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क्यों जरूरी है रूस का साथ

साल 1964 में तत्कालीन अमेरिकी राजनयिक चेस्टर बॉउल्स और मॉस्को में तैनात भारतीय राजदूत टी एन कौल की आपसी मुलाकात समकालीन भू-राजनीति के बारे में दिलचस्प नजरिया पेश करती है। उस बैठक में दक्षिण-पूर्व एशिया की चर्चा करते हुए बॉउल्स ने कहा था, ‘सुखद होगा, यदि सोवियत और अमेरिकी सोच को भारत करीब लाने की कोशिश करे... दोनों मुल्कों के साथ भारत की दोस्ती इस काम में सेतु का काम कर सकती है।’ बॉउल्स ने यह भी कहा, ‘मुझे भरोसा है, दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की बढ़ती विस्तारवादी और हस्तक्षेपकारी नीति को रोकने के लिए भारत की मदद से अमेरिका और सोवियत संघ कुछ हद तक आपसी समझ बना लेंगे।’ इसके जवाब में कौल ने कहा था, ‘यह भारत के लिए सचमुच खुशी की बात होगी कि वह अपनी क्षमता के मुताबिक अमेरिका और सोवियत संघ को करीब लाने में मदद कर सके। वास्तव में, हमारी यही नीति है।’ 

यह बातचीत बताती है कि उस वक्त वाशिंगटन और मॉस्को के बीच मेल-मिलाप में भारत की कितनी भू-रणनीतिक अहमियत थी। कौल ने सितंबर 1965 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेजे अपने संदेश में कहा भी था, ‘अमेरिका, सोवियत संघ और भारत के आपसी हितों में एक बात साझी है, वह है- इस क्षेत्र में चीन के विस्तार को रोकना। यह भारत के लिए एक मौका है कि वह दोनों देशों से अधिकतम लाभ हासिल करे और भविष्य के लिए खुद को मजबूत करे।’

हालांकि इतिहास ने दूसरा ही रुख अख्तियार किया। 1960 का दशक बताता है कि चीन-सोवियत संघ के वैचारिक संघर्ष ने कम्युनिस्ट दुनिया में एक बेजा विवाद की शुरुआत की। विडंबना है कि नई दिल्ली और वाशिंगटन, दोनों ने उस प्रवृत्ति को अलग-अलग चश्मे से देखा। एंग्लो-अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए वह वक्त रूस को अलग-थलग करने और चीन को अपने पाले में वापस लाने के सपने के साकार होने जैसा था। जबकि भारत के लिए, वाशिंगटन और मॉस्को की आपसी समझ के माध्यम से चीन पर दबाव बनाने के उसके स्वप्न का टूटना था, और नई दिल्ली अपने हितों और सुरक्षा के लिए नई राहों की तलाश करने को मजबूर हुई।

साल 1969 तक दो-ध्रुवीय प्रणाली वाली दुनिया बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ने लगी। अमेरिका और चीन में नजदीकियां बढ़नी शुरू हुईं, जबकि भारत व सोवियत रूस ने इस नई वैश्विक गठजोड़ के जवाब में आपसी विश्वास सर्वोच्च रणनीतिक स्तर तक विकसित किया। दिसंबर 1971 ने इस नई बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को एक बार फिर पुष्ट किया, जब बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भारत के हस्तक्षेप को रोकने के लिए एंग्लो-अमेरिकी योजनाओं के जवाब में सोवियत नौसेना ने हिंद महासागर में प्रवेश किया। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी हालिया मॉस्को यात्रा में कहा भी है कि इसी दौर ने चार दशक से भी पुराने उस रिश्ते की नींव रखी, जिसने बाद में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तमाम तनावों का मिलकर सामना किया; फिर चाहे वह 1989 में पहले शीत युद्ध का अंत हो या 1991 में सोवियत संघ का विघटन।हाल के वर्षों पर यदि हम निगाह डालें, तो अतीत की यह गूंज आज भी सुनाई देती है। अमेरिका-रूस-चीन का मौजूदा त्रिकोण जटिल है, जो अक्सर भारत के सामरिक विमर्श में अस्पष्ट या विकृत रूप में पेश किया जाता है।

