Hindustan Opinion Column on 23rd November - एक स्मारक अनाम लोगों का भी हो DA Image
5 दिसंबर, 2019|10:57|IST

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एक स्मारक अनाम लोगों का भी हो

रामचंद्र गुहा प्रसिद्ध इतिहासकार

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मेरे हमउम्र भारतीयों के मन में कई यादें ताजा हो आईं, लेकिन उनमें सारी खुशगवार नहीं थीं। मुझे भी उन यादों ने घेर लिया, जब हिंसा और खून-खराबे के मंजर से मेरा सामना हुआ था। यह सामना नवंबर 1989 में भागलपुर और उसके आसपास के इलाकों में आज से ठीक 30 साल पहले हुआ था। इस विवाद के इतिहासकारों ने दर्ज किया है कि सितंबर-अक्तूबर 1990 में रथयात्रा के दौरान कैसी हिंसा हुई थी।

इस रथयात्रा के एक साल पहले ही मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हो चुका था। एक धर्मस्थल गिराने और दूसरा बनाने की तैयारी विश्व हिंदू परिषद (विहिप) द्वारा सितंबर 1989 में राम शिला पूजन के साथ ही शुरू हो गई थी। विहिप ने शिला पूजन उत्सव का आयोजन पूरे देश के शहरों और गांवों में किया था। देश भर में जगह-जगह रखी गई ईंटों को एक केंद्रीय भंडारगृह में भेजा जाना था, ताकि जिस किसी दिन अयोध्या में मंदिर निर्माण हो, उनमें इनका उपयोग हो सके। 


ईंट या शिला पूजन उत्सवों के माध्यम से आशा की गई थी कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग हर जगह मंदिर निर्माण कार्यक्रम से अपना जुड़ाव महसूस कर सकेंगे। लेकिन देश में भगवान राम के ऐसे भक्त भी थे, जो अपने धार्मिक या राजनीतिक विचारधारा की वजह से इस कार्यक्रम के पक्षधर नहीं थे। ये लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि जिस जगह एक अन्य धर्मस्थल पहले से मौजूद है, वहां कोई मंदिर कैसे बनेगा। 


खैर, इन शिला पूजन कार्यक्रमों ने बहुत जल्दी ही विचारों का धु्रवीकरण कर दिया। अक्तूबर 1989 में बिहार के भागलपुर शहर में भीषण दंगा भड़क उठा। शिला पूजन और शिया मुसलमानों के त्योहार मुहर्रम के बीच ठन गई। दोनों के जुलूस में शामिल लोग सड़कों पर जा भिड़े, पहले लफ्जों से और फिर पत्थरों-तलवारों से। 


भागलपुर का दंगा जिंदा यादों में सबसे खराब हिंदू-मुस्लिम टकराव है। वास्तव में, 1947 के बंटवारे के समय हुई हिंसा के बाद सबसे खराब। हजार से अधिक लोग मारे गए। दंगे भड़कने के कुछ समय बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षाविदों के एक समूह ने भागलपुर में तथ्य-खोज मिशन पर जाने का फैसला किया। उन्होंने मुझे शामिल होने के लिए कहा, मैं तैयार हो गया। 


अब मुझे भागलपुर गए 30 साल हो चुके हैं। तब मैंने जो देखा था, उसे दर्ज नहीं किया था, लेकिन फिर भी कुछ यादें साथ रह गईं। बुनकरों का एक गांव था, जहां करीब आधे घर आगजनी की भेंट चढ़ गए थे, सभी हथकरघे जल गए थे। चूंकि बिहार पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, इसलिए गांव की रक्षा के लिए सेना को तैनात किया गया था। गांव से ज्यादातर लोग भाग गए थे और कुछ लोग बचे-खुचे सामान समेटने में लगे थे। 


