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ऑपरेशन कमल की वापसी के बाद

एस श्रीनिवासन

कर्नाटक विधानसभा पिछले कई महीनों से लगातार खबरों में बनी हुई है। सदन के भीतर जहां यह अभूतपूर्व दृश्यों से रूबरू हो रही है, तो वहीं विधानसभा के बाहर लगातार अप्रिय घटनाक्रमों को अंजाम दिया जा रहा है। विधायकों की खरीद-फरोख्त के लिए भारी भरकम रकम लेने-देने की बातें रोजाना फिजां में तैर रही हैं। एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं कि वह फौरन हस्तक्षेप करे, तो दूसरी तरफ राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष एक टकराव की तरफ बढ़ते दिखने लगे। इन सबके बीच कोई भी पक्ष उस आम नागरिक के बारे में नहीं सोच रहा, जिसकी रोजमर्रा की जिंदगी सुशासन से लगभग वंचित हो चुकी है।

राज्य में राजनीति ही अभी सबसे बड़ा मसला है। खंडित जनादेश के कारण यह राजनीति काफी विकृत हो गई है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होकर भी बहुमत से दूर रह गई थी, तो दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए अंतिम समय में जनता दल(सेकुलर) के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। लेकिन शुरुआती उत्साह के शांत होते ही सबको यह स्थिति अरुचिकर लगने लगी। भाजपा के बीएस येदियुरप्पा इससे सबसे ज्यादा नाखुश रहे, क्योंकि उन्हें लगता रहा कि सत्ता की ट्रॉफी उनके हाथ से छीन ली गई है, तो वहीं चुनाव में कुरसी गंवाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया व उनके विधायकों को लगता रहा कि उनकी संख्या ज्यादा है, इसलिए उन्हें ही मुख्यमंत्री की भूमिका में होना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि कुमारस्वामी के समर्थक भी नाराज रहे, क्योंकि उनको लगता रहा कि उनके नेता पार्टी के वफादारों का ख्याल रखने की बजाय सिर्फ अपने खानदान को आगे बढ़ाने में व्यस्त हैं।

हालांकि कांग्रेस-जनता दल (सेकुलर) गठबंधन को विधानसभा में पर्याप्त बहुमत हासिल था, पर जैसे ही दोनों दलों के नेताओं ने एक-दूसरे पर निशाना साधना शुरू किया, इसकी संवेदनशीलता भी उजागर होने लगी। जो भाजपा 2018 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से कुछ दूर रह जाने की अपनी चोट को सहला रही थी, उसने संसदीय चुनावों में शानदार कामयाबी के साथ अपनी ऊर्जा फिर से हासिल कर ली। परिणामस्वरूप, बीएस येदियुरप्पा कीसुस्त चालों में एक नई रवानी लौट आई और कई बार नाकाम हो चुके ऑपरेशन ‘कमल’ को फिर से शुरू किया गया। इस दफा अतिरिक्त सावधानी भी बरती गई। भाजपा नेता सार्वजनिक रूप से बयान देते रहे कि वे सत्ता के लिए कतई लालायित नहीं हैं, ताकि जनता में यह संदेश जाए कि संभावित घटनाक्रमों से पार्टी का कोई लेना-देना नहीं। दूसरी तरफ, विरोधी विधायकों को पाले में लाने का ‘ऑपरेशन कमल’ अपने काम में जुटा रहा।

जब कांग्रेस व जनता दल (सेकुलर) के विधायकों ने अपनी-अपनी पार्टी छोड़नी शुरू की, तब यही लगा कि सिद्धरमैया और कुमारस्वामी की पुरानी प्रतिद्वंद्विता अब खुलकर सामने आ रही है। भाजपा और उसके साथी मीडिया माध्यमों ने इन अटकलों को बढ़ावा दिया कि बागी विधायक दरअसल नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं और यदि कुमारस्वामी की जगह सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो उन्हें खुशी होगी। लेकिन यह कपोल-कथा टिक न सकी और बिल्ली थैले से उछलकर फौरन बाहर आ गई, जब बागी विधायक मुंबई पहुंचे और वहां की भाजपा सरकार ने उन्हें पूरा-पूरा संरक्षण मुहैया कराया। यही नहीं, येदियुरप्पा के सहयोगी को एक चार्टेड विमान में बागी विधायकों की अगवानी करते हुए बाकायदे कैमरे पर देखा गया।

चूंकि बागी विधायकों की संख्या करीब 20 तक पहुंच गई है, ऐसे में यह साफ था कि कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ गई है और इसका जाना तय है। लेकिन कुमारस्वामी और सिद्धरमैया ने चुपचाप समर्पण करने की बजाय आखिर तक संघर्ष करने का फैसला किया। विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने भी इसमें अपनी एक भूमिका तलाश ली। इन तीनों ने सांविधानिक औचित्य के सवाल को उठाने का फैसला किया।

कर्नाटक के घटनाक्रमों ने कई अहम वैधानिक सवाल खड़े किए हैं। 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद एक फैसला दिया था। विद्वान न्यायाधीशों ने व्यवस्था दी थी कि विधानसभाध्यक्ष को विश्वास मत के लिए कोई समय-सीमा नहीं दी जा सकती। अदालत ने इसे स्पीकर का विशेषाधिकार माना था। जब बागी विधायकों ने शिकायत की कि उन्हें ‘धमकियां’ मिल रही हैं, तो कोर्ट ने किसी किस्म की जबर्दस्ती के खिलाफ फैसला देते हुए कहा कि बागी विधायकों को सदन की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए ‘बाध्य’ नहीं किया जा सकता।

दलबदल विरोधी कानून की 10वीं अनुसूची के तहत विधायक दल के दो-तिहाई सदस्यों की टूट ही वैध है, अन्यथा व्हिप का उल्लंघन करने वाले विधायक अयोग्य करार दिए जा सकते हैं। इसी मुद्दे पर सिद्धरमैया ने सुप्रीम कोर्ट से दिशा-निर्देश मांगा है। स्पीकर ने बागियों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। अब वह या तो इन विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करेंगे या फिर विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य करार देंगे। अयोग्य करार देने का मतलब है कि बागी विधायक इस विधानसभा के कार्यकाल तक न मंत्री बन सकेंगे और न ही कोई सरकारी पद ले सकेंगे। उन्हें दोबारा चुनाव जीतकर आना पड़ेगा।

इस बीच भाजपा विधायकों की मांग पर राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष को एक तय सीमा के अंदर विश्वास मत की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दे दिया। इस तरह के उनके दो निर्देश को स्पीकर ने नजरअंदाज कर दिया था। ऐसे में, एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा हुआ है कि क्या राज्यपाल ऐसा कोई निर्देश दे सकता है, जब विधानसभा विश्वास मत पर बहस शुरू कर चुकी हो?

ऐसा लगता है कि कांग्रेस-जद(सेकुलर) गठबंधन ने तय कर रखा था कि इस मौके का फायदा उठाया जाए और विधायकों की खरीद-फरोख्त को उजागर किया जाए। बागी विधायकों का समर्थन पाने के लिए धन के कथित इस्तेमाल की जो बातें पहले दबी-छिपी हो रही थीं, वे अब विधानसभा के भीतर गूंज रही हैं। 20 विधायकों की बगावत के बाद विधानसभा में अंकगणित भले भाजपा के पक्ष में आ गया हो, लेकिन ऐसी नैतिकता शून्य राजनीति एक दिन उसे भी भारी पड़ सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 23rd July