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23 जनवरी, 2020|11:21|IST

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निरंतर बढ़ रही है जिनकी प्रासंगिकता

rajani chandiwala  assistant professor  university of delhi

यह 1950 की बात है, जब बाबा साहब आंबेडकर ने भविष्य के भारत को एक चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि  हमें केवल ‘राजनीतिक  लोकतंत्र मिल भर जाने से खुश नहीं हो जाना चाहिए, क्योंकि  भले विदेशी सत्ता हमारे देश से चली गई हो, लेकिन हमारा समाज अभी भी असमानताओं और भेदभावों (हायरारकी) से अटा पड़ा है। यह देश 26 जनवरी, 1950 को जब गणतंत्र के  तौर पर एक  नई पारी की शुरुआत करेगा, तब इस पारी की नींव एक अंतद्र्वंद्व पर रखी गई होगी, जहां राजनीतिक समानता तो होगी, लेकिन समाजिक  व आर्थिक  बराबरी नहीं होगी।’ इस आर्थिक और सामाजिक बराबरी से जब तक हम दूर रहेंगे, बाबा साहब आंबेडकर हमारे लिए प्रासंगिक बने रहेंगे। उससे कहीं ज्यादा, जितने वह आजादी की लड़ाई में प्रासंगिक थे।

आज 2019 में, जब भारत विक्रम लैंडर के  जरिए चांद को छूने की संभावनाएं तलाश रहा है, तब इसी गणतंत्र में हर महीने दलित समुदाय से आने वाले कई लोगों को सीवर की सफाई करते वक्त अपनी जान गंवानी पड़ती है। सिर्फ साल 2019 के शुरुआती छह महीनों में 50 से अधिक  दलित सीवर में मौत का शिकार हो चुके  हैं। मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजे गए सफाई कर्मचारी आंदोलन के अध्यक्ष बेजवाडा विल्सन का आकलन है कि अभी भी लाखों लोग आधुनिक भारत मेें सिर पर मैला ढोने को मजबूर हैं। इन दोनों ही तरह के मामलों में न किसी तकनीक को विकसित करने के लिए बड़ा अभियान या बड़ा निवेश शुरू किया गया है, और न ही इस अभिशाप से मुक्ति की कोई बेचैनी ही कहीं दिखाई देती है। अगर इतना ही काफी नहीं है, तो एक बार हमें तीन साल पहले की उना (गुजरात) की उस घटना को भी याद कर लेना चाहिए, जो बताती है कि समाज में जातिगत हिंसा और प्रताड़ना आज भी किस कदर जारी है।

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर 1930 के दशक में जब दलित और निचली जातियों के अग्रणी नेता के तौर पर उभर रहे थे, तब उन्होंने आजादी के संघर्ष को एक नया सपना दिया था। वह एक ऐसे नेता के तौर पर उभरे, जो खुद दलितों के बीच से निकला था और उनकी सच्चाई और अस्पृश्यता के दर्द को खुद जी चुका था। इसीलिए दबी-कुचली जातियों के लिए कई मायनों में महात्मा गांधी से ज्यादा महत्वपूर्ण नेता आंबेडकर थे। इसका कारण यह भी था कि वह दलित और निचली जातियों के लिए एक जीती-जागती मिसाल थे। उस समय, जब पढ़ना तो दूर की बात, दलितों को कुएं से पानी लेने और सार्वजनिक स्थानों और संसाधनों के इस्तेमाल तक पर पाबंदी थी, भीमराव आंबेडकर लंदन और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करके एक बैरिस्टर और गंभीर विचारक के तौर पर भारत के राजनीतिक पटल पर उभरे थे।

1930 के दशक में उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने समकालीन दलित आंदोलनों को एक वैचारिक आधार दिया। मई 1936 में जात-पात तोड़क को दिए अपने वक्तव्य (जो भाषण रोक दिया गया और बाद में एनहीलिएशन ऑफ कास्ट के तौर पर जाना गया) में उन्होंने सीधे वर्ण व्यवस्था पर आधारित हिंदू धर्म के ढांचे को ही मूल रूप से अस्पृश्यता व जातीय भेदभाव का उद्गम माना। हालांकि गांधीजी जैसे बड़े नेता का उनसे इस पर मतभेद रहा, मगर इस वक्तव्य ने जाति प्रथा के खिलाफ एक नए विमर्श को जन्म दिया। इससे जाति की समस्या केवल हिंदू धर्म में गलत तरीके से व्यवहार में लाने के विकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक वैचारिक समस्या और विवाद के तौर पर उभरी। इसके नतीजतन आजाद भारत के संविधान की संरचना में समानता का सिद्धांत मुख्य तौर पर उभरा।

इसीलिए बाबा साहब आजाद भारत में पिछले 65 सालों में न सिर्फ दलितों के लिए, बल्कि सभी हाशिए के समुदायों के लिए एक प्रेरणास्रोत व मुख्य विचार के तौर पर उभरे। संघर्षरत दलितों और अन्य पिछड़े तबकों के लिए वह एक बेहतर जिंदगी के प्रतीक भी बने। यह खासतौर से हमें 1950 के बाद हुए राजनीतिक और गैर-राजनीतिक आंदोलनों में दिखता है। जहां कहीं भी लड़ाई मानवीय अस्मिता की रही या हो रही है, वहां वह एक प्रतिमान भी हैं और एक मार्गदर्शक भी। उन्होंने दलितों  के सवाल को एक राजनीतिक सवाल बनाकर वर्तमान भारत में अपने हकों के लिए लड़ने को एक वैधता दी। उनका दिया यह नारा पढ़ो, संघर्ष करो, संगठित हो  एक ऐसा मंत्र है, जिसके आलोक में शैक्षणिक संस्थानों में, उनके बाहर सड़कों पर और राजनीतिक तौर पर जाति-व्यवस्था और भेदभाव को मिटाने की लड़ाई जारी है। पायल थानवी और रोहित वेमुला जैसी घटनाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि यह लड़ाई अभी बहुत लंबी है, और बहुत जटिल भी।

बाबा साहब एक राष्ट्रीय नेता थे और उनको ऐसे ही समझना जरूरी है। वह संविधान निर्माता के तौर पर, दूरदर्शी समाजशास्त्री के तौर पर और विचारक के तौर पर तो सामने आते ही हैं, आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा भी हमें दिखाते हैं। उनके योगदान को सिर्फ एक दलित नेता के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। वह समाज में उस समता को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे, थे जो किसी भी लोकतंत्र की सफलता की सबसे अहम शर्त है। आगे की राह के लिए भी हमें उनकी यह हिदायत याद रखनी होगी- आखिर हम कब तक अंतद्र्वंद्वों का जीवन जीते रहेंगे, कब तक सामाजिक और आर्थिक समानता से लोगों को महरूम रखेंगे... अगर हम लंबे समय तक इसे नजरअंदाज करते रहे, तो एक सच्चे लोकतंत्र बनाने की प्रक्रिया को भी ताक पर रख देंगे।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 6th December