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2 जुलाई, 2020|12:42|IST

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सऊदी अरब से नए रिश्तों का आगाज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब की संक्षिप्त, लेकिन एक महत्वपूर्ण यात्रा से वापस लौट आए हैं। इस दौरे की अहमियत इसी से पता चलती है कि भारत और सऊदी अरब अब खरीद-बिक्री के संबंधों से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी की बातें करने लगे हैं। दोनों देशों के बीच इस बाबत रणनीतिक साझेदारी परिषद के गठन का एक समझौता भी किया गया है, जो सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण साझा मसलों पर विचार-विमर्श करेगा। साफ है, कभी पाकिस्तान के करीब माना जाने वाला सऊदी अरब अब भारत के साथ संबंधों को नया कलेवर देने में जुट गया है। इससे नई दिल्ली-रियाद का आपसी कारोबार शिखर तो छूएगा ही, एशिया महाद्वीप का राजनीतिक समीकरण भी नया रूप ले सकता है।

सऊदी अरब व्यापार के लिहाज से भारत का चौथा सबसे बड़ा साझेदार है। 2017-18 में दोनों देशों के बीच 27.48 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। इसमें तेल की अहम भूमिका रही है। भारत की सबसे बड़ी जरूरत ऊर्जा सुरक्षा ही है। नई दिल्ली अपनी जरूरतों का 83 फीसदी तेल आयात करती है। आंकड़ों की मानें, तो इराक के बाद सऊदी अरब ही हमें सबसे ज्यादा तेल बेचता है। यहां तक कि तेल उत्पादन 50-60 फीसदी कम होने के बाद भी सऊदी अरब ने भारत को तेल देने में कभी आनाकानी नहीं की। पिछले साल भी उसने भारत को 4.03 टन कच्चा तेल निर्यात किया, जबकि उस साल हमने कुल 20.73 टन कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदा था। विकास दर को बनाए रखने में तेल की अहमियत किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में, भले ही नई दिल्ली अक्षय ऊर्जा के अधिकाधिक इस्तेमाल की ओर बढ़ चली हो और अन्य ऊर्जा-स्रोतों की तलाश कर रही हो, सऊदी अरब हमारा एक भरोसेमंद साथी बना हुआ है।

यह रिश्ता एकतरफा भी नहीं है। सऊदी अरब को भी हमारी जरूरत है। वह अब अपने संसाधनों का विस्तार कर रहा है। तेल-बाजार पर ही वह निर्भर नहीं रहना चाहता। ऐसा करना उसके लिए इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अमेरिका ने शैल तकनीक का इस्तेमाल करके अपने यहां तेल-उत्पादन बढ़ा दिया है। इससे वहां आयात काफी कम हो गया है और निर्यात भी अपेक्षाकृत ज्यादा हो रहा है। जाहिर है, सऊदी अरब जैसे देशों के लिए, जिनका राजकोष पूरी तरह से तेल-बाजार पर निर्भर है, विकल्प तलाशना जरूरी हो जाता है। चूंकि वैश्विक मंचों पर भारत की हैसियत लगातार बढ़ रही है, इसलिए सऊदी अरब विभिन्न क्षेत्रों में हमारे साथ साझेदारी करना चाहता है। इसी कड़ी में उसने पिछले महीने यह एलान किया था कि वह भारत में ऊर्जा, तेल-शोधन, इन्फ्रास्ट्रक्चर, खनन आदि में 100 अरब डॉलर का निवेश करने को इच्छुक है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा इस निवेश का खाका तैयार करने में मददगार साबित हुई होगी। विदेशी निवेश बढ़ाना मौजूदा सरकार की प्राथमिकता है भी।

‘पीपुल टु पीपुल कॉन्टेक्ट’ यानी दोनों देशों के नागरिकों के आपसी संबंधों को बेहतर बनाने में भी प्रधानमंत्री का यह दौरा अहम साबित हुआ है। दोनों देशों के बीच रुपे कार्ड शुरू करने को लेकर एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया गया है। सऊदी अरब में लगभग 26 लाख भारतीय काम करते हैं और वहां हर साल लाखों  तीर्थयात्री इबादत करने जाते हैं। इन सबके लिए वहां भारत का स्वदेशी भुगतान प्रणाली पर आधारित एटीएम कार्ड (रूपे) का इस्तेमाल काफी सहूलियत भरा होगा। संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बाद सऊदी अरब ही तीसरा खाड़ी देश है, जहां रुपे कार्ड को इस कदर मान्यता दी गई है।

इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि प्रधानमंत्री मोदी का ‘फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनीशिएटिव’ सम्मेलन को संबोधित करना था। उन्हें यहां मुख्य वक्ता के रूप में बुलाया गया था। यह वैश्विक निवेश का एक बड़ा मंच है, इसलिए इसे ‘मरुभूमि में दावोस’ भी कहा जाता है। इस सम्मेलन का पूरा हासिल तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन उम्मीद इसलिए बंधती है, क्योंकि बीते मार्च में संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान के पुरजोर विरोध के बाद भी इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) के उद्घाटन सत्र में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को सम्मानित अतिथि के रूप में बुलाया था। इसने इस्लामी निवेशकों का भरोसा भारत पर बढ़ाया था। ऐसे वक्त में, जब पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में अनवरत जुटा हुआ है, और खाड़ी व इस्लामी देशों में भारत को बदनाम कर रहा है, तब सऊदी अरब द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को मुख्य वक्ता के रूप में बुलाना और इससे पहले उनकी पिछली यात्रा में उन्हें अपने यहां के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजना यह बताता है कि भारत की अहमियत को सऊदी अरब समझ रहा है।

रही बात पाकिस्तान की, तो तमाम समीकरण यही बता रहे हैं कि अब इस्लामाबाद की उकसावे में रियाद शायद ही आना पसंद करेगा। पिछले दिनों पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम इमरान खान भी सऊदी अरब पहुंचे थे, ताकि कश्मीर की सांविधानिक स्थिति बदलने के खिलाफ वह भारत पर दबाव डलवा सकें। मगर सऊदी अरब ने ऐसा करने से सीधे मना कर दिया। एक समय बेशक इस्लामी राष्ट्रों में पाकिस्तान की हैसियत हुआ करती थी, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि यहां उसकी स्थिति काफी खराब हुई है। उसने अपनी यह गति स्वयं की है। अव्वल तो वह गलत विदेश नीतियों का पोषण करता है, और फिर स्वयं उन बैठकों या सम्मेलनों से किनारे हो रहा है, जहां भारत को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। इसमें इस्लामी देशों के मंच भी शामिल हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 31th Oct 2019