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25 मार्च, 2020|12:02|IST

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करुणा के साथ, षड्यंत्र से दूर

dr skanda shukla

यह भीड़ से पूरी दूरी बनाते हुए घरों के भीतर रहने का समय है। यह मुक्त बाजार के मोह से निकलने का समय है। इसे ही अंग्रेजी में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का नाम दिया गया है। विशेषज्ञ वर्तमान कोरोना-पैंडेमिक को रोकने की दो जरूरी युक्तियां सुझा रहे हैं। पहली है ‘सप्रेशन’, यानी उचित कदम उठाकर कोरोना विषाणु को फैलने से रोकना और दूसरी है ‘मिटिगेशन’, यानी पूरी तरह न रोक पाने की स्थिति में कम से कम कोरोना विषाणु के प्रसार को धीमा और कम कर पाना। इन दोनों ही युक्तियों में सर्वाधिक महत्व सोशल डिस्टेंसिंग (सामाजिक दूरी) का बताया गया है। सामाजिक कार्यक्रमों में न जाकर, उन्हें रोककर, हाथों को बार-बार साबुन-पानी से धोकर, चेहरे-आंखों-मुंह और नाक को न छूकर हम अपनी और अपनों की रक्षा कर सकते हैं। यह समय सभी मतभेद भुलाकर सामाजिक एकजुटता दिखाने का भी है। यह संघर्ष मानवता का है, और हमें अपने सभी मानवीय मूल्यों को जीवित रखते हुए लोगों की जान बचानी है।

हम एक ऐसे संधिकाल को जी रहे हैं, जिसके कारण समूची दुनिया में आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक ढांचों में अनेक बडे़ परिवर्तन होंगे। इनमें से अनेक बुनियादी भी हो सकते हैं। ऐसे में, हम-सबको सूझ-बूझ के साथ आने वाले समय के अनुसार स्वयं को ढालने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ हाल ही में अमेरिकी संघीय सरकार ने जो रिपोर्ट साझी की है, उसके अनुसार, कोरोना महामारी डेढ़ साल तक चल सकती है। हालांकि कुछ भी निश्चित तौर पर कहना मुश्किल है, किंतु कोविड-19 प्रसार की दुनिया भर में अनेक तरंगें उठ सकती हैं। भविष्यवाणियां अस्पष्ट हैं, फिर भी वे सतर्कता और समझदारी की मांग तो करती ही हैं। केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी हमें इस संक्रमण से खुद को यथासंभव बचाकर सुरक्षित रखना है।

यह सत्य है कि अधिकांश लोगों में कोविड-19 के लक्षण साधारण फ्लू की तरह ही होंगे, केवल लक्षणों के आधार पर इस रोग को फ्लू से अलग नहीं किया जा सकता। इसकी विशिष्ट जांच की आवश्यकता पडे़गी। लेकिन गंभीर रूप से संक्रमित रोगियों की आबादी भी बहुत बड़ी हो सकती है। भारत जैसे देश में, जहां उचित स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से ही सबको उपलब्ध नहीं हैं, वहां इस रोग की मार दोहरी पड़ेगी। सीमित संसाधनों वाले ऐसे देश में रोकथाम का महत्व उपचार से बहुत-बहुत बड़ा हो जाता है, विशेषकर तब, जब इस रोग के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा अब तक उपलब्ध हो न पाई हो।

संक्रामक रोगों का फैलाव अपने साथ अनिश्चितता, भय और घृणा का भी प्रसार करता है। समाज अपने ही वर्ग-विशेष या व्यक्ति-विशेष को बलि का बकरा चुन लेता है और उसे शाब्दिक-शारीरिक प्रताड़ना देने पर उतर आता है। मध्यकालीन यूरोप में ब्लैक डेथ (प्लेग महामारी) के समय यह अतिरेकी दुर्व्यवहार लोगों ने यहूदियों और कुष्ठ रोगियों के प्रति प्रदर्शित किया था। कोविड-19 महामारी के मौजूदा समय में उनका यह व्यवहार मंगोल नस्ल के लोगों के प्रति प्रदर्शित हो रहा है।

