Hindustan Opinion Column on 5th November - नीले आसमान और साफ हवा के लिए DA Image
23 नवंबर, 2019|1:47|IST

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नीले आसमान और साफ हवा के लिए

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इन दिनों प्रदूषण इतना ज्यादा हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट न केवल दिल्ली सरकार, बल्कि केंद्र सरकार को भी फटकार लगाने को मजबूर हुआ है। पंजाब और हरियाणा सरकारों को भी नसीहत दी गई है। वाकई दिल्ली का हाल बुरा है। ठंडी लगभग पहुंच चुकी है और हम दिल्ली में इस कोशिश में हैं कि सांस न लेनी पडे़, क्योंकि सांस लेते ही ठंडी भारी हवा मिलती है और वायु प्रदूषण से हम घुटने लगते हैं।

पर्यावरण की अवहेलना हो रही है और सुधार की कोशिशें भी चल रही हैं। कुछ प्रमाण हैं कि हमने प्रदूषण के ग्राफ को थोड़ा झुकाया है, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। मैं अक्सर ऐसा कहती हूं, क्योंकि अपने सामूहिक रोष के बावजूद हम भूल जाते हैं कि हमें सुधार की जरूरत पर केंद्रित रहना चाहिए। यह एक ऐसा मोर्चा है, जहां हम अंतर साफ देख सकते हैं और सहज ही यह भी जान सकते हैं कि हम और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। स्थिति गंभीर है। हमें इस बात पर अब दृढ़ता के साथ ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि हम सांस लेने के अधिकार से किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकते। 


आखिर हुआ क्या है? सबसे पहले तो वायु गुणवत्ता की स्थिति और उसका हमारे स्वास्थ्य से संबंध के बारे में सार्वजनिक सूचना का सवाल है। कुछ साल पहले, सरकार ने वायु गुणवत्ता सूचकांक की शुरुआत की थी, जिसमें हमें बताया गया था कि प्रदूषण के प्रत्येक स्तर का हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है। हमारे देश में बड़ी संख्या में वायु गुणवत्ता जांचते रहने के लिए वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन स्थापित हैं। 


यह सूचना सांस-दर-सांस उपलब्ध है, हमारे फोन पर हमारे सामने। हम जानते हैं कि सांस लेना कब विषाक्त होता है। आज हम प्रदूषण के बारे में जानते हैं और रोष में हैं। पर यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए, स्टेशनों का यह नेटवर्क देश के अनेक हिस्सों में मौजूद नहीं है। अधिकांश शहरों में एक या दो निगरानी केंद्र ही हैं, इसलिए ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते हैं, लेकिन दिल्ली में जहरीली हवा अब एक राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। ज्यादातर राजनीतिक दल सुधार की कोशिशों का श्रेय लेने की होड़ में उलझे हैं। यह भी खूब रही! 


दूसरी बात, पिछले कुछ वर्षों में यकीनन बहुत कुछ किया गया है- समय से पहले बीएस फोर फ्यूल व्यवस्था की शुरुआत करने से लेकर कोयला आधारित ताप विद्युत घरों को बंद करने तक। आज दिल्ली में पेट्रोलियम कोक, फर्नेस ऑयल और कोयले के किसी भी प्रकार के औद्योगिक उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध है। यह अच्छी बात है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। दिल्ली को पूरी तरह से स्वच्छ गैस या विद्युत ऊर्जा की ओर लाने की जरूरत है। आंशिक रूप से डीजल कारों की बिक्री घटी है, क्योंकि डीजल और पेट्रोल वाहनों के बीच कीमतों के अंतर को घटाने की सरकारी नीति है। डीजल कारों की बिक्री इसलिए भी घटी है, क्योंकि ऐसे वाहनों पर न्यायालय ने भी प्रहार किए हैं। ऐसे वाहनों की उम्र तय करने को कहा गया था और लोगों को जहरीले डीजल के बारे में जागरूक करने के लिए भी कहा गया था। 


कुछ वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्र्ट ने प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों पर सबसे पहले भीड़भाड़ शुल्क लगाया था, ताकि उन्हें शहर में आने या शहर से गुजरने से रोका जाए। इस साल यह कदम फलीभूत हो जाएगा। शहर को बाईपास करने वाले पूर्वी और पश्चिमी एक्सप्रेस वे को आखिरकार भारी वाहनों के लिए चालू कर दिया गया है। शहर में आने वाले ट्रकों की संख्या घट जाएगी और साथ ही प्रदूषण भी। अब हमें सार्वजनिक परिवहन सुविधा के विस्तार से इस पहल को मजबूती देनी चाहिए, ताकि निजी वाहनों पर लोगों की निर्भरता कम हो, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। 


मेरे सहयोगियों ने पिछले दशक की वायु गुणवत्ता का डाटा जुटाया है और उन्हें जो परिणाम मिले हैं, वे निम्नलिखित हैं : पहला, स्मॉग का सालाना समय घट रहा है, यह समय देर से शुरू हो रहा है और जल्दी खत्म हो रहा है। दूसरी बात, वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र आठ वर्ष से सक्रिय हैं और उनके आंकड़ों के अनुसार, यदि तुलना करें, तो प्रदूषण में गिरावट का रुख दिखता है।

पहले के तीन वर्षों से तुलना करें, तो पिछले तीन वर्षों में करीब 25 प्रतिशत की कमी आई है। सभी निगरानी केंद्रों से प्राप्त आंकडे़ इसकी तस्दीक करते हैं। यह एक अच्छी खबर है। अब बुरी खबर की बात। प्रदूषण में कमी हुई है, लेकिन स्थिति फिर भी ठीक नहीं है। हमें प्रदूषण को और 65 प्रतिशत कम करना होगा, ताकि हमें जैसी वायु चाहिए, वैसी मिल सके। हम छोटे उपाय कर चुके हैं। पहली और दूसरी पीढ़ी के सुधार हो चुके हैं, लेकिन हमें सुधार की दिशा में एक लंबा रास्ता तय करना है। स्वच्छ वायु पाने के लिए हमें ईंधन खपत के अपने तरीके में व्यापक बदलाव करने होंगे।

कोयले के इस्तेमाल को पूरी तरह से बंद करना होगा। हमें बसों, मेट्रो, साइकिल ट्रैक और पैदल पथ में निवेश करके सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या में कमी करना होगा। प्रदूषण फैलाने वाले पुराने वाहनों को उपयोग से हटाना होगा, लेकिन इन उपायों का तब तक ज्यादा लाभ नहीं होगा, जब तक कि हम प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों पर लगाम नहीं लगाते। हमें कचरा-कूड़ा जलाने, धूल फैलाने और खाना बनाते समय अनावश्यक धुआं पैदा करने की आदत छोड़नी पडे़गी। इन प्रदूषणों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना तब तक मुश्किल है, जब तक कि जमीनी स्तर पर प्रयास नहीं किए जाते, जब तक हम इनका विकल्प नहीं खोज लेते।


प्लास्टिक और अन्य औद्योगिक-घरेलू कचरे को अलग करना होगा, एकत्र करना होगा और शोधित करना होगा। कचरा कहीं फेंक देना या जला देना समाधान नहीं है। स्थानीय प्रदूषण पर नियंत्रण प्रदूषण विरोधी लड़ाई की सबसे कमजोर कड़ी है। इन कमियों पर गौर करना होगा, ताकि हम उनसे उबर सकें। यकीनन, हम नीले आसमान और अपने स्वच्छ फेफडे़ के लिए यह जंग जीतेंगे।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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