उसके एक वर्ष बाद रथयात्रा निकली और दो वर्ष बाद बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था। नतीजनत, अयोध्या से मुंबई तक हिंसा फैल गई थी। बाबरी ध्वंस के कुछ सप्ताह बाद मैं नई दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए निकले एक शांति मार्च में शामिल हुआ था। मेरे साथ समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन भी चल रहे थे। इस शांति मार्च का नेतृत्व दो बौद्ध भिक्षु कर रहे थे, जो विशेष मंत्रों के साथ-साथ मंगल ध्वनि पैदा कर रहे थे। उस मार्च में कोई पोस्टर या नारा शामिल नहीं किया गया था। हम जैसे ही पहले विश्व युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के स्मारक इंडिया गेट पर पहुंचे, शिव विश्वनाथन ने मुझसे कहा, ‘हमें अब जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है अनाम लोगों का एक स्मारक।’


इंडिया गेट पर शहीद हुए सैनिकों के नाम खुदे हैं। ऐसे ही स्मारक यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी हैं। इसके बावजूद जब प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए अनेक लोगों के नाम अज्ञात रह गए, तब उन्हें सम्मानित करने के लिए अज्ञात सैनिकों को समर्पित एक स्मारक की स्थापना हुई। इस स्मारक का उद्घाटन 1921 में वॉशिंगटन डीसी के करीब अर्लिंगटन में किया गया। इसके जरिए बिना नाम लिए उन सब लोगों को याद करने की कोशिश की गई, जो पहले विश्व युद्ध में मारे गए थे। 


इसी कड़ी में शिव विश्वनाथन कह रहे थे कि भारतीय गणराज्य को भी अनाम लोगों के नाम एक स्मारक बनाने की जरूरत है। जैसे मजबूर सैनिक अपने राजनीतिक आकाओं के लालच और साजिश की वजह से युद्ध में मारे जाते हैं, उसी तरह से सांप्रदायिक फसादों के बीच फंसकर अनेक निर्दोष नागरिक भी मारे जाते हैं।

साल 1989 में भागलपुर से लेकर 2002 में गुजरात दंगे तक, ऐसे हजारों भारतीय मारे गए हैं, जिनका अयोध्या के संपत्ति विवाद से कोई लेना-देना नहीं था। भारत या विश्व के इतिहास में दूर-दूर तक कोई भी अन्य ‘टाइटल सूट’ इंसानी जिंदगी और रोजी-रोटी के लिए इतना त्रासद नहीं रहा होगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया हजार से ज्यादा पृष्ठों का फैसला इतिहास और  पुरातत्व की गहराई में उतरता है, लेकिन इस विवाद से जुड़े अपेक्षाकृत हालिया दंगों की शृंखला के ऊपर से निकल जाता है। 


हालांकि माननीय न्यायमूर्ति कई बार ‘न्याय, विवेक और समानता’ की अनिवार्यता का उल्लेख करते हैं, लेकिन मैं इस फैसले को ज्यादा पढे़-लिखे अन्य विद्वानों पर छोड़ता हूं कि क्या यह फैसला अनिवार्यता के पहले पद (न्याय) और तीसरे पद (समानता) की तस्दीक करता है? यहां, मुझे अपना ध्यान दूसरे पद (विवेक) पर केंद्रित करने दीजिए। गणतंत्र की अंतरात्मा हमें उन हजारों मर्दों, औरतों और बच्चों की स्मृति व सम्मान के लिए बाध्य करती है, जिनका इस भूमि विवाद से कोई नाता नहीं था, लेकिन वे हिंसा के शिकार हो गए। अब हम उनके लिए क्या कर सकते हैं? शायद शिव विश्वनाथन के उस सुझाव को साकार करके हम एक बेहतर काम कर सकते हैं, जिसकी पेशकश उन्होंने चौथाई सदी पहले की थी। 


अयोध्या में हिंदुओं को भव्य मंदिर खड़ा करने दीजिए, मुसलमानों को अयोध्या या उसके बाहर शानदार मस्जिद बना लेने दीजिए, लेकिन आज इन धार्मिक इमारतों से अलग न्याय और मानवता की बड़ी जरूरत तो अनाम लोगों को समर्पित एक स्मारक है। काश, सर्वोच्च न्यायालय ने भलमनसाहत में इसकी भी तामीर का फरमान सुना दिया होता। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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