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8 जुलाई, 2020|12:40|IST

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काबुल में नई करवट के बाद

नाजुक दौर से गुजर रहा अफगानिस्तान एक नई करवट लेने जा रहा है। लगभग 18 वर्षों से अमेरिका की सेना यहां मौजूद है, लेकिन तमाम प्रयत्न करने के बाद भी तालिबान को हराने में वह सफल नहीं हो सकी। अमेरिका की राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह शिथिल पड़ चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज वापस बुला ली जाए। अमेरिका व तालिबान के बीच बातचीत जारी है और जानकार मानते हैं कि दोनों पक्षों के बीच जल्द ही एक समझौता हो जाएगा, जिसके बाद यहां से अमेरिकी सैनिकों की रवानगी शुरू हो जाएगी। अमेरिका की इस हार के कई कारण हैं, लेकिन मुख्य वजह है पाकिस्तान और तालिबान के प्रति उसकी लचीली नीति। इस नीति को समझने के लिए हमें 9/11 के न्यूयॉर्क आतंकी हमले से पहले और बाद की स्थिति को टटोलना होगा।

अल कायदा का मुखिया ओसामा बिन लादेन साल 1996 में अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर आया था, जहां तालिबान के तत्कालीन मुखिया मुल्ला उमर के साथ उसके घनिष्ठ रिश्ते बने। लादेन ने यहीं से अमेरिकी हितों पर हमले शुरू किए। अमेरिका को तालिबान से कोई बैर नहीं था, लेकिन अल कायदा को पनाह देना उसे नागवार गुजरा। इसीलिए अमेरिकी कूटनीतिज्ञों ने मुल्ला उमर से ओसामा का साथ छोड़ने की मांग की। मगर मुल्ला उमर ने इसे हमेशा नजरंदाज किया। रही-सही कसर 9/11 के आतंकी हमले ने पूरी कर दी, जिसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया। 

नॉर्दन एलांयस की सेनाओं की मदद से अमेरिका ने तालिबान को भागने पर मजबूर कर दिया, लेकिन उन्हें पाकिस्तान में पनाह मिल गई। और कुछ ही वर्षों में तालिबान ने पाकिस्तान की सहायता से इतनी ताकत हासिल कर ली कि वे अफगानिस्तान में घुसकर अमेरिकी सेना को आंखें दिखाने लगे। अमेरिकी फौज को पाकिस्तान में प्रवेश की इजाजत नहीं मिली, इसलिए तालिबान की शक्ति बढ़ती गई और इन 18 वर्षों में उन्होंने 2,500 से अधिक अमेरिकी सैनिकों को मार गिराया है। यह स्थिति तब है, जब अफगानिस्तान में अमेरिका 10 खरब डॉलर की धनराशि खर्च कर चुका है। जाहिर है, राष्ट्रपति ट्रंप आज कुछ भी लीपापोती करें, हकीकत यही है कि तालिबान और उनके आका पाकिस्तान के सामने अमेरिका ने घुटने टेक दिए हैं।

अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत पिछले साल अक्तूबर से शुरू हुई, जिसके मुख्यत: चार बिंदू हैं। पहला, तालिबान की मांग है कि अमेरिकी सेना अफगास्तिान से वापस लौट जाए। दूसरा, अमेरिका चाहता है कि तालिबान किसी भी सूरत में फिर किसी अंतरराष्ट्रीय आतंकी गुट को अफगानिस्तान में जमने न दे। तीसरा, युद्ध विराम। और चौथा बिंदु है, शांति वार्ता के लिए अफगान सरकार और तालिबान के बीच प्रत्यक्ष बातचीत का सिलसिला शुरू हो। माना जाता है कि तालिबान इससे सहमत है कि वह अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने वाले आतंकी गुटों को पनपने नहीं देगा। मगर अमेरिकी फौज की वापसी पर अब भी कांटा फंसा है। तालिबान अमेरिकी फौज की जल्द रवानगी के इच्छुक हैं, जबकि अमेरिका इसके लिए एक साल का वक्त चाहता है। उम्मीद यही है कि जल्दी ही इन दोनों पहलुओं पर सहमति बन जाएगी।

