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पानी के बहाव का आपदा बन जाना

बहते पानी में अगर थोड़ी देर खड़ा रहना पड़ जाए, तो पैरों के नीचे से जमीन खिसकने लगती है, और जब जमीन सिर्फ रेत की बनी हो, तो पानी में संभलना बहुत मुश्किल हो जाता है। जमीन खिसकने का यह मुहावरा ऐसे ही किसी बाढ़ वाले क्षेत्र में ईजाद हुआ होगा। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बिहार में 12 जिले बाढ़ से त्रस्त हैं, 921 ग्राम पंचायतों में एक फुट से छह फुट तक पानी भरा ही नहीं है, बल्कि वह तेज धारा के साथ बह भी रहा है। 55 लाख से ज्यादा लोग बाढ़ की चपेट में हैं और दर्जनों बदनसीब  लोगों की जान जा चुकी है।

सरकार ने बचाव और राहत-कार्य शुरू कर दिए हैं। नेपाल में हाई-डैम बनाने की वार्ता के संकेत भी दिए गए हैं। साथ ही निकट भविष्य में नदियों के तटबंधों की लंबाई बढ़ाने का वादा भी कर दिया गया है। ये सब काम अमूमन अगस्त महीने के अंत या सितंबर में होते हैं, लेकिन इस साल जुलाई के पहले पखवाड़े में ही करने पड़े, क्योंकि राज्य एक सप्ताह पहले तक भयंकर सूखा झेल रहा था, मगर जुलाई के पहले सप्ताहांत से जो वर्षा शुरू हुई, वह बहुत तेजी से दूसरे सप्ताह के मध्य में बाढ़ में बदल गई।

ऐसा प्राय: हर साल होता है, इसलिए जनता आवाज उठाती है कि बाढ़ की समस्या का स्थाई समाधान होना चाहिए, पर व्यवस्था इसका कोई दीर्घकालिक समाधान खोज ही नहीं पाती। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के बुजुर्ग पहले की बाढ़ को ढाई दिन की बाढ़ बताते थे। बस पानी आता था और चला जाता था। बाढ़ का पानी जानवरों को बांधने वाले खूंटे को देखकर डरता था। गांव के सबसे बाहरी घर के खूंटे से ही वापस चला जाता था। नदी की बाढ़ का उत्सव मनाकर स्वागत होता था। स्त्री-पुरुष नावों में बैठकर गाते-बजाते निकल जाते थे। लेकिन अब पानी ढाई दिन की जगह ढाई महीने रहता है और खेती को चौपट करता है। यही नहीं, अब शहरों में भी बाढ़ आने लगी है, जो पहले केवल गांवों तक सीमित रहती थी। अब तो शहर को बचाने के लिए भी गांव की कुर्बानी ली जाती है।

पहले पानी आता था और चला जाता था, तो इसका सीधा मतलब है कि पानी के रास्ते में कोई रुकावट नहीं थी। विकास के नाम पर तटबंध, सड़क, नहरें बनाकर और रेल लाइन आदि बिछाकर हमने जो सुविधाएं बढ़ाई हैं, बस उनसे होकर पानी की निकासी का इंतजाम करने में ही सारी बचत कर ली और उसी का परिणाम अब सामने आ रहा है। शायद ही किसी राज्य में पानी की निकासी का कोई सम्यक अध्ययन हुआ हो, जिसके आधार पर कोई कार्रवाई हुई हो। सन् 1903 से लेकर अब तक कई सिंचाई आयोग या बाढ़ आयोग देश व राज्य स्तर पर गठित हुए, लेकिन जल-निकासी को वह महत्व कभी नहीं मिला, जो उसे मिलना चाहिए।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल राज्य के चीफ इंजीनियर डब्ल्यू ए इंग्लिश ने अवकाश ग्रहण करने के बाद सीमित बाढ़ नियंत्रण का प्रस्ताव किया था, जिसमें तटबंधों में पानी की निकासी के लिए स्पिलवे (बांध के ऊपर से नियंत्रित पानी छोड़ने) जैसी संरचनाएं निर्धारित दूरी पर बनाने की बात कही गई थी। इसमें नदी का पानी एक सीमा तक बढ़ने के बाद तटबंधों के ऊपर से निकल जाने का प्रावधान था। इससे बाढ़ का प्रकोप खत्म तो नहीं होता, मगर कम जरूर होता। उनका विचार था कि नदियों की छाड़न, यानी मृत धाराओं का उपयोग इस पानी को बहाने में किया जाए। ऐसा करने से नदी का पानी तटबंधों के आस-पास तो फैलता, मगर उसका प्रकोप बहुत घट जाता। कुछ इसी तरह की बात बिहार के एक पूर्व इंजीनियर इन चीफ भी कहते हैं। दुर्भाग्यवश उन्होंने भी यह बात अवकाश प्राप्त करने के बाद ही कही। इस विकल्प के साथ यह जरूरी था कि एक व्यापक शिक्षण कार्यक्रम जनता के बीच चलाया जाता कि बाढ़ को एकदम समाप्त कर देना समाज और कृषि के हक में ठीक नहीं है। बाढ़ तो आनी ही चाहिए।

