Hindustan Opinion Column on 4th November - औद्योगिक विकास के भावी अंदेशे DA Image
23 नवंबर, 2019|1:31|IST

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औद्योगिक विकास के भावी अंदेशे

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भागो नहीं, दुनिया को बदलो- 1945 में लिखी अपनी इस किताब को महापंडित राहुल सांकृत्यायन पोथी कहते थे। इसकी भूमिका में ही उन्होंने लिखा था-  मैं किसी एक आदमी को दोसी (दोषी) नहीं मानता, आज जिस तरह का मानुख (मानुष) जाति का ढांचा दिखाई पड़ता है, असल में सब दोस (दोष) उसी ढांचे का है। जब तक वह ढांचा तोड़कर नया ढांचा नहीं बनाया जाता, तब तक यह दुनिया नरक बनी रहेगी। ढांचा तोड़ना भी एक आदमी के बूते का नहीं है। इसके लिए उन सब लोगों को काम करना है, जिनको इस ढांचे ने आदमी नहीं रहने दिया। 

आज 74 साल बाद यह बात एकदम साफ है कि दुनिया को बदलने की कोशिश करते-करते इंसान बदल गया है। जितना बदला है, उस पर तो बहुत कुछ कहा गया, लिखा गया है, लेकिन यह तो सिर्फ ट्रेलर है...। राहुल जी के सिर्फ तीन साल बाद, यानी 1948 में जॉर्ज ऑरवेल ने एक उपन्यास लिखा था। नाम था 1984। 

हालांकि वह साम्यवाद पर एक टिप्पणी के तौर पर लिखा गया उपन्यास था, लेकिन उसमें भविष्य के समाज की एक डरावनी, बल्कि खौफनाक तस्वीर खींची गई थी। मैंने खुद 1974-75 में कभी उसे पढ़ा और एक साइंस फिक्शन की तरह यह मानकर हंसते हुए किनारे रख दिया कि ऐसा भी कभी हो सकता है? खौफनाक बात दरअसल यही है कि 1984 में तो नहीं  हुआ, लेकिन अब 2019 में लगता है कि वह पूरा का पूरा उपन्यास साकार हो चुका है। आज वााट्सएप और पेगासस के खुलासे के बाद अगर आप वह उपन्यास पढ़ेंगे, तो आपको लगेगा कि थॉट पुलिस या विचार पुलिस की कल्पना कितने ठोस आधार पर खड़ी थी। 

लेकिन बात राजनीति से परे भी है। इंसान के बदलने की बात। पिछले दिनों एक के बाद एक कई किताबें आई हैं, जिनमें इस बात पर खासी मशक्कत की गई है कि इंसान ने अपनी जिंदगी आसान बनाने के लिए और तरक्की की रफ्तार तेज करने के लिए जो तकनीक ईजाद की है,उससे अब इंसान का रिश्ता क्या रहने वाला है? क्या इंसान तकनीक पर सवार होकर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहेगा या अब यह शेर की सवारी बन चुकी है?

यह सवाल अब हमारी दुनिया का सबसे बड़ा सवाल है। इस वक्त दुनिया के सबसे चर्चित लेखक हैं युवाल नोआ हरारी, जिनकी ताजा किताब मानव जाति की इस दुविधा पर बहुत कुछ कहती है। 21वीं सदी के  लिए 21 सबक उन्होंने निकाले हैं लंबी पढ़ाई-लिखाई के बाद। इन 21 अध्यायों में आप पाएंगे कि अंत में बात वहीं आती है, जहां राहुल जी छोड़ गए थे। उन लोगों की बात, जिनको इस ढांचे ने आदमी नहीं रहने दिया। 

इसी बात को बहुत जोर देकर लिखा है कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करने वाले अतुल जालान ने अपनी किताब वेयर विल मैन टेक अस में। यह किताब एक अलग अंदाज में इस मसले को पकड़ती है। शीर्षक का ही दूसरा हिस्सा है उस इंसान की कहानी, जिसे टेक्नोलॉजी बना रही है। यही पूरे किस्से का निचोड़ है। 

