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चाबहार बंदरगाह पर रिश्तों के जहाज

भारत के चहुंमुखी हित ईरान की तुलना में अमेरिका से कहीं अधिक जुड़े हैं, फिर भी, इसका यह मतलब नहीं कि तेहरान और नई दिल्ली अपने रिश्ते आगे न बढ़ाएं। चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत और ईरान के बीच हुआ ताजा...

चाबहार बंदरगाह पर रिश्तों के जहाज
Monika Minalविवेक काटजू, पूर्व राजदूतThu, 16 May 2024 09:50 PM
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चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत और ईरान के बीच हुआ ताजा समझौता काफी अहम है। यह आपसी रिश्ते को तो नई ऊंचाई देगा ही, ‘कनेक्टिविटी’ की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। दोनों देशों के संबंधित मंत्रियों की मौजूदगी में इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल), जो भारत की एक सार्वजनिक कंपनी है और ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन के बीच यह तय हुआ है कि शाहिद बेहेश्ती बंदरगाह-चाबहार के आधुनिकीकरण में भारतीय कंपनी अगले 10 साल में लगभग 37 करोड़ डॉलर खर्च करेगी और उसका प्रबंधन व संचालन भी करेगी। इस रकम में से करीब 12 करोड़ डॉलर की धनराशि बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश की जाएगी, जबकि शेष 25 करोड़ डॉलर बतौर कर्ज ईरान को दिया जाएगा।
चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की भारतीय मंशा दशकों पुरानी है। यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर है, जहां से अफगानिस्तान-ईरान सीमा पर स्थित जरांज शहर के जरिये दक्षिणी अफगानिस्तान का पूरा फलक खुल जाता है। आज से 22 साल पहले 2002 में ही वाजपेयी सरकार ने दूरंदेशी दिखाते हुए जरांज से दिलाराम तक सड़क बनाने में अफगानिस्तान की मदद की थी। यह सड़क चाबहार से अफगानिस्तान और अफगानिस्तान के जरिये मध्य एशिया, आगे रूस व यूरोपीय देशों के लिए रास्ता खोलती है। इसके साथ-साथ, ईरान की सहभागिता वाला अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भी भारत के वाणिज्यिक हितों को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा करेगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि पाकिस्तान अपने पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के जरिये अफगानिस्तान का मार्ग हमारे निर्यात के लिए कभी नहीं खोलेगा, जबकि इस्लामाबाद व बीजिंग की मंशा अफगानिस्तान को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जोड़ने की भी है, जिसकी कड़ी ग्वादर बंदरगाह से जुड़ी है। ऐसे में, आर्थिक और वाणिज्यिक नजरिये से स्वाभाविक ही चाबहार बंदरगाह का विकास हमारे हित में है। इससे हमारा सामरिक हित भी जुड़ा हुआ है।
शाहिद बेहेश्ती बंदरगाह-चाबहार पर समझौते के बाद अमेरिकी प्रवक्ता ने कहा है कि ईरान से सहयोग करने वालों को वे अमेरिकी प्रतिबंध याद रखने चाहिए, जो वाशिंगटन ने तेहरान पर लगा रखे हैं। अभी हमें यह नहीं पता कि अमेरिकी प्रवक्ता की यह प्रतिक्रिया बस औपचारिक थी या फिर अमेरिकी प्रशासन ने चाबहार की अपनी नीति बदल ली है? दरअसल, 2016 में जब भारत और ईरान के बीच चाबहार को लेकर एक समझौता हुआ था, तब प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका ने यह एलान किया था कि चाबहार के विकास के लिए दिया जाने वाला भारतीय सहयोग प्रतिबंध के दायरे से बाहर रहेगा। लिहाजा, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ठीक ही कहा है कि चाबहार के सहयोग को संकीर्ण नजरिये से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा। यह भी मुमकिन है कि भारत और अमेरिका की इस मसले पर परदे के पीछे बातचीत हुई हो, क्योंकि अमेरिकी प्रवक्ता के बयान में तल्खी नहीं थी। संभावना यह भी है कि घरेलू दबाव के चलते अमेरिका ने यह बयान दिया हो, क्योंकि इस साल वहां पर राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है और बाइडन प्रशासन ने ईरान के प्रति काफी कड़ा रुख अपनाया है।
