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चीन-पाकिस्तान गठजोड़ का तोड़

विवेक काटजू, पूर्व राजदूत

भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर की चीन की आधिकारिक यात्रा तय तो पहले से थी, लेकिन यह संपन्न उस वक्त हुई है, जब भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में उठाए गए नए सांविधानिक कदम पर दुनिया भर की नजर है। जयशंकर से पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी आनन-फानन में चीन का दौरा कर चुके थे। वह इसी मकसद से बीजिंग गए थे कि चीन के नेतृत्व से भारत की शिकायत कर सकें और उससे मुफीद सहयोग ले सकें, क्योंकि एक-दो इस्लामी देशों को छोड़कर पाकिस्तान की राजनयिक पहल पर किसी राष्ट्र ने संजीदगी नहीं दिखाई है।

जयशंकर और कुरैशी की यात्राओं के अलग-अलग मकसद, मुद्दे और परिणाम भारत, पाकिस्तान और चीन की वैश्विक स्थिति बताते हैं। चीन खुद को अब एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में देखता है और यह मानता है कि उसकी तुलना केवल अमेरिका से ही हो सकती है। वह भारत को बेशक खुद से कमतर समझता है, लेकिन वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती हैसियत को नजरंदाज भी नहीं कर पाता। वह जानता है कि दक्षिण एशिया में ही नहीं, हिंद-प्रशांत क्षेत्र, पश्चिम एशिया और दुनिया के अन्य तमाम हिस्सों में भारत ने एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है।

जयशंकर की इस यात्रा का मूल उद्देश्य था, भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों और विश्व की बदलती सामरिक व राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करना और अक्तूबर में होने वाली चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की तैयारी को रूप देना। इस यात्रा के दौरान एस जयशंकर ने चीन के नेतृत्व को बताया कि भारत और चीन के संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति तो हुई है, मगर सीमा पर शांति बनाए रखना बहुत ही जरूरी है। वास्तव में, डोकाला विवाद के बाद चीन बखूबी जानता है कि आज का भारत सन् 1962 के भारत के बहुत भिन्न है। ऐसे में, वह भले सीमा पर दबाव बनाने की कोशिश करे, लेकिन उसे भी मालूम है कि भारतीय सेना उसके इरादों को नाकाम करने की पूरी क्षमता रखती है।

जयशंकर ने अपनी इस यात्रा में यह साफ किया कि चीन के साथ भारत आर्थिक व व्यापारिक संबंध बढ़ाना तो चाहता है, लेकिन उसे अपने हितों की रक्षा भी करनी होगी। इसके उलट, चीन ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है, जिससे भारत को वास्तविक संतोष हो सके। भारत ने हमेशा चीन से यही कहा है कि दोनों देशों के रिश्ते तभी मजबूत हो सकेंगे, जब दोनों देश एक-दूसरे के हितों को समझेंगे और ऐसा कोई कदम उठाने से बचेंगे, जिससे द्विपक्षीय हितों को कोई नुकसान पहुंचे।

मगर चीन ने न सिर्फ इस मशवरे की अनदेखी की, बल्कि भारत को यह सलाह भी दी कि वह अपने पड़ोस में ऐसा कोई कदम न उठाए, जिससे अन्य देशों के हितों को नुकसान पहुंचे या उनकी भावनाएं चोटिल हों। बीते सोमवार को ही चीन के एक प्रमुख समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स  ने, जिसे चीन सरकार का मुखपत्र भी कहा जाता है, अपने संपादकीय में लिखा कि एक राष्ट्रवादी भारत का कोई भविष्य नहीं है। एशिया का आम भू-राजनीतिक स्वरूप ऐसे भारत को कतई स्वीकार नहीं करेगा। वह मैत्रीपूर्ण प्रमुख शक्ति बने, तभी भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा।

साफ है, यह भारत के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी है। भारत का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्वरूप कैसा होगा, यह तय करने का अधिकार भारत की जनता को है। भारत की जनता ने हमेशा राष्ट्रवादी सरकार को चुना है, लेकिन राष्ट्रवाद की तुलना आक्रामकता से करना गलत है। अगर भारत अपने हितों की रक्षा करता है और उनको प्रोत्साहित करता है, तो इससे किसी दूसरे देश को भला कैसे नुकसान होगा? चीन की मंशा भारत को एक ‘पैसिव’ राष्ट्र, यानी अपेक्षाकृत कम सक्रिय देश बनाने की है, जबकि वह खुद न सिर्फ तेज कदमों से आगे बढ़ रहा है, बल्कि अपने पड़ोसी या उप-महाद्वीप के अन्य देशों के हितों को भी नजरंदाज कर रहा है। चीन तो अंतरराष्ट्रीय कानूनों को भी मानने से इनकार करता है, जिसका ज्वलंत उदाहरण दक्षिण चीन सागर का सत्य है।

जयशंकर की यात्रा के दौरान चीन ने भारत द्वारा किए गए सांविधानिक बदलाव का जिक्र किया, जो हमें हैरत में नहीं डालता। ऐसा इसलिए, क्योंकि हमें नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर विवाद का एक साझीदार चीन भी है। मार्च, 1963 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की कुछ जमीन चीन को सौंप दी थी, हालांकि असलियत में वह भारत का ही हिस्सा है। संसद के अपने वक्तव्य में गृह मंत्री अमित शाह ने साफ किया कि पाक अधिकृत कश्मीर के साथ-साथ अक्साई चिन (चीन के अधीन हिस्सा) को भी भारत अपनी भूमि मानता है। इसी तरह, लद्दाख की हैसियत में बदलाव का जब चीन ने विरोध किया, तो विदेश मंत्री ने साफ-साफ कहा कि यह भारत का अंदरूनी मामला है और इससे सीमा विवाद पर कोई असर नहीं पड़ता। जयशंकर ने यह भी साफ किया कि भारत सीमा विवाद को शांतिपूर्वक सुलझाना चाहता है।

बहरहाल, महज इस एक यात्रा से यह उम्मीद करना कि पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में चीन बदलाव लाएगा, हमारी नादानी होगी। चीन के लिए पाकिस्तान का सामरिक महत्व है। इसीलिए आने वाले वर्षों में चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के खिलाफ हमें मजबूती से तैयार रहना होगा। कूटनीतिक तौर पर भले ही पाकिस्तान की ज्यादा मदद चीन नहीं कर पाए, लेकिन वह पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक शक्ति बढ़ाने में सहायता जरूर करेगा। अब हमें इसी लिहाज से अपनी विदेश नीति गढ़नी चाहिए और अपने हितों की रक्षा के लिए हर मुमकिन कदम उठाने चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 14th August