चीन पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख और चीन-अमेरिकी संबंधों को फिर से परिभाषित करने के प्रयासों के बावजूद अभी तक चीन के उदय को जवाब देने के लिए एक विश्वसनीय और टिकाऊ अमेरिकी नीति हम नहीं देख सके हैं। यहां तक कि चीन-रूस की बढ़ती नजदीकी भी अमेरिकी सोच में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला पाई है। हाल के वर्षों में, अमेरिका बेशक उत्तर कोरिया पर दबाव बनाने का प्रयास करता दिखा है, लेकिन मध्य-पूर्व के संघर्षों या चीन सागर में समुद्री विवाद से यह जाहिर होता है कि रूस और चीन एक-दूसरे को मनोवैज्ञानिक और राजनयिक समर्थन देते हैं।

कार्नेगी मॉस्को सेंटर के निदेशक दमित्री त्रेनीन कहते हैं कि मौजूदा समय में रूस और चीन की दोस्ती ऐसी है कि वे ‘कभी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं थे, पर जरूरी नहीं कि हमेशा एक-दूसरे के साथ रहें’। यह फॉर्मूला ‘मॉस्को और बीजिंग के बीच एक ठोस साझेदारी को आगे बढ़ाता है। जहां उनके हित आपस में मिलते हैं, संघर्ष से वे परहेज करते हैं और जहां हित नहीं मिलते, वहां वे भरपूर लचीला रुख अपनाते हैं।’ यह बाजीगरी हमने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी देखी, जहां भारत की नई कश्मीर नीति के खिलाफ रूस और चीन मुखर थे। हालांकि रूस इससे अनजान नहीं है कि यूरेशिया के कुछ हिस्सों में मॉस्को के प्रभाव को चीन खत्म कर रहा है, मगर पश्चिम को संतुलित करने के लिए वह चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी को तवज्जो दे रहा है।

जब मुख्यधारा के अमेरिकी नीति-निर्माता अमेरिका-चीन और रूस के मजबूत त्रिकोण को देखते हैं, तो उनकी भू-रणनीतिक प्राथमिकताएं स्वाभाविक ही स्पष्ट हो जाती हैं। वास्तव में, पश्चिमी सोच के हिसाब से चीन के लिए दरवाजा अब भी काफी ज्यादा खुला है, जो रूस-चीन रिश्ते में दूरी पसंद करेगा, ताकि अमेरिका की गिरती वैश्विक हैसियत थामी जा सके। लेकिन भारत यकीनन विपरीत परिस्थिति पसंद करेगा, यानी चीन से रूस को दूर करने के लिए वह एशिया में मॉस्को के लिए अधिक विकल्प मुहैया कराना चाहेगा।

मॉस्को में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की टिप्पणी ने भारत-रूस संबंधों के अगले अध्याय के लिए कुछ ऐसी ही भूमिका बनाई है। हकीकत यही है कि बीजिंग को परेशान किए बिना रूस पहले से हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति को आकार दे रहा है। भारत, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे हिंंद-प्रशांत के देशों को उच्च तकनीक देने और नौसेना के आधुनिकीकरण में मदद करने से रूस यूरेशिया का एक खिलाड़ी बन गया है। 

मॉस्को को फिर से यह आश्वस्त करने से कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू नहीं है और वह खुले व समावेशी सुरक्षा और व्यवस्था-निर्माण में विश्वास रखता है, रूस हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी भूमिका को आकार दे सकता है। आज से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुरू हो रही दो दिवसीय रूस यात्रा इसी आश्वासन की अगली कड़ी साबित हो सकती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 4 september