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ट्रंप के कश्मीर राग का राज

Shashank

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ मुलाकात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर का जिक्र यूं ही नहीं किया। वह इससे कई निशाने साधना चाहते हैं। ऊपरी तौर पर यही लगता है कि पाकिस्तान को खुश करने के लिए यह कहा गया है। मगर इसका निहितार्थ अमेरिकी चुनाव से जुड़ा है। अगले साल अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए वोट डाले जाएंगे। लिहाजा डोनाल्ड ट्रंप किसी भी तरह अपना वोट बैंक बचाने की जुगत में हैं। वोटरों को लुभाने के लिए ही वह शांति की बात करने लगे हैं और इस कोशिश में हैं कि संघर्ष वाले क्षेत्रों, खासकर अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला सकें या बुलाने का गंभीर प्रयास करते हुए दिखें।

इसी वजह से अफगानिस्तान में अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जलमे खालिजाद ने पिछले दिनों पाकिस्तान की तारीफ की थी। उनका कहना था कि तालिबान के साथ शांति-वार्ता में पाकिस्तान की मदद काफी काम आ रही है। इससे यही माना जाएगा कि पाकिस्तान को लेकर अमेरिका का नजरिया अब बदल चुका है। भले ही कभी राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान पर आतंकवाद के मसले पर अमेरिका को ‘बेवकूफ बनाने’ और ‘झूठ बोलने’ का आरोप लगाया हो, पर आज वही पाकिस्तान उनका करीबी बन चुका है। हालांकि यह अमेरिका की फितरत रही है कि अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर  वह रिश्ते बनाता और खत्म करता है। इस समय करीब 14,000 अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में मौजूद हैं और उनके रख-रखाव पर सालाना लगभग 36 अरब डॉलर रकम अमेरिका खर्च कर रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप यही बोझ कम करना चाहते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति की इस मंशा को इमरान खान ने बखूबी पढ़ लिया है, और वह इसी का लाभ उठाकर पाकिस्तान की सेहत सुधारना चाहते हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दिनोंदिन बिगड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी उसे मदद देने को तैयार नहीं दिख रही थीं। मगर पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कुछ शर्तों के साथ उसे छह अरब डॉलर कर्ज देने को तैयार हो गया। माना जा रहा है कि यह अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो सका। इसी तरह, पाकिस्तान में मानवाधिकारों  के उल्लंघन के मामलों को भी वाशिंगटन ने नजरंदाज करना शुरू कर दिया है। जुलाई की शुरुआत में ‘बलूच लिबरेशन आर्मी’ को आतंकी संगठनों में शामिल करने का उसका फैसला इसी अनदेखी की अगली कड़ी है। अमेरिका तो अब पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने पर भी विचार करने लगा है।

लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका का यह बदला रुख क्या वाकई उसके हित में है? क्या ट्रंप और इमरान खान की सोमवार की मुलाकात सफल मानी जाएगी; वह भी तब, जब अमेरिका कई मसलों पर पाकिस्तान के साथ चलने को तैयार दिख रहा है? मेरा मानना है कि यह सब कुछ अफगास्तिान के भविष्य से तय होगा। अगर तालिबान के साथ ‘शांति-वार्ता’ विफल हो जाती है, तो इमरान खान की ये सारी कवायदें व्यर्थ कहलाएंगी। फिर, जैसे-तैसे अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने और तालिबान के हाथों में अफगानिस्तान को सौंपने से दुनिया भर में यही संदेश जाएगा कि अमेरिका भागकर काबुल से निकल रहा है। ट्रंप निश्चित ही इससे बचना चाहेंगे। अगर यह शांति-वार्ता सफल होती है और अमेरिकी सैनिक सफलतापूर्वक अफगानिस्तान से निकल जाते हैं, तो डोनाल्ड ट्रंप और इमरान की यह आमने-सामने की पहली मुलाकात काफी महत्वपूर्ण मानी जाएगी। और तब ‘स्थिर अफगास्तिान’ को लेकर भारत के तमाम प्रयासों को भी खारिज करने की कोशिशें तेज होंगी।

नई दिल्ली को इसी संदर्भ में अपनी तैयारी रखनी होगी। कश्मीर का राग छेड़कर डोनाल्ड ट्रंप यह बताना चाहते हैं कि वह अपने तईं पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन इससे भी शायद ही कोई इनकार करेगा कि कश्मीर को लेकर हमारा रुख शुरू से स्पष्ट रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं, पहले भी भारतीय नेतृत्व इसे लेकर एकमत रहा कि पाकिस्तान के साथ सभी मसलों को निपटारा द्विपक्षीय बातचीत से ही होगा। शिमला समझौते का भी यही संदेश है, जिस पर हस्ताक्षर करके पाकिस्तान ने अपनी सहमति दी थी। अमेरिका भले ही इस खुमारी में हो कि तालिबान के साथ शांति-वार्ता के गति पकड़ने और आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई से वह उप-महाद्वीप में शांति लाने की ओर बढ़ चला है, लेकिन असलियत में ऐसा कुछ नहीं दिखता। पिछले दिनों अफगानिस्तान में हुए बम धमाके में पाकिस्तानी एजेंसियों के शामिल होने की बात अफगान सरकार कह चुकी है। यह विडंबना ही है कि शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान व तालिबान तो शामिल हैं, पर अफगान सरकार इससे बाहर है। रही बात हाफिज सईद पर कार्रवाई करने की, तो पहले भी इस आतंकी को गिरफ्तार और ‘बाइज्जत’ रिहा किया जा चुका है। अब तो यह दहशतगर्द पाकिस्तान का वजीर-ए-आजम बनने का सपना देखने लगा है।

संभव है कि आने वाले दिनों में हाफिज सईद को लेकर भी अमेरिका का रुख बदल जाए। लिहाजा भारत को बदले माहौल के अनुरूप अपनी तैयारी रखनी होगी। रूस जैसे देशों को अपने भरोसे में तो रखना ही होगा, एशिया उप-महाद्वीप के उन तमाम देशों के साथ भी अपने रिश्तों को नई दिशा देनी होगी, जिनके पाकिस्तान के साथ मतभेद हैं। अच्छी बात है कि आतंकवाद के मसले पर सभी देश भारत के साथ हैं। कई देशों ने यह माना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत द्वारा साझा की गई सूचनाएं उनके काम आईं। इस बात से अमेरिका भी इत्तफाक रखता है। मगर उसकी प्राथमिकता बदल गई है, इसलिए उसके सुर भी बदल गए हैं। भारत को भी अपने हितों के साथ कोई समझौता किए बिना आगे बढ़ना चाहिए। अमेरिका के साथ कूटनीतिक रिश्ते बेशक आगे बढ़ते रहें, लेकिन उन देशों को साथ लेकर भी हमें अपनी नीतियां बनानी होंगी, जो आतंकवाद (खासतौर पर पाकिस्तान की जमीन पर पलने वाले आतंकी संगठनों) के खिलाफ लड़ाई में हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 24th July