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दुश्वारियों में तानाशाह बनते इमरान

सुशांत सरीन सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन

पाकिस्तान की सेहत दिन-ब-दिन बिगड़ रही है। इमरान सरकार के एक साल पूरे होने वाले हैं, मगर उनकी हुकूमत लोकतांत्रिक आचरण की बजाय फासीवादी रवैये के कारण चर्चा में है। बेशक पाकिस्तानी सत्ता का यही चरित्र रहा है, मगर जिस तरह की राजनीतिक असहिष्णुता और अलोकतांत्रिक व्यवहार का प्रदर्शन सत्तारूढ़ ‘पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ’ कर रही है, उससे सैन्य तानाशाहों का दौर भी बेमानी हो चला है। विपक्षी नेताओं पर हर मुमकिन शिकंजा कसा जा रहा है, उनके मीडिया कवरेज रोके जा रहे हैं, फर्जी मामलों में उन्हें जेल भेजा रहा है, और उनकी संसद सदस्यता रद्द करने की कोशिश हो रही है। दरअसल, हुकूमत की कमान संभालने वालों का निकम्मापन और मुल्क की आर्थिक-कूटनीतिक दुश्वारियां पाकिस्तान पर भारी पड़ रही हैं। मगर प्रधानमंत्री इमरान खान विरोध की आवाज दबाकर समस्या का हल तलाश रहे हैं। वह 11 खिलाड़ियों की क्रिकेट टीम की कप्तानी और 21-22 करोड़ लोगों के मुल्क की कमान संभालने में कोई फर्क नहीं कर पा रहे।
विपक्ष के दमन के तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। तर्क दिया जा रहा है कि मीडिया को उस शख्स का बयान नहीं दिखाना चाहिए, जो आरोपी हो। इस महीने पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) की नेता मरियम नवाज का इंटरव्यू प्रसारित होने के चंद मिनटों के अंदर ही रोक दिया गया।

हद तो तब हो गई, जब मरियम नवाज की ‘लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस’ के दौरान सभी खबरिया चैनलों का प्रसारण पूरी तरह से रोक दिया गया। उस दौरान स्क्रीन पर सिर्फ यही सूचना दिख रही थी- यह चैनल इस समय उपलब्ध नहीं है, रुकावट के लिए खेद है। ऐसा करते हुए हुकूमत यह भूल गई कि लोकतंत्र में जब तक दोष साबित नहीं होता, तब तक आरोपी निर्दोष माना जाता है और उसकी अभिव्यक्ति का पूरा सम्मान किया जाता है। यह हाल चैनलों का ही नहीं, अखबारों और न्यू मीडिया का भी है। फेसबुक, ट्विटर जैसे तमाम मंचों पर जिन सामग्रियों को प्रतिबंधित करने की मांग पाकिस्तान की तरफ से हो रही है, वे सभी राजनीति से प्रेरित हैं। सत्ता से टकराने वाले पत्रकारों के सोशल मीडिया हैंडल बंद कराने का दबाव बनाया जा रहा है। यह दबाव मीडिया प्रतिष्ठान के प्रमुखों पर भी बनाया जा रहा है और सरकार की बात न मानने पर उनके विज्ञापन रोके जा रहे हैं। प्रशासनिक व न्यायिक ढांचों को भी बख्शा नहीं जा रहा। जजों को डराया-धमकाया जा रहा है, और उन्हें सरकार के पक्ष में फैसले देने के लिए ‘ब्लैकमेल’ किया जा रहा है। कहा जाता है कि भ्रष्टाचार-निरोधक अदालत के मुखिया को एक टेप से इस कदर धमकाया गया कि उनके फैसले विपक्षी नेताओं के खिलाफ होने लगे हैं।