तालिबान यह तो मान गया है कि अफगानिस्तान में अमेरिका की ‘इंटेलिजेंस प्रेजेंस,’ यानी उसकी खुफिया एजेंसियों की मौजूदगी रहेगी, जिनके जरिए वाशिंगटन यह भरोसा कर पाएगा कि अफगानिस्तान से आतंकी गुट उसके हितों को नुकसान नहीं पहुंचा सकते। मगर उन्होंने युद्ध विराम से साफ इनकार कर दिया है, इसीलिए वे अफगानिस्तान सरकार के सैन्य बलों को लगातार निशाने पर ले रहे हैं और आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इससे अफगानिस्तान की जनता में मायूसी है। इसके अलावा, तालिबान अफगानिस्तान की नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट को मानने के लिए भी तैयार नहीं हैं। उनका मत है कि यह सरकार अमेरिका की कठपुतली है और अफगानों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती। आलम यह है कि तालिबान और अफगानिस्तान की राजनीतिक शख्सियतों और सिविल सोसाइटी के लोगों के बीच मॉस्को (रूस) और दोहा (कतर) में हुई हालिया बातचीत में अफगानिस्तान सरकार के मंत्री बहैसियत मंत्री नहीं, बल्कि निजी हैसियत से शामिल हुए। यह बताता है कि अफगानिस्तान के मामले में अमेरिका किस कदर विफल हो चुका है और स्थानीय सरकार कितनी कमजोर है। फिलहाल अधिकांश पत्ते तालिबान के हाथ में ही हैं।

हालांकि तालिबान इससे भी वाकिफ हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अफगानिस्तान के गैर-पठान नस्लीय समूह उनके उसूलों से इत्तफाक नहीं रखते। 2004 में अफगानिस्तान में नया संविधान बना, जो उदार इस्लाम और पुरानी स्थानीय परंपराओं पर आधारित है। इस प्रगतिशील संविधान के तहत अफगानिस्तान में एक नई पीढ़ी सामने आई है, जिन्हें तालिबान के कट्टर विचार मान्य नहीं हैं। अब देखना यह है कि किस तरह तालिबान और अफगानिस्तान की अन्य राजनीतिक और सामाजिक शक्तियां आपस में सहयोग करके नई शासन प्रणाली पर सहमति बना पाती हैं।

रही बात भारत की, तो अफगानिस्तान के साथ हमारे सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं। नई दिल्ली चाहती है कि अफगानिस्तान एक प्रगतिशील देश बने, जो मध्य और दक्षिण एशिया के बीच पुल की तरह काम करे। इससे पूरे क्षेत्र को लाभ होगा। लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा अफगानिस्तान के जरिए भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। इस वक्त, जब अफगानिस्तान के हालात बदल रहे हैं और तालिबान किसी न किसी रूप में शासन में हिस्सेदार होंगे, तो भारत को मजबूती से अपने हितों की रक्षा करनी होगी। इसके लिए जरूरी है कि अफगान सरकार के साथ-साथ वहां की हर सियासी दल या गुट के साथ हम अपने संपर्क बनाए रखें। अभी तक भारत ने तालिबान से औपचारिक संपर्क नहीं साधे हैं। इसकी वजह है उनकी विचारधारा और पाकिस्तान के साथ उनका रिश्ता। लेकिन बदलते वक्त में कूटनीति का यही तकाजा है कि तालिबान के साथ बातचीत के द्वार भी खुले रहने चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि हमें उनके सिद्धांत कुबूल हैं या अफगान सरकार के साथ हम अपने रिश्ते कमजोर करेंगे। मगर पुराना सिद्धांत यही है कि राष्ट्रीय हित ही सिर्फ स्थाई होता है, दोस्त और दुश्मन तो बदलते रहते हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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