फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियनलोकतंत्र पर हमारी आस्था अब भी अटल

लोकतंत्र पर हमारी आस्था अब भी अटल

इस बार के आम चुनाव में 66.2 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। यह आंकड़ा तस्दीक करता है कि भारतीय मतदाता देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में न सिर्फ निरंतर रुचि ले रहे हैं, बल्कि उनका...

लोकतंत्र पर हमारी आस्था अब भी अटल
sanjay kumar
Pankaj Tomarसंजय कुमार, प्रोफेसर, सीएसडीएसTue, 25 Jun 2024 09:04 PM
ऐप पर पढ़ें

इस बार के आम चुनाव में 66.2 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। यह आंकड़ा तस्दीक करता है कि भारतीय मतदाता देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में न सिर्फ निरंतर रुचि ले रहे हैं, बल्कि उनका इनमें गहरा जुड़ाव है और वे इनमें अपनी भागीदारी भी अनवरत सुनिश्चित कर रहे हैं। इसने चुनाव से भारतीय मतदाताओं के मोहभंग के बारे में शुरुआती दौर में आनन-फानन में लगाए गए अनुमानों को खारिज कर दिया है। वास्तव में, इस साल पिछले आम चुनाव (वर्ष 2019) से महज एक प्रतिशत कम मतदान हुआ, लेकिन यह मतदाताओं की भागीदारी के लिहाज से अब तक का तीसरा सबसे बड़ा चुनाव भी साबित हुआ है। मतदान प्रतिशत मतदाताओं की चुनाव में भागीदारी का सबसे मजबूत संकेतक होता है और साल 2024 का चुनाव विशेषकर महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी का संकेत दे रहा है। बेशक, एक लंबी चुनाव अवधि और मतदान-कार्यक्रम को लेकर कुछ मुद्दे जरूर उभर आए थे, पर मतदाताओं ने गर्मी का मजबूती से सामना किया, अपने जरूरी कामों को किनारे रखा और चुनाव में उल्लास के साथ भाग लिया।
मतदाताओं का यह उत्साह चुनाव खत्म होने के बाद भी बना रहा। इसका स्पष्ट संकेत था 1 जून की शाम एग्जिट पोल को लेकर चली चर्चा। हालांकि, असल नतीजा एग्जिट पोल के बिल्कुल उलट आया, नतीजतन, जनादेश और एग्जिट पोल की विफलता पर भी खूब बहस छिड़ी। इसे भी चुनाव और चुनाव प्रक्रिया में भारतीयों की गहन भागीदारी का ही संकेत माना जाना चाहिए। ईवीएम की विश्वसनीयता, बढ़ते दलबदल, चुनाव में विचारधारा की घटती भूमिका, निर्वाचित प्रतिनिधियों की गुणवत्ता जैसी तमाम चिंताओं के बावजूद चुनाव व चुनाव-प्रक्रिया से भारतीयों के होते मोहभंग का कोई संकेत हमें नहीं दिखता, मामूली भी नहीं। लोकनीति-सीएसडीएस का सर्वेक्षण बताता है कि 17 फीसदी भारतीय ईवीएम को भरोसमंद नहीं मानते, जबकि अन्य 43 फीसदी का इस पर विश्वास बना हुआ है। करीब 30 फीसदी भारतीयों ने ईवीएम पर डिगते विश्वास का उल्लेख किया।
यह सही है कि इस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई है, पर भारतीयों में विचारों में विविधता भी खूब दिखी है, जिसका ख्याल सरकार को रखना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्य तमाम नेताओं की तुलना में खासा लोकप्रिय हैं और राहुल गांधी की 27 फीसदी की तुलना में उनकी लोकप्रियता का प्रतिशत 41 है, फिर भी लोकनीति-सीएसडीएस सर्वेक्षण में 28 प्रतिशत भारतीयों ने बताया कि प्रधानमंत्री का तेज अब मंद पड़ने लगा है और अन्य 33 फीसदी मानते हैं कि दूसरे दलों के दागी नेताओं को शामिल करने से भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचा है।