इंसान ने तकनीक का सहारा लिया था अपनी तरक्की को तेज करने के लिए। औद्योगिक क्रांति के दौरान ही दुनिया के बहुत बडे़ हिस्से में इस बात पर सवाल उठ रहे थे कि कुछ अमीर देशों की तरक्की के लिए बाकी दुनिया कुर्बानी क्यों दे रही है? भारत की ही न जाने कितनी तरह की पारंपरिक कारीगरी और कारीगर उस क्रांति की भेंट चढ़ गए। अंग्रेजों के अत्याचारों की बहुत सी रक्तरंजित और रोंगटे खडे़ कर देने वाली दास्तानें आज भी हमारे इतिहास का हिस्सा हैं। अगर वह पहलू छोड़ भी दिया जाए, तब भी इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि लाखों लोगों का रोजगार उस मशीनीकरण की भेंट चढ़ गया। गांधी ने चंपारण जाकर यही सत्य पहचाना और स्वदेशी के नारे को आजादी के आंदोलन की धुरी बना दिया।   

अब ऑटोमेशन, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ चौथी औद्योगिक क्रांति का झंडा बुलंद है। तमाम औद्योगिक संगठनों की बैठक में जाकर देखिए। वहां का नया नारा है इंडस्ट्री 4.0 यानी औद्योगीकरण का चौथा चरण। ये वे फैक्टरियां होंगी, जहां कंप्यूटर करीब-करीब सब कुछ कर लेंगे। भारत में सौ से लेकर हजार इंसानों तक का काम घटाकर सिर्फ दस लोगों के हाथों तक पहुंचाने वाली फैक्टरियां लग चुकी हैं। इजरायल  में तो ऐसी फैक्टरियां लग गई हैं, जहां हजारों लोगों के बराबर का काम सिर्फ रोबोट कर रहे हैं और कोई इंसान महीनों तक उस फैक्टरी में कदम तक नहीं रखता। 

ये सुनकर डर नहीं लगता। ऐसा ही डर तो हर बार उद्योगों के बढ़ने के साथ लगता रहा है। भारत में कंप्यूटर आए, तो कितना विरोध हुआ था? आज लगता है कि कितने नासमझ थे वे विरोध करने वाले। कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर ने ही तो दुनिया के बाजारों में भारत का सिक्का फिर चला डाला। इस बार भी यही तर्क दिए जा रहे हैं कि एक काम जाएगा, तो उसकी जगह उससे बेहतर दूसरा काम आएगा। अब तक के इतिहास में कमोबेश ऐसा ही होता रहा है। लेकिन यहां म्यूचुअल फंड के विज्ञापनों में आनेवाली एक लाइन काम की है- पिछली सफलता भविष्य में भी अच्छे प्रदर्शन का संकेत नहीं है। 

भाप के इंजन के साथ आई पहली औद्योगिक क्रांति में घोड़ा गाड़ी हांकने वाले जो लोग बेकार हो गए, कुछ समय बाद उन्हें टैक्सी चलाने जैसे दूसरे काम मिल गए। मगर यह तर्क अब ज्यादा दिन साथ देने वाला नहीं है। क्योंकि इस दौर में जो लोग बेरोजगार होंगे, उनके लिए आस-पास कोई दूसरा काम मिलेगा, या वे जल्दी से खुद को किसी और काम के लायक बना पाएंगे, इसकी उम्मीद न के बराबर है। युआल नोआ हरारी के शब्दों में, इस बार वे लोग खुद को घोड़ागाड़ी के कोचवान की तरह नहीं, उस घोड़े की तरह पाएंगे, जिसके लिए अब आगे कहीं कोई काम नहीं है। अगर आपको नोआ हरारी का उदाहरण पसंद नहीं है, तो उत्तर भारत में सड़क से लेकर खेत तक विचरती गायों पर नजर डाल लीजिए। 

संकट बहुत बड़ा है। निपटना आसान नहीं है। लेकिन निपटने की कोशिश भी तभी हो पाएगी, जब पहले हम सब मान लें कि यह संकट है। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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