वुहान (चीन) से इस विषाणु ने फैलना आरंभ किया है, यह सत्य है। जंगली पशुओं के मांस के सेवन के कारण जूनोटिक विषाणु मनुष्य में प्रवेश पाकर फैलने लगा, इसके भी पर्याप्त प्रमाण हैं। लेकिन इंटरनेट पर कोरोना विषाणु से भी अधिक तेजी से फैलती षड्यंत्रकारी कटुता के कारण संसार के हरेक चीनी अथवा चीनी-सा दिखने वाले व्यक्ति के प्रति शाब्दिक व शारीरिक दुर्व्यवहार बढ़ता जा रहा है। षड्यंत्रकारी-सिद्धांतों का ध्येय भी यही होता है। वे समाधान नहीं बताते, वे रोकथाम की बात नहीं करते, बस बलि के लिए पशु की तलाश करते हैं या उन्हें दोष मढ़ने से ही सारी संतृप्ति मिल जाती है।

सिर्फ ‘कांसपिरेसी थ्योरी’ ही नहीं, आजकल सोशल मीडिया पर तरह-तरह के इलाज और दवाएं भी सुझाई जाने लगी हैं। इनसे समस्या तो दूर नहीं होगी, लेकिन खतरे बढ़ सकते हैं। अभी अनेक एंटीवायरल व अन्य दवाओं पर दुनिया भर के डॉक्टर शोध में लगे हैं, किंतु अभी तक कुछ भी पुख्ता तौर पर वर्तमान कोरोना-विषाणु को रोकने के लिए उपलब्ध नहीं है। अनेक दवाओं के इस्तेमाल से कुछ आरंभिक सफलता चाहे हाथ लगी हो, किंतु यह काफी नहीं है। टीका-निर्माण करने वाली कंपनियों को भी अभी लंबी दूरी तय करनी है। विशेषज्ञ साल भर से अधिक समय के बाद ही किसी ऐसी कोरोना-रोधी वैक्सीन के बाजार में उपलब्ध होने की उम्मीद बता रहे हैं।

जब ऐसे इलाज सुझाए जा रहे हों, तो उनसे दूर रहने के अलावा कई दूसरी सावधानियां भी बहुत जरूरी हैं। अगर अति-आवश्यक न हो, तो इस समय डॉक्टरों के क्लीनिक और अस्पतालों से दूरी बनाए रखें। यह चिकित्सा संबंधी सभी समस्याओं को आपातकालीन अथवा सामान्य में बांटकर देखने-समझने की घड़ी है। पहले जानें कि आपकी स्वास्थ्य समस्या ‘हाई रिस्क’ है अथवा ‘लो रिस्क।’ अगर आपकी स्वास्थ्य-समस्या आपातकालीन नहीं है, तो घर में ही रहना बेहतर है। किसी भी सामान्य जान पड़ती समस्या के लिए डॉक्टर से फोन या मेल पर संपर्क किया जा सकता है। यदि इस महामारी से पहले आपके डॉक्टर ने आपको किसी इलेक्टिव सर्जरी की सलाह दी थी, तो उसे भी टालना पड़ सकता है। इस संबंध में भी अपने डॉक्टर से संपर्क करेें। केवल जीवन रक्षक सर्जरी को तुरंत करना पड़ेगा। इस समय में अस्पतालों पर जितना भार कम रहेगा, उतना ही वे अपने संसाधनों को कोविड-19 संबंधी मुश्किल मरीजों और अन्य आपातकालीन रोगियों से लिए सुरक्षित रख सकेंगे, ताकि वहां इनकी जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सके।

आज हमें सामाजिक दूरी बनाते हुए सामाजिक सहृदयता का परिचय देना है। यह समस्या हम सभी की है, हम-सब मिलकर ही इसका मुकाबला कर सकते हैं। यह समय बुनियादी बन चुकी बड़ी आदतों में बदलाव का है, क्योंकि यह बदलाव ही हमारा बचाव बनेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 25th March 2020