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छछिया भर छाछ पर नाचते गोपाल

हमारे कृष्ण नीर और क्षीर, दोनों से समान रूप से जुड़ते हैं। कृष्ण का एक मनोहारी बिंब सभी को अपनी ओर आकृष्ट करता है। पीपल के पत्ते पर लेटा शिशु कृष्ण अपने दाहिने पैर के अंगूठे को मुंह में डाले चूस रहे हैं। कृष्ण विष्णु के अवतार माने जाते हैं और मान्यता है कि विष्णु के पग के अंगूठे से गंगा निकली है। ब्रह्म का द्रव रूप गंगा। बाल कृष्ण अपने उसी अंगूठे को मुंह में लगाए मानो गंगा के अमृत का आस्वाद ले रहे हैं। हमारे दो अवतारी महापुरुष भारतीय मन के चिर नायक हैं- एक, राम और दूसरे, कृष्ण। एक राम जो मर्यादा के ऐसे प्रतिमान, जिनके पीछे-पीछे चलने का मन होता है, पर कृष्ण इतने रूपों वाले मनमोहन, छलिया, माखनचोर, रसिया और भी न जाने कितने स्वरूप कि उन्हें प्यार किए बिना रहा नहीं जा सकता।

वही कृष्ण, जो विष्णु रूप में क्षीर सागर यानी दूध के सागर में निवास करते हैं, जब कृष्ण रूप में धरती पर अवतरित होते हैं, तो छछिया भर छाछ के लिए गोपियों के इशारे पर नाचते हैं- ताहि अहीर की छोहरिया, छछिया भर छाछ पे नाच नचावैं।  मन रीझ उठता है कृष्ण के इस रूप पर और सहज स्वीकार लेता है- एक हुतो सो गयो स्याम संग, को आराधे ईस। विष्णु विस्मृत हो जाते हैं, परंब्रह्म ओझल हो जाते हैं, और बस कृष्ण का यह मनोहारी रूप हृदय में बस जाता है। यही कारण है कि युद्धभूमि में गीता  का उपदेश देते कृष्ण का स्वरूप हमें बहुत आकृष्ट नहीं करता, या द्वारका में रहते हुए उनका जीवन हमें नहीं लुभाता। हमें तो लुभाता है उनका ब्रज के साथ ब्रजेश्वर रूप, जहां ब्रजेश्वरी राधा का प्रेम उनके साथ दमकता है। उनका वह बाल रूप, जहां तीनों लोकों के स्वामी यशोदा के सामने दूध पीने की हठ ठाने ठुनक रहे हैं- आगे नन्दरानी के तनिक पय पीवे काज।/ तीनि लोक ठाकुर सो ठुनुकत ठाढ़ो है।

भारतीय साहित्य और संगीत का एक बहुत बड़ा भाग कृष्ण और राधा के प्रेम से ही निर्मित होता है। गो, गोरस और गोमय से लेकर नदियों, वृक्षों और पहाड़ों तक से जुड़ते हैं कृष्ण। गोवर्धनधारी कृष्ण, यमुना के किनारे कदंब की डाली पर बैठ बंशी बजाते कृष्ण केवल अपने समय की ही राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार नहीं करते, अपितु हर युग की नकारात्मक विभीषिकाओं के संहार के लिए प्रेरणा बन उपस्थित होते हैं। उन प्रतीकों को डीकोड करने की आवश्यकता है। अर्थ संदर्भ सहित खुलते जाएंगे और तब राम, कृष्ण सिर्फ मिथकीय या पौराणिक चरित्र नहीं, आधुनिक युग के भी सर्वमान्य नायक के रूप में प्रतिष्ठापित हो जाएंगे। ऐसा चरित्र, जो विश्व साहित्य में ढूंढ़ने से न मिले। एक उदाहरण देखें- काशी में रामलीला के साथ कृष्ण की बाललीला नाग-नथैया का उत्सव भी गंगा की बीच धारा में मनाए जाने की कई सौ वर्ष पुरानी परंपरा है। कृष्ण बना कोई बालक गंगा में कूदता है और कुछ क्षणों में ही एक कृत्रिम सहस्र फण वाले कालिया नाग के सिर पर खड़े होकर बांसुरी बजाते हुए जल के ऊपर प्रगट होता है। हजारों की संख्या में लीलाप्रेमी इस दृश्य को अपनी आंखों में बसाते हैं और जयकारा गूंजता है- हर-हर महादेव।  प्रसन्नता में हर-हर महादेव का नारा लगाना काशी के स्वभाव में है।

