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पैसों का पूरा इस्तेमाल तो करें राज्य सरकारें

चर्चा में जिन 41 सदस्यों ने हिस्सा लिया, मैं उन सबका धन्यवाद करता हूं। कई सदस्यों ने अच्छे सुझाव दिए हैं। ...1950 तक अभाव से राहत या प्राकृतिक आपदाओं से राहत के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं था...

पैसों का पूरा इस्तेमाल तो करें राज्य सरकारें
Pankaj Tomarयोगेंद्र मकवाना, तत्कालीन केंद्रीय कृषि राज्य मंत्रीFri, 21 Jun 2024 09:33 PM
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चर्चा में जिन 41 सदस्यों ने हिस्सा लिया, मैं उन सबका धन्यवाद करता हूं। कई सदस्यों ने अच्छे सुझाव दिए हैं। ...1950 तक अभाव से राहत या प्राकृतिक आपदाओं से राहत के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, दूसरे वित्त आयोग द्वारा इस मुद्दे पर काफी अच्छी तरह से चर्चा हुई और राज्य सरकारों द्वारा और लोगों के प्रतिनिधियों द्वारा कई सुझाव दिए गए थे कि आपदाओं से निपटने के लिए कुछ निधियां होनी चाहिए, क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं बिना सूचना के आती हैंऔर उनके लिए धन नहीं मिलता है। इसलिए कुछ प्रावधान होने चाहिए।...
दूसरे वित्त आयोग के दौरान सीमांत धन के नाम से इस प्रावधान को शुरू किया गया था...। अब इस राशि को दोगुने से अधिक कर दिया है।... छठे वित्त आयोग तक अग्रिम सहायता योजना देने की व्यवस्था थी, अनुदानों के लिए कोई प्रावधान नहीं था, जो अब सातवें वित्त आयोग ने बाढ़ों, तूफानों, ओलावृष्टि और भूकंप के लिए इसे शुरू किया है। अनुदानों का प्रावधान सातवें वित्त आयोग ने शुरू किया था। तब तक यह केवल अग्रिम सहायता योजना थी और इन विपत्तियों से निपटने के लिए राज्य सरकारें उत्तरदायी थीं और वे इनके लिए व्यय अपनी निधियों से पूरा करती थीं। ...राज्य सरकारें लोगों को राहत देने के लिए जो कार्य शुरू करती हैं, उन सभी के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा सहायता करना मुश्किल है। ....गत वर्ष सारे देश में अभूतपूर्व बाढ़ आई थी तथा फिर सूखा पड़ा था। चौदह राज्यों तथा दो केंद्रशासित प्रदेशों में सूखे से नुकसान हुआ था और सभी 22 राज्यों एवं चार केंद्रशासित प्रदेशों में बाढ़, ओलावृष्टि, तूफानों आदि तथा यहां तक कि आग से भी नुकसान हुआ था। आग पर पहले राज्यों को राहत नहीं दी जाती थी, पर हाल ही में आठवें वित्त आयोग ने इसे शामिल किया है।...
राज्य सरकारों द्वारा की जाने वाले धनराशि की मांग बढ़ रही है। यह हमारा अनुभव है और हमें प्राप्त हुए ज्ञापनों से तथा राज्यों में जो नुकसान हुआ है, उससे पता चलता है कि कुछ मांगें बढ़ाकर भी बताई गई हैं...।
मिसाल के लिए, वर्ष 1985-86 में आंध्र प्रदेश की एआरडब्ल्यूएसएस, त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति योजना के अंतर्गत 1,587.45 लाख रुपये की राशि दी गई थी, पर इस्तेमाल कितनी राशि का किया गया है? केवल 582 लाख रुपये, अर्थात 36 प्रतिशत धनराशि का इस्तेमाल किया गया था। अब किसको दोष दें? क्या भारत सरकार दोषी है? अथवा क्या यह राज्य सरकार है, जिसने दी गई राशि का इस्तेमाल नहीं किया है?...
मैंने प्रभावित क्षेत्रों के ऊपर से हेलिकाप्टर में उड़ान भरी है, पर ये अधिकारीगण, जो वहां जाते हैं, वास्तव में कार्य कर रहे हैं। वे प्रात: जाकर देर शाम तक लौटते हैं और कभी-कभी उन्हें अपना दोपहर का भोजन भी छोड़ना पड़ता है। हमें उनके प्रति भी न्याय करना चाहिए। ...
बाढ़, चक्रवात और सूखा इत्यादि के लिए दी जाने वाली राहत के समय अपनाए जाने वाले मानदंडों को बदलने के लिए सिर्फ प्रोफेसर मधु दंडवते ने ही नहीं कहा है, बल्कि लगभग प्रत्येक सदस्य ने कहा है। वे चाहते हैं कि प्रत्येक वस्तु अनुदान के रूप में दी जाए, किंतु यह संभव नहीं है। ये मानदंड वित्त आयोग द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। जब वित्त आयोग का गठन किया जाता है, तब राज्य सरकारों को वित्त आयोग से मिलने, उसको अपना ज्ञापन देने और अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।... 
हमारा देश एक देश नहीं, उप-महाद्वीप है और उप-महाद्वीप में अनेक प्रकार के जलवायु क्षेत्र हैं। कुछ क्षेत्रों में वर्षा अधिक है और कुछ क्षेत्रों में सूखा है, इसलिए यह एक स्थायी समस्या है और यह सिर्फ दीर्घकालिक उपायों से सुलझाई जा सकती है, जो सरकार ने किए हैं, और जिनका मैंने उल्लेख किया है, पर घन का अभाव होने के कारण समय पर प्रत्येक काम करना संभव नहीं है।
    (लोकसभा में दिए गए उद्बोधन से)