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स्थानीय पुलिस का योगदान न भूलें

 विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी

वह 1993 की एक सर्द अंधेरी रात थी। श्रीनगर के पुलिस कंट्रोल रूम को घेरकर खड़ी बीएसएफ की टुकड़ी के सदस्य के रूप में मैं क्या महसूस कर रहा था? खासतौर से जब पीसीआर की मुख्य इमारत में राज्य के डीजीपी समेत पुलिस का शीर्ष नेतृत्व बंधक बना लिया गया हो और कैंपस में अपनी राइफलें हवा में लहराते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान आजादी-आजादी के नारे लगा रहे हों। उस दिन एक असावधान और असंवेदनशील फौजी टुकड़ी ने पुलिस के एक जवान को मार दिया था, विरोध में पुलिसकर्मी बगावत पर उतारू हो गए थे। गनीमत यह हुई कि सुबह चार, सवा चार बजे एक सैन्य अभियान में बागियों से बिना किसी जान-माल के नुकसान के हथियार रखवाए जा सके।

मैं यही सोच रहा था कि सब कुछ खत्म हो गया है और अब यहां से वापसी मुश्किल है, पर वापसी हुई। 1999-2000 के आंकडे़ खंगालते हुए मैंने पाया कि सशस्त्र उग्रवादियों के विरुद्घ लड़ाई में राज्य पुलिस की उपलब्धियां सेना और अर्द्धसैनिक बलों की सम्मिलित उपलब्धियों का मुकाबला करती दिख रही थीं। लगभग वही स्थिति बन रही थी, जो रिबेरो या केपीएस गिल का नेतृत्व मिलने पर पंजाब पुलिस ने निर्मित की थी। यह भी तब, जब राज्य पुलिस को केंद्र और राज्य सरकारों से पूरा विश्वास नहीं मिल रहा था। हालात ऐसे थे कि बल का मुखिया डीजीपी या पुलिस महानिदेशक अपनी सुरक्षा में राज्य पुलिस नहीं, सीआरपीएफ की टुकड़ी लगाता था। यह किसी भी बल के लिए अपमानजनक बात है, पर इसके बावजूद उसने लड़ाई में अपनी हिस्सेदारी निभानी शुरू की और 2000 तक वह स्थिति आ गई, जिसका मैंने ऊपर उल्लेख किया है।

दुनिया भर का अनुभव बताता है कि सशस्त्र नागरिक विद्रोहों से लड़ने के लिए सबसे बेहतरीन लड़ाके स्थानीय समुदायों से ही आते हैं। वे अपने समुदाय के लड़ाकों की शक्ति और कमजोरी, दोनों से भली-भांति वाकिफ होते हैं। पंजाब का अनुभव हमारे सामने है। एक समय पूरी तरह हतोत्साहित और गिरे मनोबल वाली पंजाब पुलिस ने जैसे ही लड़ना शुरू किया, पूरा परिदृश्य बदल गया। यह सही है कि पंजाब और जम्मू-कश्मीरके हालात की तुलना कई अर्थों में नहीं की जानी चाहिए, पर यह भी उतना ही सही है कि घाटी में जब भी अपेक्षाकृत शांति के मौके आए या सुरक्षा बलों को कोई बड़ी कामयाबी मिली, तो उनके पीछे राज्य पुलिस के फुटप्रिंट्स दिखे। यह अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि स्थानीय समुदाय के बीच से आने और उनसे निरंतर जीवित संपर्क में रहने वाला पुलिसकर्मी आसानी से ऐसी सारी सूचनाएं ला सकता है, जिनको आधार बनाकर सुरक्षा बल आतंकियों के विरुद्ध बड़ी कार्रवाई करते रहे हैं।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि वह पुलिसकर्मी अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा खतरे में डालकर ही ये सूचनाएं लाता है। घाटी से हर महीने खबरें आती रही हैं कि छुट्टी पर या त्योहार मनाने आए किसी पुलिस जवान की घर में घुसकर आतंकियों ने हत्या कर दी या उसे उसके रोते-बिलखते परिजनों के सामने से घसीटते हुए ले गए और कुछ दिनों बाद किसी नदी-नाले में उसका शव मिला। ऐसे में, उनके लड़ने का महत्व सेना या अर्द्धसैनिक बलों के सैनिकों से अधिक है, जो कुछ दिनों की अपनी पारी खेलकर घाटी के बाहर चले जाते हैं। नगण्य अनुपात में ही ऐसे उदाहरण हमारे पास होंगे, जब कोई पुलिसकर्मी अपने हथियारों के साथ उग्रवादियों के खेमे में चला गया या हमला होने पर आसानी से उसने अपने हथियार छिनने दिए हों। ऐसे में, जब संविधान के अनुच्छेद 370 या 35-ए को समाप्त कर दिया गया है, तब राज्य पुलिस के औसत जवान की क्या प्रतिक्रिया होगी? वह भी उसी समुदाय से आता है, जिसके लिए अनुच्छेद 370 एक बड़ा संवेदनशील मुद्दा है। इसी प्रश्न का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकार उसकी प्रतिक्रिया को लेकर कितनी सहज या सशंकित होगी?

