Hindustan Opinion Column on 24th Oct 2019 - जब उन्हें भारत रत्न दिया जाएगा DA Image
17 नबम्बर, 2019|3:02|IST

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जब उन्हें भारत रत्न दिया जाएगा

गोपालकृष्ण गांधी पूर्व राज्यपाल

क्या विनायक दामोदर सावरकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा? बहुत संभव है, हां। हमारे समय की हर चीज इसी ओर संकेत कर रही है। क्या उन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए? आइए, यह सवाल हम गांधी अर्थात मोहनदास करमचंद गांधी के सामने ही रखते हैं। गांधी इस पर क्या कह सकते हैं? वह तो अब नहीं हैं, क्या वह अब भी हैं? हां, वह अब भी हैं, लेकिन अपने लिखित शब्दों के साथ। उनके बोल आज भी बहुत हद तक जिंदा हैं। और ये शब्द ठीक वैसे ही बोले जा रहे हैं, जैसे गांधी आज ही और अभी बोल रहे हों। उनके शब्द यह देखने में हमारी मदद करेंगे कि सावरकर को भारत रत्न देना अच्छा है या नहीं।

गांधी ने लगभग 100 साल पहले 26 मई, 1920 को यंग इंडिया  में लिखा था, उनका वह संक्षिप्त लेख उन राजनीतिक आरोपियों पर था, जिन्हें उस समय शाही क्षमादान का लाभ मिला था। हालांकि अंगरेजों के अनुग्रह का यह व्यवहार सभी के लिए नहीं था। गांधी ने दो ऐसे लोगों का मामला उठाया, जो कैद से छोडे़ नहीं गए थे- गणेश दामोदर सावरकर और उनके छोटे भाई विनायक दामोदर सावरकर। इसके लिए एर्क ंहसक क्रोध या उनके द्वारा हिंसक वारदात की आशंका को कारण बताया गया था।

गांधी को पता चल गया था कि वे दोनों भाई हैं। गांधी बहुत पहले 1909 में उनसे लंदन में मिले थे। गांधी का यह कहना था कि गणेश सावरकर ने कोई हिंसा नहीं की थी। गांधी ने जो लिखा है, उससे छोटे सावरकर की जीवनी संबंधी झांकी हमें मिल जाती है। गांधी ने जुलाई 1910 में मार्सिलेस की एक नाव से भगोड़े अपराधियों के अधिनियम के तहत भारत भेजे जाने के दौरान सावरकर के भागने के नाटकीय और साहसी प्रकरण पर प्रकाश डाला। गांधी ने 1920 में विनायक दामोदर सावरकर के बारे में जो वर्णन किया है, उसका एक अंश है, ‘भाई का जन्म 1884 में हुआ था और लंदन में अपने करियर के लिए उन्हें बेहतर जाना जाता है। पुलिस की हिरासत से बच निकलने की उनकी सनसनीखेज कोशिश और एक पोर्टहोल के जरिए फ्रांसीसी खाड़ी में कूदने के कारण अभी भी लोगों के दिमाग में उनकी याद ताजा है। उन्होंने फग्र्यूसन कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की, लंदन में पढ़ाई पूरी की और बैरिस्टर बन गए। वह 1857 के सिपाही विद्रोह के अवैध करार दिए गए इतिहास के लेखक हैं। उन पर 1910 में मुकदमा चलाया गया था और उन्हें 24 दिसंबर, 1910 को उनके भाई के समान ही सजा मिली। 1911 में उन पर हत्या का आरोप भी लगाया गया था। हालांकि उनके खिलाफ किसी भी तरह की हिंसक गतिविधि साबित नहीं हुई।’
 
इस लेख के उत्तराद्र्ध में गांधी अपनी सटीक समझदारी के साथ उल्लेख करते हैं, सावरकर बंधुओं ने बता दिया है कि वे किसी क्रांतिकारी विचार की सेवा नहीं करते हैं, अगर वे छूटेंगे, तो भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत ही काम करना चाहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी ने उनके सम्मान या उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाए हैं। यदि आज गृह मंत्रालय सावरकर को भारत रत्न देने के पक्ष में माहौल बनाना चाहता है, तो गांधी के उपरोक्त कथन के इस्तेमाल से बेहतर और कुछ हो नहीं सकता। उस कथन में सावरकर के जन्म के वर्ष से लेकर प्रत्येक मुख्य बिंदु का उल्लेख किया गया है, एक चर्चित घटना भी सुनाई गई है। लेखकीय विवरण पेश हैं, आचरण और चरित्र भी प्रमाणित है। 

जिस सावरकर का गांधी ने 1920 में बखान किया था, वह भारत रत्न प्राप्त उन अन्य विभूतियों से कतई कम योग्य नहीं, जिन्हें उनकी असाधारण सेवा, सर्वोच्च प्रदर्शन के अलावा अन्य कारणों से भारत रत्न मिला है। लेकिन मुझे यह भी कहना होगा कि एक और सावरकर भी हैं, जिन्हें भारत रत्न का तमगा देना कई सवाल पैदा करेगा। क्या वह गांधी हत्याकांड के आरोपी नहीं थे, जो सुबूतों के अभाव में बरी हो गए थे? नहीं, यह वह सावरकर नहीं हैं। बरी होना तो बरी होना ही होता है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी खुद सावरकर को अदालत से बरी करने की बुद्धिमत्ता या निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाते। साक्ष्य कानून में न्याय का अभिन्न अंग है, एक अमूल्य और अपूरणीय सिद्धांत। तो आइए, हम सावरकर के बरी होने पर सवाल न करें। हमें विश्वास है कि जब एक अदालत ने पाया कि सावरकर का महात्मा गांधी की हत्या से कोई लेना-देना नहीं था, तब उनका वास्तव में इससे कोई लेना-देना नहीं था, इस पर शक का औचित्य नहीं है।

लेकिन हमें एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य पर संदेह नहीं करना चाहिए। यह एक असंगत संदेह है कि वह उन लोगों के लिए एक प्रेरणा थे, जो यह सोचते हैं कि हत्यारों ने जो किया, सही किया। जो बहुमत के अधिकार के प्रबल होने में विश्वास करते हैं। यह चर्चा हमें एक बड़े प्रति-ऐतिहासिक, विडंबनापूर्ण सत्य की ओर ले जाती है। यदि सावरकर को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जाता है, तो इससे महात्मा गांधी कमतर नहीं होंगे। इसके उलट मानवता की वेदी पर उनकी शहादत और चमक जाएगी, दुनिया भर में और मजबूत हो जाएगी। यह एक सुसज्जित राष्ट्रवादी और एक पदकहीन मानवतावादी के बीच का विरोधाभास है। इससे उन लोगों को अप्रत्याशित प्रतिशोध मिलेगा, जिन्होंने घृणा-मुक्त, सत्य से भय-मुक्त प्रेम, अथाह क्षमाशीलता वाले गांधी की विरासत को हंसी के साथ, बुरा-भला कहा है। अभिषेक के समय तालियां बजेंगी, किसी ऊंची जगह पर, एक हाथ सम्मान करने के लिए आगे बढ़ेगा और नए भारत रत्न के कंधे पर विराम लेगा, और बेआवाज बात होगी, ‘हम सच्चाई जानते हैं, तुम और मैं, क्या हम नहीं जानते?’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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