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बेबसी की जमीन पर खड़ा पाकिस्तान

कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक को पाकिस्तान भले ही अपनी जीत बता रहा है, लेकिन यह उसे भी अच्छी तरह पता है कि उसकी जमीन कितनी खोखली है। उसके सामने अब ज्यादा विकल्प नहीं हैं। अव्वल तो इस तरह की बैठकों में सदस्य देश हालात पर सिर्फ बातचीत करते हैं। इसमें न तो वे कोई फैसला लेते हैं, और न ही मतदान जैसी कोई प्रक्रिया अपनाते हैं। फिर, पाकिस्तान की घरेलू स्थिति भी ऐसी नहीं है कि वह अपने तईं कुछ करने की सोच सके।
दरअसल, पाकिस्तान अब बेबस हो चुका है। जम्मू-कश्मीर की हैसियत बदलने संबंधी भारत के फैसले के खिलाफ उसके पास तीन प्रमुख विकल्प थे।

पहला, आतंकवाद का बढ़ावा देना, जिसकी ओर उसने इशारा भी किया है। मगर ऐसी कोई भी कार्रवाई या घाटी में अलगाववादियों को उकसाने का कोई भी काम खुद उसी पर भारी पड़ सकता है, क्योंकि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का दबाव उसके हाथ बांध रहा है। यही वजह है कि जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठन भी अभी शांत दिख रहे हैं, जबकि इन संगठनों के आका इसके पहले खुलकर भारत-विरोधी तकरीरें देते रहे हैं।

दूसरा विकल्प, फौजी कार्रवाई का था, लेकिन इस पर भी पाकिस्तान आगे नहीं बढ़ सकता। अगर वह अभी किसी जंग में उलझा, तो पहले ही आर्थिक दुश्चक्र में फंसा यह मुल्क और बदहाल हो जाएगा। पाकिस्तान की आर्थिक हालत दयनीय है और डॉलर के मुकाबले उसका रुपया 160 को भी पार कर गया है। पिछले दस साल में पाकिस्तान का कर्ज छह हजार अरब से बढ़कर 30 हजार अरब रुपये तक पहुंच गया है, और जो रकम टैक्स के रूप में वसूली जाती है, उससे कर्ज की किस्तें भी पूरी तरह चुकाई नहीं जा सकतीं।

कुल मिलाकर, उसकी उम्मीद कूटनीतिक कदमों पर ही टिकी थी। मगर इस मोर्चे पर भी उसे कोई खास सफलता नहीं मिल सकी है। यहां तक कि इस्लामी राष्ट्र तक खुलकर इस मसले पर उसके साथ नहीं खडे़ हुए। सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक में भी पांच स्थाई सदस्य देशों में से दो (चीन और ब्रिटेन) उसके साथ आए, जबकि तीन अन्य (फ्रांस, रूस और अमेरिका) ने भारत का समर्थन किया।

ऐसे में, यह उचित मौका है कि भारत उस पर पर्याप्त दबाव बढ़ाए। लेकिन कदम सोच-समझकर ही हमें उठाने होंगे। सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक के बाद उन सभी की खुशफहमी दूर हो गई होगी या हो जानी चाहिए, जो आज भी चीन से दोस्ती केतराने गाते हैं। चीन इस मसले को लेकर संयुक्त राष्ट्र तक बेशक चला गया, जबकि सच यही है कि कश्मीर की सांविधानिक स्थिति बदलने से भारत-चीन सीमा पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। फिर जम्मू-कश्मीर जब सूबा था, तब भी भारत ही चीन से बातचीत कर रहा था और नई परिस्थिति में भी वही करेगा। यानी भारत-चीन द्विपक्षीय मसलों पर इस बदलाव का कोई असर नहीं पड़ने वाला। मगर चीन ने जान-बूझकर इसे मुद्दा बनाना चाहा और पाकिस्तान की मदद की। इससे उसकी नीयत पूरी तरह से जाहिर हो गई है। कुछ यही हालत ब्रिटेन की भी है, जो बार-बार हमारी पीठ में खंजर घोपने का काम करता है।

भारत को यह सोचना होगा कि जो देश बार-बार उसके हितों से खेलता है, उसके साथ अच्छे रिश्तों की हिमायत क्यों की जाती है? क्या अब भी चीन को लेकर हमें पुरानी नीति पर चलना चाहिए? हम चीन से जुड़े संवेदनशील मसलों पर पूरा ख्याल रखते हैं, लेकिन चीन शायद ही इतना उदार है। दुनिया भर के तमाम देशों के साथ चीन की बढ़ती नाराजगी में हमने हमेशा तटस्थ रुख अपनाया है। ऐसे में, क्या यह सही मौका नहीं है कि हम भी खुलकर ऐसे मसलों पर चीन का मुखर विरोध करें। हमें यह तो सोचना ही होगा कि आखिर कब तक हम चीन को जवाब नहीं देंगे?

एक रास्ता यह भी है कि कश्मीर से जुड़े अलग नैरेटिव हम वैश्विक मंचों पर पेश करें। इस नैरेटिव में यह बताया जाए कि कश्मीर के हालात क्या हैं और वहां किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। उसमें यह भी स्पष्ट किया जाए कि घाटी में उपद्रवियों को शांत करने के लिए ही कठोर कदम उठाए गए हैं। अभी दुनिया के ज्यादातर देश पाकिस्तान का समर्थन नहीं कर रहे हैं, मगर इसका यह अर्थ भी नहीं है कि वे भारत के साथ खड़े हैं। उनका समर्थन जुटाने के प्रयास हमें करने होंगे, जिसमें अब तक हम विफल रहे हैं। वैसे, यह काम ज्यादा मुश्किल भरा नहीं है, क्योंकि कई देश तो इसलिए भी भारत का साथ नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि उनके हित किसी न किसी तरीके से हमसे जुड़े हैं। इस काम में हमें अप्रवासी भारतीयों को भी अपने साथ जोड़ना चाहिए। यह देखा जा रहा है कि विदेशों में पाकिस्तान मूल के लोग इस मसले पर कहीं ज्यादा मुखर हैं, जबकि तादाद, हैसियत और पूंजी आदि के मामले में भारतीय मूल के लोगों से वे काफी पीछे हैं। अप्रवासी भारतीयों को भी वैश्विक समूहों में पाकिस्तान के खिलाफ मुखर होकर आगे आना होगा।

यह सब कुछ दो बातों पर निर्भर करेगा। पहली, कश्मीर का आंतरिक तनाव हम किस तरह खत्म करते हैं और दूसरी बात यह कि दुनिया भर के देशों को हम किस तरह इस मसले से जोड़ते हैं। जब तक हम सख्त रुख नहीं अपनाएंगे, हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकेंगे। ऐसा ही एक तरीका हो सकता है- कुछ मामलों में कड़ा रुख अपनाना। खासतौर से ब्रिटेन जैसे उन देशों के खिलाफ हमें कुछ कदम उठाने चाहिए, जो विश्व मंच पर हमारे विरोध में खडे़ दिखते हैं। हमारी दिक्कत यह है कि हम एक तरफ इन देशों पर दबाव बढ़ाने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ हमारे राजनेता और नौकरशाह अपने बच्चों के लिए इन देशों से वीजा हासिल करने का तवक्को रखते हैं। जब तक हम अपना यह रवैया नहीं बदलते, तब तक इन देशों को अपने पाले में नहीं कर सकते। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 21st August