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