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विवादों की मिलकर करें विदाई 

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की मूर्ति की औपचारिक प्राण-प्रतिष्ठा के साथ हमारे इतिहास के एक विवादास्पद अध्याय का पटाक्षेप हो गया। इस पूरे विवाद के चलते भारतीय समाज जितने लंबे समय तक और...

विवादों की मिलकर करें विदाई 
Monika Minalविभूति नारायण राय, पूर्व आइपीएस अधिकारीTue, 06 Feb 2024 12:14 AM
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अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की मूर्ति की औपचारिक प्राण-प्रतिष्ठा के साथ हमारे इतिहास के एक विवादास्पद अध्याय का पटाक्षेप हो गया। इस पूरे विवाद के चलते भारतीय समाज जितने लंबे समय तक और जितनी बुरी तरह से विभक्त हुआ, वह अपने आप में किसी विस्तृत समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है। कब मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई, इसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है, पर इस समय के बारे में जितने तरह के अनुमान लगाए गए हैं, उनका एक ही उदाहरण काफी है। सांविधानिक पद पर बैठे एक वरिष्ठ राजनेता ने कहा कि मंदिर निर्माण पांच सौ वर्षों के दर्द से छुटकारे की तरह है। वह इस पांच सौ वर्ष की संख्या पर कैसे पहुंचे, यह बताना मुश्किल है, पर सन् 1850 से तो मस्जिद/ मंदिर के स्वामित्व के प्रश्न पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच लड़ाई-झगड़ों के लिखित और वाचिक साक्ष्य कहीं न कहीं मौजूद हैं ही।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर सही कहा कि इस क्षण को जय या पराजय के तौर पर न देखा जाए, पर क्या सचमुच ऐसा हो पाया? पूरे देश में 22 जनवरी को लेकर प्रतिक्रियाएं हार-जीत से भी जुड़ी दिखीं। राम पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक करोड़ों लोगों के आराध्य हैं और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा से जुड़े स्वाभाविक उल्लास में आस्था और श्रद्धा का भाव होना चाहिए था, पर ऐसा कैसे हुआ कि पूरी उत्सवधर्मिता में आक्रामक विजयी स्वर ही प्रभावशाली था? इसके बरक्स बार-बार यह दोहराने के बावजूद कि किसी विवादित जमीन पर कोई मस्जिद नहीं बन सकती, कई बड़बोले मुस्लिम उलेमा और सियासी नेताओं का दर्द इस दावे के साथ छलक ही जाता है कि आज कमजोर होने के कारण उनका धर्मस्थल टूटा है, पर कल को अगर वे ताकतवर हुए, तो फिर से धर्मस्थल टूट सकता है।
अरब में चौदह सौ वर्षों पूर्व इस्लाम के आगमन के कुछ ही वर्षों के अंदर उसका साक्षात्कार भारत से हुआ। आठवीं शताब्दी में सिंध के राजा दाहर पर मोहम्मद बिन कासिम की सामरिक सफलता के साथ ही हमारा साबका इस्लाम से पड़ा और तेरह सौ वर्षों के संग साथ में हिंदुओं और मुसलमानों ने कई अर्थों में एक अद्भुत समाज बनाया। रचनात्मकता के हर क्षेत्र- साहित्य, संगीत, चित्रकारी, मूर्ति कला, स्थापत्य, यहां तक कि पाकशास्त्र में भी दोनों ने मिलकर अद्भुत उपलब्धियां हासिल कीं, मगर यह कहना भी सरलीकरण ही होगा कि दोनों मिल-जुलकर सिर्फ निर्माण करते रहे, सही बात यह है कि दोनों आपस में लड़ते भी रहे। दुनिया भर में ऐसा पड़ोस शायद ही मिलेगा, जिसमें सदियों साथ-साथ रहने वालों के मध्य रोटी-बेटी के संबंध न हों। इस लेन-देन मेें हिंदुओं और मुसलमानों के साथ एक तीसरे कोण के रूप में अंग्रेज जुड़े और यह स्वाभाविक ही था कि उनका हित देश के इन दोनों बड़े समुदायों के मध्य संघर्ष के बिंदुओं को उभारने में था। दोनों को आपस में लड़ाकर ही वे अपने शासन की अवधि बढ़ा सकते थे और वे यही करते भी रहे।