बहरहाल, ईरान पश्चिम एशिया का एक बड़़ा देश है। भारत के साथ उसके राजनीतिक संबंध और आधुनिक काल में, विशेषकर ऊर्जा के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग दोनों देशों के लिए लाभदायक रहे हैं। हालांकि, सच यह भी है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते कई भारतीय कंपनियों ने ईरान से दूरी बनाए रखी थी। वे वहां निवेश करने से तो बचती ही थीं, ईरानी कंपनियों के साथ साझेदारी से भी हिचकती थीं, क्योंकि उनको डर था कि ऐसा करने से अमेरिकी कंपनियों से उनका रिश्ता या अमेरिका में उनका संचालन प्रभावित हो सकता है। भारत सरकार ने भी ईरान के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने में अमेरिकी प्रतिबंधों को ध्यान में रखा है। हां, चाबहार समझौता एक अपवाद रहा। आज भी भारत-ईरान के आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों में अमेरिकी प्रतिबंधों का नकारात्मक प्रभाव हम आसानी से देख सकते हैं, क्योंकि भारत के चहुंमुखी हित ईरान की तुलना में अमेरिका से कहीं अधिक जुड़े हैं। फिर भी, इसका यह मतलब नहीं कि तेहरान और नई दिल्ली अपने रिश्ते आगे न बढ़ाएं। कुछ न कुछ रास्ता तो ढूंढ़ना ही पड़ता है और यही कूटनीति की चुनौती भी होती है कि एक बड़ी शक्ति अमेरिका के प्रतिबंधों से कैसे निपटा जाए?
इस पूरे मसले का एक पहलू यह भी है कि भारत के पश्चिम एशियाई देशों से गहरे हित जुड़े हैं। सामरिक और सुरक्षा के नजरिये से इजरायल नई दिल्ली के लिए अहम है, तो खाड़ी के देश हमारी ऊर्जा-सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। अरब देशों के साथ हमारा व्यापारिक संबंध काफी मजबूत है और लाखों भारतीय वहां काम करते हैं, जिनके द्वारा स्वदेश भेजी गई रकम हमारी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाती है। भारत की पारंपरिक नीति यही थी कि वह पश्चिम एशिया की अंदरूनी राजनीति से दूर रहे। यहां के हरेक देश के साथ वह अपने संबंध आगे बढ़ाता रहा है। मगर बीते कुछ वर्षों से इस नीति में बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस तरह से अमेरिका ने खाड़ी के कुछ देशों, खासकर यूएईके साथ इजरायल के रिश्ते बढ़ाने में परदे के पीछे से मदद की, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यूएई के सदर और अबू धाबी के शासक मोहम्मद बिन जायेद से अपने निजी रिश्ते भी मजबूत किए हैं। कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री ने अमीरात का सफल दौरा भी किया था, जब वहां एक भव्य मंदिर का उद्घाटन हुआ था। स्वाभाविक है, इन घटनाओं को तेहरान में तीखी नजर से देखा जा रहा हो? ऐसे में, हम यह कह सकते हैं कि ताजा समझौते के जरिये भारत ने ईरान और इस क्षेत्र को एक संकेत दिया है कि वह अपनी पश्चिम एशिया की नीति में संतुलन बनाना चाहता है, जो उचित भी है।
उल्लेखनीय है कि ऐसे समझौते अमूमन चुनाव के बीच नहीं होते हैं। मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि ईरान को विश्वास है, भारत और उसके हित को हर भारतीय सरकार आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। इतना ही नहीं, वह यह भी जानता है कि भारत की नजर चीन-ईरान-पाकिस्तान रिश्तों पर भी रहती है और ईरान जैसे महत्वपूर्ण देश में चीन और पाकिस्तान को भारत खुली छूट नहीं दे सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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