Hindustan Opinion Column on 16 September - उनकी उम्मीदें बदल रही हैं राजनीति DA Image

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उनकी उम्मीदें बदल रही हैं राजनीति

बदलते समाज, फैलते हुए बाजार, सुलभ तकनीक, स्मार्टफोन की उपलब्धता, इनका असर समाज के सभी, खासकर निचले तबकों और जातियों में देखा जा सकता है। इनसे लोगों की चाहतों के निर्माण का मानसिक आधार तो बन ही रहा है, इसमें सरकार की कई योजनाएं भी अपनी भूमिका निभा रही हैं। उज्ज्वला योजना के तहत गैस के चूल्हे वाली रसोई, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान के पहले दौर के बाद जिन्हें ये सुविधाएं अभी तक नहीं मिली हैं, उनमें भी इसे हासिल करने की चाहत पैदा हो चुकी है। अच्छा घर, सुविधापूर्ण जीवन, बेहतर कमाई की चाह अति पिछडे़ और अब तक मौन व अदृृश्य से दिखने वाले अति उपेक्षित दलित समुदायों के सपनों का हिस्सा बन गई है। इससे एक नए प्रकार के मानस का निर्माण हो रहा है। यह नई मानसिकता जातीय अस्मिता की राजनीति से मोहभंग का सूचक भी है। 

 पहले यह माना जाता था कि अपनी जाति-बिरादरी का व्यक्ति यदि शासन में आएगा, तो अपनी समस्याएं दूर हो जाएंगी। वह उन समूहों के लिए कुछ करेगा, जिसमें वह पैदा हुआ है। लेकिन पिछले 30-40 वर्षों में अति दलित और अति पिछड़ों के एक बड़े भाग ने यह महसूस किया कि ऐसा हुआ नहीं। उनकी ही जाति या सामाजिक वर्ग से आए नेतृत्व ने उनकी कठिनाइयों को समाप्त करने के लिए कुछ नहीं किया। जनतांत्रिक राज्य की सुविधाएं और अवसर उनके पास ही सीमित होकर रह गए, जो सत्ता, शासन, समाज व वोट की राजनीति में प्रभावी थे। इस अनुभव ने जातीय अस्मिता की राजनीति को कमजोर किया है। इसका परिणाम हमें 2014 और फिर 2019 के संसदीय चुनावों में देखने को मिल चुका है। जाति और सामाजिक अस्मिता की राजनीति करने वाले दो दल- समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी -साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद दलितों-पिछड़ों का व्यापक समर्थन नहीं प्राप्त कर सके। उन्होंने शायद यह समझने की भूल की कि दलित और पिछड़ों में नव-आकांक्षी समूह का विस्तार हो रहा है, जो जाति के पार जाकर सुविधाओं और जनतांत्रिक हिस्सेदारी को प्राप्त करने के लिए उनके साथ भी जुड़ सकता है, जो उनकी जाति-बिरादरी के न होने के बावजूद उनमें उम्मीद पैदा कर रहे हैं। यह नव-आकांक्षी चाह दलितों और अति पिछड़ों में अन्य विकसित सामाजिक समूहों की तरह बढ़ने के साथ ही उनसे सामाजिक स्तर पर जुड़ने की चाहत भी पैदा करती है। 

जातीय अस्मिता की राजनीति एक तरफ जाति की गोलबंदी बनाती है, लेकिन दूसरी ओर सामाजिक विलगाव भी बढ़ाती है। वहीं महत्वाकांक्षी समूह की राजनीति उनमें अन्य की तरह होकर अन्य से जुड़ने की चाह पैदा करती है। यह आकांक्षा बाजार और तकनीक, दोनों से बन रही है। ऐसा नहीं है कि जातीय अस्मिता की राजनीति का अब भविष्य नहीं बचा। अगर इन सामाजिक समूहों का नई आकांक्षाओं से मोहभंग होता है, तो वे फिर जातीय अस्मिता की राजनीति की ओर लौट सकते हैं।

दलित समाज में दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन हिंदुत्व की राजनीति से उनके बढ़ते जुड़ाव के रूप में हो रहा है। दलितों और अति पिछड़े सामाजिक समूहों के एक भाग में अन्य हिंदू जातियों की तरह ही धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन प्राप्त करने की चाह बढ़ रही है। हिंदू कर्मकांड, देव-देवियां और हिंदुत्ववादी अस्मिता प्राप्त करने की आकांक्षा उनमें भी विकसित हो रही है। मुख्यधारा के हिंदुओं की तरह दिखने और एसर्ट करने की चाह एक नई तरह की आकांक्षा है, जिसे गांवों में दलित सामाजिक समूहों के एक हिस्से में विकसित होते देखा जा सकता है। राज्य द्वारा पैदा की गई नई आकांक्षाओं व हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पैदा की गई जातीय अस्मिता से आगे जाकर हिंदुत्ववादी अस्मिता से मिलने की चाह कई बार एक-दूसरे से मिलती हुई दिखती हैं। इन दोनों का मूल है- बाकी लोगों की तरह होने और उनमें समाहित होने की चाह। 

कांशीराम बहुजन आंदोलन के निर्माण के दिनों में दलित समूहों से सतत संवाद करते थे, मायावती के समय उसका कम होते जाना दलितों में एक ऐसा शून्य बनाता है, जिसके कारण उनकी राजनीतिक गोलबंदी की दिशा बदलती जा रही है। भाजपा द्वारा गैर-जाटव दलितों की गोलबंदी की योजनाबद्ध कोशिश, कोटा के भीतर कोटा जैसी नीति को लागू करने की प्रतिबद्धता का प्रदर्शन, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के संगठनों द्वारा अति दलित समूहों के बीच चलाए जाने वाले सेवा अभियानों, जैसे उनकी बस्तियों में स्वच्छता कार्यक्रम चलाने, स्कूल, स्वास्थ्य कैंप लगाने जैसे प्रयासों से भी दलितों का एक भाग हिंदुत्व की राजनीति से प्रभावित होता दिख रहा है।

दलित समूहों के पढ़े-लिखे तबके में बसपा से मोहभंग के कारण दलितों में एक नई राजनीति के विकास की आकांक्षा बढ़ रही है। दलित युवाओं में चंद्रशेखर के प्रति बढ़ रहा आकर्षण बसपा से उनके रिश्तों के कमजोर होते जाने का संकेत है। गैर-जाटव दलितों की राजनीतिक गोलबंदी के लिए बसपा के प्रयासों में कमी एक ऐसा शून्य बनाती है, जिससे भारतीय जनता पार्टी को उनके बीच अपना पैर जमाने की जगह देती है।

आज दलितों की आकांक्षाओं में उथल-पुथल देखी जा सकती है। आज का दलित आज से 30 वर्ष पहले का दलित नहीं रहा। इस बीच उसमें अनेक नई हसरतें पैदा हुई हैं। इस उथल-पुथल से या तो बहुजन समाज पार्टी अपने कायाकल्प करने की प्रेरणा ले सकती है या चंद्रशेखर जैसा नया नेतृत्व उभर सकता है। यह भी हो सकता है, और इसकी संभावना ज्यादा दिख रही है कि दलितों का जो समूह अभी विकास की नव-आकांक्षा और हिंदुत्व से प्रभावित हो रहा है, देश में विशेषकर हिंदी पट्टी में लंबे समय के लिए भाजपा की राजनीति का सामाजिक आधार बन जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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