इसमें कोई शक नहीं कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के अंतर्विरोधों ने दो कौमी नजरिये को जन्म दिया था और इसी के फलस्वरूप 1947 में देश का धार्मिक आधार पर बंटवारा हुआ, पर यह भी सच है कि आजादी की लड़ाई की अग्रणी पंक्ति में शरीक महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉक्टर बी आर आंबेडकर या मौलाना आजाद जैसे नेताओं की समझ बड़ी स्पष्ट थी कि बीसवीं शताब्दी में धर्म पर आधारित राष्ट्र राज्य नहीं बन सकता। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने का उनका फैसला कितना सही था, यह इससे साबित हो गया कि इस्लाम के नाम पर बना पाकिस्तान 25 साल भी नहीं चल सका। 
किसी धर्मनिरपेक्ष समाज की बुनियादी शर्त ही यह होती है कि राज्य अपने सभी नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करे। नागरिकों के बीच मौजूद विवादों का फैसला कानून द्वारा स्थापित व्यवस्था के जरिये होना चाहिए। अच्छी बात थी कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का अंतिम फैसला अदालत द्वारा हुआ। स्वाभाविक था कि इस फैसले में एक पक्ष की जीत हुई, दूसरे की हार और यह एक तथ्य है कि अधिकांश मुसलमानों ने इस फैसले को स्वीकार भी कर लिया था। ज्यादातर ने तो राहत की सांस ली थी कि अब पिछले कई दशकों से चल रहा तनाव कुछ ढीला पड़ जाएगा। बहुसंख्यक समुदाय से भी यह अपेक्षा की गई थी कि वे गरिमापूर्ण तरीके से इसे स्वीकार करेंगे। प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण यही अपील की थी कि मंदिर निर्माण को हार-जीत से न जोड़ा जाए, पर दुर्भाग्य से ऐसा पूरी तरह से नहीं हुआ। जिस तरह के जुलूस देश के विभिन्न नगरों, गांवों में निकले, उनमें भक्ति से अधिक विजयी भाव दिखा। हमारी ज्यादातर बसावटें मिश्रित हैं और इनमें रहने वालों में कुछ को विजयी जुलूस निकालते और कुछ की खिड़कियों के पीछे खडे़ पस्त भाव से उन्हें निहारने की छवि किसी संवेदनशील राष्ट्रभक्त को झकझोरेगी ही।
इतिहास का एक दुखद अध्याय जरूर खत्म हुआ, पर हमारा इतिहास तो यहीं खत्म नहीं होता। वर्ष बीस सौ सैंतालीस तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने घोषित लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी है कि हम सांप्रदायिकता की संकुचित सोच से बाहर निकलकर एक प्रगतिशील और वैज्ञानिक समाज बनाने की दिशा में काम करें। बाबरी मस्जिद के अलावा भी बहुत से मतभेद के बिंदु हैं और उनमें से कई में हिंसा भड़काने का सामर्थ्य है। हमें मिल-बैठकर फैसला करना होगा कि क्या हम उन पर लड़ते रहेंगे या बीच का रास्ता तलाशते हुए देश को एक मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में काम करेंगे? हमारे पास संसद में पारित एक कानून भी मौजूद है, जिसमें राम जन्मभूमि के अलावा आजादी के समय के किसी भी धर्मस्थल के साथ छेड़छाड़ न करने की व्यवस्था है। एक बार धार्मिक स्थलों पर आश्वस्त मुस्लिम समाज के प्रगतिशील तबकों को महिला हितैषी समान नागरिक संहिता के लिए भी लामबंद किया जा सकता है। उत्तराखंड में यूसीसी का जो ड्राफ्ट पेश किया गया है, कट्टरपंथी उसका डटकर विरोध करेंगे, क्योंकि उसमें विवाह, तलाक या उत्तराधिकार के मसलों पर ्त्रिरयों को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए हैं। मुस्लिम ्त्रिरयां या उदार उलेमा इसका समर्थन कर सकते हैं, बशर्ते कि बहुसंख्यक हिंदू समाज इसे एक बार फिर हार-जीत का प्रश्न न बनाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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