बाढ़ का बने रहना जरूरी है। इसकी हिमायत बिहार के 1930-40 के दशक में रहे चीफ इंजीनियर कैप्टन हाल भी करते थे। तटबंधों के धुर विरोधी कैप्टन हाल कहते थे कि गाद से भरपूर नदियों पर तटबंध बनाकर हम अपनी भावी पीढ़ी पर ऐसा कर्ज लादेंगे, जिसका भुगतान उन्हें अपने ऊपर विपत्ति ओढ़कर करना पड़ेगा। मगर  इनमें से किसी की बात सरकारों ने नहीं सुनी। अब हम विपत्ति भोगने के लिए अभिशप्त हैं, क्योंकि हमारे समाज में ऐसे भी राजनीतिक दृष्टि से ताकतवर लोग थे, जिन्होंने बाढ़ से पूरी सुरक्षा की गारंटी लेकर बाढ़ पीड़ितों का मन मोह लिया था।

अभी बाढ़ का मौसम समाप्त नहीं हुआ है। अभी सिर्फ शुरुआत है। बिहार की 1987 की बाढ़ में 26 जिले, 359 प्रखंड,  23,852 गांव और 2.82 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे, जिनमें से 1,373 लोग मारे गए थे। 47 लाख हेक्टेयर जमीन पर बाढ़ का पानी फैला था और 16.82 लाख घर गिरे थे। उस तरह की बाढ़ का अगर आज मुकाबला करना पड़ जाए, तो हमारे बाढ़ सुरक्षा तंत्र का क्या होगा? साल 2007 की बाढ़ में बिहार में 22 जिले प्रभावित हुए थे। 18,832  पंचायतें, 24,442 गांव, 2.44 करोड़ लोग बाढ़ के पानी में फंसे थे। 7.84 लाख घर गिरे और 1,287 लोग मारे गए। इस बार 34 स्थानों पर तटबंध दरके व नहरें टूटीं और 54 जगहों पर नेशनल और स्टेट हाई-वे टूटीं। 829 स्थानों पर ग्रामीण सड़कें भी टूट गईं। हमारी समझ है कि इतनी जगहों से बाढ़ का पानी अपने निकलने का रास्ता खोज रहा था और जब उसे रास्ता नहीं मिला, तो वह इन्हेें तोड़कर आगे बढ़ गया। इन स्थानों पर पानी की निकासी के लिए पुल, कलवर्ट या उसी तरह की संरचनाएं बनाने की जरूरत थी, लेकिन हमने उसे पहले से ज्यादा मजबूती से बांध दिया। अब पानी है, तो कहीं न कहीं जाएगा ही। रास्ता नहीं मिलेगा, तो बाधाएं तोड़कर जाएगा। किसी की समझ में यह बात आती है क्या?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 22nd July