लेकिन अच्छी बात यह है कि इमरान सरकार विपक्ष और मीडिया पर जितना दबाव बना रही है, उसकी प्रतिक्रिया अब उतनी ही तेजी से आने लगी है। सबसे अधिक मुखरता से मरियम नवाज सरकार पर हमले कर रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का सियासी करियर खत्म होने के बाद पीएमएल-एन ने मानो घुटने टेक दिए थे, लेकिन अब मरियम पार्टी को नई धार देती दिख रही हैं। उन्होंने उस जज का एक वीडियो टेप भी सार्वजनिक किया है, जिन्होंने नवाज शरीफ को सजा सुनाई थी। इस टेप में जज साहब यह कुबूलते हुए दिख रहे हैं कि दबाव में आकर ही उन्होंने नवाज शरीफ को जेल भेजा था।

फिर, एक असर यह भी हो रहा है कि तमाम विपक्षी पार्टियां अब एकजुट होने लगी हैं। इन सबकी पहली कोशिश संसद के ऊपरी सदन सीनेट के चेयरमैन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना और अपने विश्वस्त की उस पर ताजपोशी कराना है। मिलकर सरकार पर वार करने का यह प्रयास कितना कारगर होता है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन यदि यह कोशिश बेकार जाती है, तब भी हुकूमत की किरकिरी तय है। दरअसल, सीनेट में सरकार के पास एक तिहाई, तो विपक्ष के पास दो तिहाई संख्या बल है। ऐसे में, चेयरमैन को बचाने के लिए सरकार को सांसदों की खरीद-फरोख्त करनी होगी, जिससे इमरान खान की उस छवि पर बट्टा लगेगा, जिसमें वह खुद के पाक-साफ और ईमानदार होने के दावे करते रहे हैं।

इन सबसे पाकिस्तानी सियासत में खलबली मची हुई है। कोशिश की जा रही है कि मरियम के नेतृत्व में एकजुट होते विपक्ष को तोड़ दिया जाए। इसके लिए मरियम को ऐसे मामले में फिर से तलब किया गया है, जिसमें उन्हें करीब साल भर पहले सजा सुनाई जा चुकी है, जबकि इस मामले में अपील करने की समय-सीमा महज 30 दिन थी। जवाब में मरियम ने भी सरकार के खिलाफ कुछ और टेप जारी करने की धमकी दी है। माना जा रहा है कि इन खुलासों से शीर्ष अदालत के जज सहित फौजी अफसर भी बेपरदा होंगे।

पाकिस्तान का अवाम भी इन दांव-पेच को समझ रहा है। भले ही ऊपरी तौर पर उसमें कोई प्रतिक्रिया नहीं दिख रही, लेकिन लावा अंदर-अंदर दहकने लगा है। लोगों का एक बड़ा तबका अब भी पीएमएल-एन पर भरोसा रखता है। मुमकिन है, जब उन्हें कोई भरोसेमंद चेहरा दिखेगा, उनका आक्रोश सतह पर आ जाएगा। लोग सिर्फ सत्ताधारी नेताओं की कारस्तानी से परेशान नहीं हैं, बल्कि उनके सामने आर्थिक दुश्वारियां कहीं ज्यादा हैं। सरकारी निकम्मेपन की वजह से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। महंगाई अपने चरम पर है और लोगों की आमदनी दिनोंदिन घट रही है।

जाहिर है, पाकिस्तान में जितना राजनीतिक तापमान बढ़ेगा, उसकी आर्थिक सेहत उतनी ही खराब होती जाएगी। राजनीतिक अस्थिरता का माहौल अर्थव्यवस्था को ही सर्वाधिक नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में, सरकार सियासी तापमान को ठंडा रखने की कोशिश कर रही है। दिक्कत यह है कि इमरान खान इसका हल पाबंदियों में ढूंढ़ रहे हैं। इससे आर्थिक व प्रशासनिक मुश्किलें बढ़ेंगी। चूंकि हालात धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं, इसलिए आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक दुश्वारियां चरम पर दिखेंगी। वजीर-ए-आजम को यह समझना होगा कि विरोध की आवाज दबाने से परेशानियां खत्म नहीं होने वालीं, बल्कि इसके लिए तमाम तरह के सुधार करने होंगे। मगर फासीवादी सोच उन्हें दूरदर्शी बनने से रोक रही है। पाकिस्तान के लिए आने वाले दिन कठिन हैं। नजर इस पर भी रहेगी कि अवाम का गुस्सा कब पकता और फूटता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 13th July