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समझदारी पर हावी सत्ता की भूख

senior journalist s shrinivasan

कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस-जनता दल(एस) के 13 विधायकों ने बीते शनिवार को एक साथ अपना इस्तीफा राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष, दोनों को सौंपकर राज्य को राजनीतिक संकट के एक नए भंवर में फंसा दिया। विधानसभा अध्यक्ष यदि ये इस्तीफे स्वीकार कर लेते हैं, तो 13 माह पुरानी एचडी कुमारस्वामी सरकार का पटाक्षेप हो जाएगा, क्योंकि एक बागी कांग्रेस विधायक पहले ही अपना त्यागपत्र दे चुका है। इन 14 सदस्यों के न होने की सूरत में कांग्रेस-जनता दल(एस) के विधायकों की कुल संख्या 105 रह जाएगी। सदन में भाजपा के भी इतने ही विधायक हैं। इस ताजा घटनाक्रम ने कर्नाटक में अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा को भरपूर मौका मुहैया करा दिया है।

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस राजनीतिक संकट के लिए भाजपा को कठघरे में खड़ा करते हुए दावा किया है कि भाजपा किसी तरह कर्नाटक की सत्ता हासिल करना चाहती है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे उसी का हाथ है। उधर नई दिल्ली में कांग्रेस प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर इस संकट का आरोप लगाया है। कांग्रेसी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके 10 बागी विधायकों को मुंबई में एक होटल में रखा गया है, जबकि भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि भाजपा का इससे कोई लेना-देना नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह सरकार बनाने को तैयार हैं, तो उन्होंने बड़ी बेबाकी से कुबूल किया कि आखिर ‘हम संन्यासी तो नहीं।’ वह पहले यह देखना चाहेंगे कि बागी विधायकों के इस्तीफे पर विधानसभाध्यक्ष क्या कार्रवाई करते हैं।

विधायकों के दलबदल कराने की कथित कमल 0.1 और कमल 0.2 कोशिशों के उलट भाजपा इस बार दावा कर रही है कि इस सबमें उसका कोई हाथ नहीं है। वे दोनों प्रयास इसलिए नाकाम हो गए थे, क्योंकि तब सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायक पाला बदलने को तैयार नहीं थे। लेकिन संसदीय चुनाव के बाद भाजपा के पक्ष में सौभाग्य को देखते हुए इस पार्टी के नेतृत्व का मानना है कि अगर कर्नाटक में अभी विधानसभा चुनाव हुए, तो पार्टी आसानी से जीत हासिल कर लेगी। भाजपा की इस सोच में कुछ हद तक सच्चाई भी है, क्योंकि कांग्रेस-जनता दल(एस) गठबंधन राज्य में प्रभावशाली शासन देने में नाकाम रहा है। आनन-फानन अस्तित्व में आया यह गठबंधन पहले दिन से ही चुनौतियों का सामना करता रहा है। कांग्रेस पार्टी के भीतर की भारी गुटबाजी इस गठजोड़ को अलग-अलग दिशाओं में खींचती रही। इसका आखिरी रेशा लोकसभा चुनाव साबित हुआ, जिसमें यह गठबंधन जमीन पर एकजुट इकाई के तौर पर प्रदर्शन करने में विफल रहा।

कर्नाटक का मौजूदा संकट कई गंभीर चिंताओं व मुद्दों की ओर हमारा ध्यान खींचता है, जो संविधान की रक्षा व राजनीतिक नैतिकता की सुनिश्चितता से जुडे़ हैं। मतदाता विधायकों और सांसदों को जिस जनादेश के साथ विधानसभा और लोकसभा में भेजता है, उसमें यह निहित है कि जिस पार्टी को विधायकों या सांसदों का बहुमत दिया गया है, वह सरकार बनाए और जिसे बहुमत नहीं मिला, वह विपक्ष में बैठे। दोनों पक्षों की भूमिका भी तय है, यानी सत्ताधारी पार्टी शासन का संचालन करे और विपक्ष शासन करने वालों पर पैनी नजर रखे। संसदीय प्रणाली में नियंत्रण और संतुलन की यह व्यवस्था जान-बूझकर की गई है, ताकि लोकतंत्र सही तरीके से काम कर सके।

दलबदल-विरोधी कानून भी इसलिए बनाया गया था कि विधायक पार्टी के साथ बने रहें और सत्ता के लोभ में पाला बदलकर विरोधी दल में शामिल न होने पाएं। लेकिन यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायक एक साथ दल बदलना चाहते हैं, तो वे ऐसा कर सकते हैं, बल्कि बाद में विरोधी पार्टी में विलय भी कर सकते हैं। लेकिन यदि कोई सदस्य सदन में पार्टी के ह्विप का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म हो जाएगी।

दक्षिण भारत में एकीकृत आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी ने 2004-09 के अपने कार्यकाल में विरोधी दलों में विभाजन कराकर उनका अपनी पार्टी में विलय कराने की शुरुआत की थी। बतौर कांग्रेस मुख्यमंत्री उन्होेंने साल 2005 में टीआरएस के 12 विधायकों का दलबदल कराकर कांग्रेस में शामिल कराया था। इस साल टीआरएस ने वही कहानी दोहराते हुए कांग्रेस के 12 विधायकों को अपने दल में शामिल करके तेलंगाना में विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया है। बहरहाल, इसमें विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका काफी अहम हो जाती है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि ऐसे मामलों का निपटारा सदन के पटल पर ही किया जाएगा।

कर्नाटक के मौजूदा संकट का दिलचस्प पहलू यह है कि बागी विधायकों में एच डी कुमारस्वामी और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के समर्थक व विरोधी, दोनों शामिल हैं। इसने इस संदेह को भी जन्म दिया है कि कहीं इस संकट की जड़ में देवेगौड़ा और सिद्धरमैया की पुरानी प्रतिद्वंद्विता तो नहीं। ऐसी सूरत में भी स्पीकर का फैसला अब सबसे अहम हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने इस संकट के लिए सिद्धरमैया को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि सिद्धरमैया सत्ता में आने की साजिशें कर रहे थे। दरअसल, कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के संकट ने हालात को और ज्यादा गंभीर बना दिया। कुछ नेताओं का आरोप है कि सिद्धरमैया सारी शक्ति अपने हाथों में केंद्रित करने के लिए एकतरफा कदम उठाते रहे हैं। यह संघर्ष कांग्रेस और जनता दल(एस) से मतदाताओं को और दूर ले जाएगा। वैसे भी मतदाता पहले ही संसदीय चुनाव में इस गठबंधन की धुलाई कर चुके हैं। राज्य के लोगों का विश्वास जीतने का एक शानदार मौका इस गठबंधन को मिला था, मगर सत्ता की भूख समझदारी पर भारी पड़ी।

बागी विधायक मंत्री पद और कांग्रेस व जनता दल(एस) के बीच सत्ता में बेहतर साझेदारी चाह रहे हैं। वे पूरे राज्य के विकास के लिए पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप भी सीधे-सीधे कुमारस्वामी पर मढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ, कुमारस्वामी ने इस्तीफा देकर किसी और के लिए रास्ता साफ करने से इनकार कर दिया है। कांग्रेस के भीतर भी सिद्धरमैया और मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच नेतृत्व का मसला है। ऐसे में, कोई भी अदूरदर्शी प्रयास इन दोनों के हाथ से सत्ता को दूर कर देगा। भाजपा तो बस टकटकी लगाए वह वक्त देख रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 9th July