तटस्थ होकर देखें, तो पहला राउंड राज्य पुलिस के उस औसत जवान के पक्ष में गया है, जिसने अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखकर कफ्र्यू लगाने और जनता को राहत पहुंचाने में अपनी सारी क्षमता झोंक दी है। अपने अनुभव से मैं कह सकता हूं कि इस मुश्किल वक्त में उन्हें आराम करने या खाने-पीने का वक्त भी नहीं मिल रहा होगा। मैंने गौर से भारतीय और साथ ही पाकिस्तानी मीडिया को स्कैन किया और मुझे जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक भी जवान के भगोड़ा होने की खबर पढ़ने को नहीं मिली। पाकिस्तानी मीडिया जो पुरानी क्लिपिंग चलाकर घाटी में लोगों के सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने का भ्रम पैदा कर रहा है, वह भी जम्मू-कश्मीर पुलिस के हुक्म उदूली का प्रचार नहीं कर पा रहा। उनके बीच यह प्रचार भी किया जा रहा है कि अब उनका तबादला देश के दूसरे हिस्सों में किया जा सकता है और दूसरे पुलिस बलों के सदस्यों की तैनाती वहां की जा सकती है। इसके बाद भी वे मजबूती से अपने बेडे़ के सदस्य बने हुए हैं।

दुखद यह है कि सरकार ने इस वफादार फोर्स पर पूरा यकीन नहीं किया। सांविधानिक परिवर्तन के साथ ही उनमें से अधिकतर के हथियार रखवा लिए गए और इस मुश्किल वक्त में भी वे सिर्फ लाठी लेकर अपना फर्ज निभा रहे हैं। किसी सशस्त्र बल के लिए इससे बड़ा अपमान और कुछ नहीं हो सकता, पर इसके बाद भी वे अपनी ड्यूटी पर खड़े हैं। मुझे नहीं पता कि ऐसी कितनी विश्वसनीय सूचनाएं नीति-निर्धारकों के पास थीं, जिनके आधार पर उन्हें हथियार न देने का फैसला किया गया, पर पिछले कुछ वर्षों के उनके आचरण, उनकी कुर्बानियों और उग्रवादियों द्वारा निरंतर उनके परिवारी जनों को निशाना बनाए जाने को ध्यान में रखकर देखें, तो लगता है कि सरकारी प्रतिक्रिया जल्दबाजी और अतिरेक भय की उपज है।

यदि हम स्थानीय पुलिस पर विश्वास नहीं करेंगे, तो पूरा खतरा है कि विश्व जनमत पाकिस्तानी दलील को गंभीरता से लेने लगे कि घाटी में भारतीय उपस्थिति एक कब्जा बल जैसी है। हमें राज्य पुलिस पर पूरा भरोसा दिखाते हुए उसे लड़ाई के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित और प्रशिक्षित करना होगा। वे हरावल दस्तों में होंगे, तभी कश्मीर की लड़ाई एक धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रीय लड़ाई में तब्दील हो सकेगी। उन्हें रिबेरो या केपीएस गिल जैसा नेतृत्व देकर इस लड़ाई को निर्णायक रूप से जीता जा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 13th August