यह सर्वेक्षण पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी प्रतिशोध की राजनीति पर आम लोगों में बढ़ती चिंता को भी जाहिर करता है। सर्वेक्षण में 44 फीसदी लोगों ने माना कि सियासी वजहों से विरोधी दल के नेताओं को गिरफ्तार किया गया है, जबकि 23 फीसदी की राय इससे अलग थी। सर्वेक्षण में 67 फीसदी भारतीयों ने यह भी कहा कि नागरिकों को चुने हुए अपने नेताओं से सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए, जबकि 20 प्रतिशत इससे सहमत नहीं दिखे। यहां यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि 58 फीसदी भारतीय मुल्क के विकास के लिए सरकार को बदलना जरूरी मानते हैं, जबकि 32 फीसदी लोग सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार को ही तरक्की के लिए बेहतर मानते हैं। यहां अदालतों के महत्व पर भी गौर करना चाहिए, क्योंकि इस सर्वेक्षण में 58 फीसदी लोगों ने माना कि सरकार की शक्तियों की जांच के लिए अदालतें अहम हैं, जबकि 27 फीसदी लोग इसे जरूरी नहीं मानते। सर्वेक्षण में 66 फीसदी भारतीयों ने माना कि सरकार के फैसलों का विरोध करने की जरूरी ताकत उनके पास होनी चाहिए, जबकि 19 फीसदी लोग इस सोच के खिलाफ थे।
वर्ष 2024 का जनादेश यह भी संकेत कर रहा है कि राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे निस्संदेह काफी अहम हैं, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई जैसे लोगों के रोजमर्रा से जुड़े मुद्दे भी समान रूप से अहमियत रखते हैं, जिनको राजनीतिक दल बहुत लंबे समय तक नजरंदाज नहीं कर सकते। सर्वेक्षण बताता है कि मोदी सरकार से मोहभंग के दो बड़े मुद्दे रहे, बेरोजगारी व महंगाई और ज्यादातर नाराज लोग नहीं चाहते थे कि यह सरकार फिर से चुनी जाए। फिर भी, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन उसे उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका लगा, जहां राम मंदिर का उद्घाटन काफी धूमधाम से किया गया था। यह संकेत है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर बहुत अधिक निर्भरता और रोजी-रोटी के मसलों की अनदेखी पार्टी पर भारी पड़ी। 2024 का जनादेश संकेत है कि पहचान की राजनीति की एक सीमा होती है, चाहे वह जाति से जुड़ी हो अथवा धर्म से।
किसी जीवंत लोकतंत्र में स्थिर सरकार के साथ-साथ एक मजबूत विपक्ष का होना भी जरूरी है। 2024 का जनादेश एक आदर्श लोकतंत्र का असल स्वाद दे रहा है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास लोकसभा में 293 सीटें हैं और वह बहुमत में है। वहीं, विपक्षी ‘इंडिया’ ब्लॉक के पास 195 का आंकड़ा है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दल शामिल नहीं हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन में भाजपा 240 सीटों के साथ सबसे ऊपर है, जबकि विपक्ष में कांग्रेस के पास सर्वाधिक 99 सीटें हैं। 
जाहिर है, निचले सदन में ये आंकड़े शासन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर लोगों के विचारों को प्रतिबिंबित करते हैं। सैद्धांतिक रूप में देखें, तो लोकतंत्र के लिहाज से यह एक अच्छी सरकार हो सकती है, हालांकि सिद्धांत और व्यवहार में अंतर से भी हम बखूबी वाकिफ हैं। लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के निर्वाचन पर सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच चल रही खींचतान में इसकी झलक देखी जा सकती है। हालांकि, ऐसे कई अन्य मुद्दे भी हैं, जो सत्तारूढ़ दल और विरोधी पार्टियों के बीच विवाद के कारण बन सकते हैं। फिर भी, कामना यही की जा सकती है कि भारत के लोगों द्वारा व्यक्त किए गए जनादेश को गंभीरता से लिया जाएगा और सत्तारूढ़ दल व विपक्ष, दोनों अगले पांच वर्षों तक मिलकर काम करेंगे और मुद्दों को उलझाने के बजाय सुलझाने का प्रयास करेंगे।
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)