Hindustan Opinion Column on 13th November - अयोध्या से अभी दूर दक्षिण DA Image
15 दिसंबर, 2019|4:36|IST

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अयोध्या से अभी दूर दक्षिण

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सर्वसम्मति से आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के राजनीतिक फलितार्थ क्या होंगे, इसके बारे में तरह-तरह के विश्लेषण पेश किए गए। एक वैचारिक स्कूल का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी इस विवाद का पहले ही इतना दोहन कर चुकी थी कि वह अब इसे और भुना नहीं सकती थी। दूसरी विचारधारा का मत है कि संघ परिवार के आक्रामक लोगों को अब आगे किया जाएगा और बनारस स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि के बारे में भी इसी तरह के कदम उठाए जाने की मांग की जाएगी।


भारतीय समाज गहरे रूप से धार्मिक है और इसकी तमाम विशेषताओं पर आस्था कहीं ज्यादा वजनदार है। यह एक निर्विवाद सच है कि राजनीतिक वर्गों ने वोटों के लिए आस्था का इस्तेमाल किया है। राम जन्मभूमि आंदोलन में यही हुआ है। भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे का उपयोग कर सत्ता में पहुंच गई। अपने पालमपुर प्रस्ताव में उसने बाकायदा राम जन्मभूमि को शामिल किया था। वैसे तो राम जन्मभूमि आंदोलन की एक देशव्यापी धार्मिक अपील थी, लेकिन इसके राजनीतिक परिणामों के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती।

इसके राजनीतिक प्रभाव से तमिलनाडु बिल्कुल अछूता रहा, और इस बात ने यकीनन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के दिग्गजों को चौंकाया होगा। वे इस स्थिति से पार पाने के लिए लगातार प्रयास करते रहे हैं।  


दिल्ली में बैठे राजनीतिक विश्लेषक अब यह संकेत दे रहे हैं कि अयोध्या फैसले के बाद भगवा संगठन नए सिरे से तमिलनाडु में अपनी कोशिशों को धार देंगे। केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक एक ट्रस्ट गठित करके मंदिर-निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाना है, लेकिन भाजपा मंदिर निर्माण के कार्यक्रमों के अनुरूप अपनी चुनावी योजनाएं भी बनाएगी। जाहिर है, मकसद ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक फायदा उठाने का होगा। इस लिहाज से तमिलनाडु कहां ठहरता है?


कुछ पुराने अनुभवी लोग याद दिलाते हैं कि 1990 के दशक के उत्तराद्र्र्ध में तमिलनाडु के लोगों ने भी विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के राम मंदिर अभियान में काफी जोशो-खरोश से भाग लिया था। उन्होंने मंदिर बनाने के लिए बढ़-चढ़कर दान भी दिया था और अपने गांवों से इसके लिए ईंटें भी भेजी थीं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब जयललिता सत्ता में थीं और भाजपा के प्रति उनका झुकाव था। फिर भी वह उत्साह भगवा पार्टी के लिए वोटों में तब्दील नहीं हो सका। सवाल यह है कि तमिलनाडु में राम के प्रति आकर्षण कितना बड़ा है?

भगवान विष्णु के प्रति समर्पित वैष्णव धारा और भगवान शिव से जुड़ी शैव धारा पूरे भारत में दिखती हैं। कुछ लोगों का दावा है कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण में शैव मत का प्रभाव अधिक रहा है। तमिलनाडु को सर्वाधिक हिंदू मंदिरों का प्रदेश कहा जा सकता है, जिनमें दोनों मत-संप्रदायों के मंदिरों का अनुपात लगभग बराबर है।