कृष्ण कालिया के फण पर नाचें या रामलीला में राम शिव का धनुष तोड़ें, हर अवसर पर हर-हर महादेव! कृष्ण का कूदना और कालिया नाग को नाथकर उसके फण पर नाचना एक प्रतीकात्मक बिंब है। नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए महापुरुषों द्वारा आगे आने की हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। प्रतिवर्ष उस परंपरा को उत्सव रूप में दोहराकर हम अपने दायित्व से विरत न होने का भाव हृदय में भरते हैं। कृष्ण यमुना के साथ जुड़ते हैं। वास्तव में कृष्ण सबसे पहले पर्यावरण वैज्ञानिक हैं, जो नदियों के प्रदूषण को दूर करने के लिए कटिबद्ध होते हैं। यमुना का जल इतना प्रदूषित हो गया था कि उसका रंग काला पड़ गया था। कालिया नाग के सहस्र फण का बिंब यमुना में गिरने वाले अनेक छोटे-बड़े विषाक्त नालों से तात्पर्य रखता है। ये नाले सर्पाकार होते हैं और नदी में जहां गिरते हैं, वहां दह यानी गड्ढा बन जाता है। वही काली दह था, जहां का प्रदूषित जल पीते ही कृष्ण के सखा गोप मू्च्छिछत हो जाते हैं। कृष्ण तुरंत संकल्प लेते हैं कालिया नाग को नाथने का और फिर वह यमुना में कूद पड़ते हैं।

कूद पड़ना एक मुहावरा भी है। यानी किसी कार्य को संपन्न करने के लिए आगे आना। किसी पशु या जंतु को अपने वश में करने के लिए उसे नाथ दिया जाता है, ताकि जिधर चाहे, उसे मोड़ा जा सके। कृष्ण सर्पाकार नालों का मुंह नाथकर यमुना से मोड़कर बाहर कर देते हैं, यमुना को प्रदूषण से मुक्त कर देते हैं। आज यमुना सहित तमाम नदियों को कृष्ण की आवश्यकता है, क्योंकि जब हम किसी एक वृक्ष, एक नदी या पहाड़ का अस्तित्व समाप्त कर रहे होते हैं, तो उससे जुुड़ी न जाने कितनी कथाओं, मान्यताओं, विश्वासों और परंपराओं को समाप्त कर रहे होते हैं और इस प्रकार उससे जुड़ी संस्कृति को भी नष्ट कर देते हैं। इसलिए प्राचीन काल से नदियां, वृक्ष, पहाड़ और पूरी प्रकृति ही हमारी प्रार्थना का विषय बनी और उस पूरी प्रकृति से जुड़कर उसका संरक्षण करने वाले कृष्ण हमारे प्रियतम।

भारत का सनातन धर्म मूर्ति पूजक बाद में बना, पर वैदिक काल से ही वह प्रकृति पूजक था। वृक्ष देवता थे, सागर और पहाड़ देवता थे, नदियां देवियां थीं, सूर्य, चंद्र, तारे, वायु, अग्नि, पृथ्वी, जल, सभी देवत्व से भरे थे, आराध्य थे, ईश्वर थे। इसलिए नीत्शे ने जब ईश्वर के मर जाने की बात की और देखा-देखी दुनिया के बहुत से वाम पंथों ने ईश्वर के अस्तित्व को खारिज करना शुरू किया, तब भी सनातन भारतीय धर्म में ईश्वर समाप्त नहीं हुआ, क्योंकि वह तो पूरी प्रकृति, पूरी सृष्टि में व्याप्त है। इसलिए हमारा ईश्वर हमेशा अस्तित्वमान रहा, सत्-चित् आनंद स्वरूप सगुण कृष्ण भी बना रहा। हमारा ईश्वर समाप्त नहीं हो सकता। वह हमेशा है। प्रकृति रूप में और उस प्रकृति में व्याप्त संरक्षक और नियंता के रूप में भी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 24th August