Hindustan Opinion Column on 6th November - वकीलों की हड़ताल, पुलिस की बगावत DA Image
23 नवंबर, 2019|1:39|IST

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वकीलों की हड़ताल, पुलिस की बगावत

दिल्ली की एक अदालत में रविवार को जो कुछ हुआ, वह न तो पहली बार घटा है और पूरी आशंका है कि यह अंतिम भी नहीं होगा। जल्द ही हमें ऐसी किसी दूसरी घटना के लिए तैयार रहना चाहिए। कुछ अदालतों के परिसर तो इसके लिए कुख्यात हैं, पर देश के किसी भी भाग में यह अप्रत्याशित नहीं है। अप्रत्याशित तो वह प्रतिक्रिया है, जो मंगलवार को दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने दिखाई पड़ी। हजारों की संख्या में पुलिसकर्मी सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अपने गम और गुस्से का इजहार किया। उनके विजुअल टीवी स्क्रीन पर देखते हुए मुझे 1973 के दृश्य याद आए, जब दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में पुलिस ने हड़ताल कर दी थी। यहां पर याद दिलाना उचित होगा कि किसी अनुशासनबद्ध सशस्त्र बल की हड़ताल के लिए बगावत शब्द का प्रयोग किया जाता है और उससे निपटने के लिए वही तरीके नहीं अपनाए जा सकते, जो समाज के दूसरे तबकों की हड़तालों के दौरान इस्तेमाल किए जाते हैं।

यहां यह भी ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने अपने कई निर्णयों में वकीलों की हड़ताल को न सिर्फ अवैध घोषित किया है, बल्कि भविष्य की हड़तालों पर भी पाबंदी लगाई है, लेकिन इन आदेशों का कोई असर शायद ही कभी दिखाई दिया हो। अपवाद स्वरूप कुछ मामलों में वकीलों को दंडित किया गया है, मगर आमतौर से दंड तभी दिया गया है, जब वकीलों ने जजों के साथ हिंसा की हो। ऐसा उदाहरण तो ढूंढ़ने पर भी शायद ही मिले, जिसमें समाज के दूसरे तबके, जैसे डॉक्टर, दुकानदार, पुलिसकर्मी या अदालत के छोटे कर्मचारी वकीलों र्की ंहसा के शिकार हुए हों, और उनके पक्ष में भी वैसी ही न्यायिक तत्परता दिखाई पड़ी हो, जैसी वकीलों की शिकायत पर दिखने लगती है। यह सवाल किसी भी नागरिक के मन में उठ सकता है कि अपने सम्मान के प्रति अति संवेदनशील अदालतें बार की हड़तालों को प्रतिबंधित करने वाले अपने फैसलों की धज्जियां उड़ती देखकर हड़तालियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवार्ई क्यों नहीं करतीं? इसका उत्तर ढूंढ़ना बहुत मुश्किल नहीं है।

देश भर में वकील सबसे संगठित ट्रेड यूनियन हैं। खासतौर से अदालत परिसर में, जहां वे बड़ी संख्या में मौजूद होते हैं, उनका आचरण किसी खराब ट्रेड यूनियन के सदस्यों जैसा हो सकता है। मुख्य रूप से उनकी ज्यादतियों के शिकार अदालतों के छोटे कर्मचारी होते हैं, कभी-कभी जजों को भी उनके हिंसक व्यवहार का खामियाजा भुगतना पड़ता है। इन दो के अतिरिक्त अदालतों में न्यायिक कर्तव्यों के लिए आने वाले पुलिसकर्मी सबसे अधिक उनके शिकार बनते हैं। पेशेवर अनुशासन के लिए उन्हीं द्वारा चुनी गई संस्थाएं हैं और हम अपवाद स्वरूप ही किसी वकील को कदाचरण के लिए इन संस्थाओं से दंडित होते देखते हैं। उच्च न्यायालयों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अधीनस्थ न्यायालयों में अनुशासन और न्यायिक शुचिता कायम रखें, पर एक बडे़ ट्रेड यूनियन समूह के खिलाफ वे भी बहुत प्रभावी नजर नहीं आते।