लेकिन यहां थोड़ी-सी सांस्कृतिक भिन्नता है। यहां भगवान शिव के दोनों पुत्रों- गणेश और मुरुगन (उत्तर भारत में जिन्हें कार्तिकेय के रूप में जाना जाता है) की व्यापक रूप से पूजा होती है। मुरुगन की पूजा तमिल भाषा और संस्कृति से गहरे रूप से जुड़ी है। मुरुगन मंदिरों के अलावा तमिलनाडु में अम्मा मंदिरों की संख्या भी अच्छी-खासी है और ये देवी पार्वती और देवी काली से संबंधित हैं। तमिलनाडु के मुकाबले उत्तर में मुरुगन के मंदिर बहुत ही कम हैं। 


दक्षिण में राम को समर्पित कुछ खास मंदिर हैं, जैसे रामेश्वरम का मंदिर। दक्षिण में कहा जाता है कि लंका विजय के बाद जब राम लौटे, तो उन्होंने तमिलनाडु में कई जगहों पर प्रायश्चित किए थे, क्योंकि रावण के रूप में एक ब्राह्मण की भी हत्या हुई थी। श्रीरंगम और कुंबकोणम में अनेक वैष्णव मत के मंदिर हैं। इनसे जुड़ी अनेक मिथकीय कहानियां भी इन स्थलों के इर्द-गिर्द फैली हैं। उत्तर के हिंदुत्व के विचारकों के लिए यह वाकई एक पहेली रही है कि गहरी धार्मिक आस्था के इन केंद्रों को वे वोट बैंक में बदल पाने में क्यों नाकाम रहे।

इसकी एक मजबूत वजह तो द्रविड़ आंदोलन है। बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण पहलू यह है कि समृद्ध सभ्यता वाले इतिहास के कारण यहां की आस्था परंपरा सदियों में विकसित हुई है। यहां के लोग गहरे आस्थावान हैं, मगर वे सांप्रदायिक नहीं। इसीलिए यहां पर धु्रवीकरण की कोशिशें ज्यादातर नाकाम हुईं। 


अयोध्या ट्रस्ट के गठन के मामले में कहा जा रहा है कि कानून मंत्रालय आंध्र के तिरुपति मॉडल पर गौर कर रहा है। तिरुपति तिरुमला देवस्थानम यानी टीटीडी एक स्वतंत्र ट्रस्ट है, जो इस मंदिर की व्यवस्था का संचालन करता है। माना जाता है कि यह देश का, बल्कि दुनिया का सबसे धनी मंदिर ट्रस्ट है। यद्यपि यह एक स्वायत्त ट्रस्ट है, मगर इसके प्रमुख के पद पर राजनीतिक नियुक्ति ही होती है और संचालन संबंधी विभाग का मुखिया तो अक्सर कोई न कोई आईएएस होता है। यूं तो टीटीडी को भी कई विवादों का सामना करना पड़ा, मगर इसे श्रेष्ठ संचालन-व्यवस्था का श्रेय भी दिया जाता है।


बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी सुपरस्टार रजनीकांत को अपने पाले में लाकर तमिलनाडु में पांव जमाने को लेकर जीतोड़ कोशिश करती रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि राज्य में उसके पास कोई करिश्माई चेहरा नहीं है। भाजपा चाहेगी कि साल 2020 के विधानसभा चुनाव में रजनीकांत उसकी नुमाइंदगी करें। केंद्र सरकार ने गोवा इंंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में रजनीकांत को ‘स्पेशल ऑइकन ऑफ गोल्डन जुबली अवॉर्ड’ से सम्मानित करने की घोषणा की है।

रजनीकांत ने इसके लिए केंद्र सरकार का शुक्रिया तो किया, मगर साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया है कि भगवा रंग में रंगे जाने की किसी भी कोशिश का वह विरोध करेंगे। नब्बे के दशक की एक फिल्म पादयप्पा में अपने उत्पीड़क का मजाक उड़ाते हुए रजनीकांत जोरदार डायलॉग मारते हैं, ‘मैं अपना रास्ता खुद चुनता हूं।’ यदि अपनी राजनीतिक यात्रा में भी वह ऐसा ही करें, तो आश्चर्य होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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