अपनी ट्रेड यूनियन ताकत को लेकर वकील कितने आश्वस्त हैं, इसका उदाहरण रविवार की घटना के अगले दिन दिल्ली की सड़कों पर देखने को मिला, जब वकीलों ने देश की राजधानी में पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों को पीटा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। यह तब हुआ, जब एक दिन पहले बिना पुलिस का पक्ष सुने अदालत उन्हें राहत दे चुकी थी और यही पुलिसकर्मियों के गुस्से का फौरी कारण भी बना। ट्रेड यूनियन की यही मनोवृत्ति हम इलाहाबाद, लखनऊ  या पटना की सड़कों पर भी देख सकते हैं, जहां जरूरी नहीं है कि पुलिस वाले ही उनके शिकार बने हों। बहुत से मामलों में दुकानदार, डॉक्टर या वाहन चालक उन्हें झेलते हैं। शायद ही उनके खिलाफ दर्ज सामूहिक हिंसा का कोई मामला तार्किक परिणति तक पहुंचता है। कुछ ही समय पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता कन्हैया कुमार को पुलिस हिरासत से घसीटकर कुछ वकीलों ने पीटा, जिसे पूरे देश ने चैनलों पर लाइव देखा, पर उनमें अनुशासन कायम रखने वाली किसी संस्था ने कोई प्रभावी कार्रवाई की हो, ऐसा नहीं लगता।

देश की राजधानी में जो कुछ हुआ है, उसे देखते हुए तो लगता है कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय इसे गंभीरता से लेंगे। पुलिसकर्मियों का जमावड़ा स्वत:स्फूर्त हो भी, तब भी इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। किसी सशस्त्रबल के सदस्यों को अपने कमांडरों के हुक्म की अवहेलना की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। हर बल में इस स्थिति से निपटने का एक आंतरिक तंत्र होता है और उम्मीद है कि दिल्ली पुलिस भी इस दिशा में सक्रिय होगी। पर इस बार तो सर्वोच्च न्यायालय से भी सक्रियता की उम्मीद की जानी चाहिए। उसकी इमारत से कुछ ही किलोमीटर के दायरे में न्याय प्रणाली के एक महत्वपूर्ण पुर्जे वकील कानून-कायदे की धज्जियां उड़ाते रहे। उनके मन से यह विश्वास खत्म होना चाहिए कि वे कुछ भी कर लें, उनका कुछ नहीं बिगडे़गा। दिल्ली भर के सीसीटीवी कैमरे उनके ऐसे कुकृत्यों से भरे हुए हैं।

इसे भी गंभीरता से देखने की जरूरत है कि वकालत के पेशे में किस तरह के लोग आ रहे हैं। देश के कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों और विधि महाविद्यालयों को छोड़ दिया जाए, तो ज्यादातर संस्थानों से अधकचरे ज्ञान और अधूरी समझ वाले कानून के विद्यार्थी निकल रहे हैं और भीड़ के रूप में अदालतों में खप रहे हैं। ये कुछ भी करके रातों-रात अमीर होना चाहते हैं। इस गलाकाट स्पद्र्धा की दुनिया में स्वाभाविक है कि हर अदालत में कुछ ही वकील सफल होते हैं, शेष गैर-पेशेवर तरीकों से भी कामयाबी हासिल करना चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। एक मजबूत ट्रेड यूनियन के सदस्य होने के कारण उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती, जिससे उनका दुस्साहस बढ़ता जाता है। यही समय है, जब कानून की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर वकालत का पेशा अपनाने वालों में पेशेवर नैतिकता और अनुशासन कायम करने के लिए उसी तरह की जिम्मेदार संस्था बनाने के बारे में सोचा जाए, जैसा चिकित्सा के क्षेत्र में किया गया है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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